मोदी-पेजेश्कियान वार्ता

प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति श्री मसूद पेजेश्कियान से फोन पर बातचीत करके साफ कर दिया है कि दोनों देशों के बीच के प्रचीन, एेतिहासिक व सांस्कृतिक सम्बन्धों की जीवन्तता को छिटपुट अवरोध कमजोर नहीं कर सकते हैं। नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास ने इस बातचीत को बहुत ही सौहार्दपूर्ण व दोनों देशों के आपसी सम्बन्धों के लिए स्फूर्तिदायक माना है और कहा है कि श्री मोदी ने ईरान के सर्वोच्च नेता स्व. आयतुल्ला खामेनेई व अन्य ईरानी उच्च अधिकारियों व नेताओं की मृत्यु पर भी गहरी शोक संवेदना प्रकट की और ईरानी सरकार व इसके लोगों के प्रति सहानुभूति प्रकट की। ईरान द्वारा अमेरिका के साथ युद्ध विराम समझौता किये जाने के बाद श्री मोदी की यह ईरानी नेताओं के साथ पहली बातचीत थी। श्री मोदी ने इस वार्तालाप में उम्मीद जाहिर की कि समझौते से पश्चिम एशिया के क्षेत्र में दीर्घकालिक शान्ति का मार्ग प्रशस्त होगा और फारस की खाड़ी में स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य के समुद्री मार्ग के खुलने से विश्व के विभिन्न देशों के बीच व्यापार सुगम बनेगा। श्री खामेनेई की शहादत विगत 28 फरवरी को ईरान व अमेरिका– इजराइल के बीच युद्ध छिड़ने के अगले दिन ही हो गई थी। इसके साथ ही श्री मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियान को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स देशों के राष्ट्रध्यक्षों के शिखर सम्मेलन में पधारने का भी न्यौता दिया।
ब्रिक्स के विदेश मन्त्रियों का सम्मेलन नई दिल्ली में पिछले महीने हुआ था जिसमें ईरानी विदेश मन्त्री भाग लेने आये थे। ईरान ने भी श्री मोदी को अपने सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह खामेनेई के अन्तिम संस्कार में भाग लेने के लिए आमन्त्रित किया था। यह संस्कार आगामी 9 जुलाई को होना है मगर उन दिनों प्रधानमन्त्री का कुछ अन्य देशों के दौरे का कार्यक्रम पूर्व निर्धारित है अतः उन्होंने साफ किया कि संस्कार में भाग लेने के लिए भारत से एक प्रतिनि​िधमंडल ईरान जायेगा। बताया जा रहा है कि इसमें बिहार के राज्यपाल सैयद अता हुसनेन व विदेश राज्य मन्त्री शामिल होंगे क्योंकि विदेश मन्त्री श्री एस. जयशंकर प्रधानमन्त्री के साथ विदेश दौरे पर होंगे। ईरान व अमेरिका-इजराइल युद्ध छिड़ने के बाद से ही भारत का रुख रहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग को बन्द नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह विश्व अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा व्यापारिक मार्ग है और भारत की ऊर्जा सप्लाई इसी मार्ग पर निर्भर करती है। अतः श्री मोदी ने श्री पेजेश्कियान के साथ वार्ता में भारत का पक्ष खुल कर रखा और भविष्य में भारत-ईरान के बीच के व्यापारिक सम्बन्धों को भी केन्द्र में रखने की कोशिश की। इससे भारत में श्री मोदी के उन आलोचकों को बगलें झांकनी पड़ सकती हैं जो ईरान के प्रति भारत की नीति को लेकर विभिन्न प्रकार के आरोप लगा रहे थे।
भारत पारंपरिक रूप से ईरान से कच्चा तेल खरीदता रहा है। एक समय में यह अपने कुल आयातित कच्चे तेल का 30 प्रतिशत हिस्सा ईरान से खरीदता था परन्तु विश्व भू-राजनैतिक परिस्थितियों में बदलाव आने की वजह से इसने 2019 से ईरानी तेल लेना बन्द कर दिया था। भारत ईरान से जो तेल खरीदता था उसका भुगतान भी वह भारतीय रुपये में ही करता था। अब ईरान व अमेरिका के बीच समझौता होने के बाद यदि पश्चिम एशिया में चिर स्थायी शान्ति का वातावरण बनता है तो भारत के साथ इसके व्यापार करने के नये विकल्प खुल सकते हैं। श्री पेजेश्कियान से फोन पर वार्ता के बाद प्रधाननमन्त्री श्री मोदी ने अपने एक्स पोस्ट पर जानकारी दी कि उनकी राष्ट्रपति पेजेश्कियान से पश्चिम एशिया के ताजा हालात के बारे में बातचीत हुई। उन्होंने शान्ति बातचीत के बारे में हुई प्रगति का स्वागत करते हुए कहा कि इस दिशा में किये जा रहे लगातार प्रयासों से क्षेत्र में स्थायी शान्ति स्थापित होगी। इसमें उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग की महत्ता का भी जिक्र किया। हालांकि ईरान व अमेरिका के बीच समझौता हो जाने के बाद होर्मुज मार्ग से भारत के मालवाहक जहाज आ-जा रहे हैं परन्तु खाड़ी में अभी भी भारत के एक दर्जन के लगभग जहाज खड़े हुए देखे गये हैं।
श्री मोदी ने भारत का वह पक्ष भी साफगोई के साथ रखा जिसके लिए भारत जाना जाता है। उन्होंने कहा कि भारत मानता है कि किसी भी समस्या का अन्तिम हल केवल कूटनीतिक रास्तों व बातचीत से ही निकल सकता है। ईरानी सूचनाओं के अनुसार राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने युद्ध काल के दौरान भारत के सकारात्मक व रचनात्मक रुख की भी प्रशंसा की और शान्ति बहाल करने के प्रयासों में व्यक्तिगत रूप से श्री मोदी की भूमिका को सराहा। अतः अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारत व ईऱान के बीच के सम्बन्धों का प्रवाह अनवरत रूप से जारी रहेगा और दोनों देश एक- दूसरे के हितपूरक बनते हुए कूटनीतिक मार्ग से स्थायी शान्ति की ओर बढ़ने की कोशिशों को अपना समर्थन देंगे। इसके साथ ईरान भारत की उस ताकत को भी पहचान रहा है जो उसके विभिन्न बहुदेशीय संगठनों का सक्रिय हिस्सा बनने की वजह से बनी है।

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