ओल्ड इज गोल्ड कहना बहुत आसान है परन्तु बुजुर्गों को सोना मान कर उनका सम्मान करने वाली युवा पीढ़ी इसे निभाती कहां है? बुजुर्ग घरों में अकेले हैं। संतान का कैरियर बनाने के लिए अपनी जिन्दगी दांव पर लगाने वाले मां-बाप को बूढ़ा होने पर संतान बड़े-बड़े पद पाकर ठुकराने लगती है तो वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब जैसे मंच समाज में उभरते हैं जो बुजुर्गों के सम्मान को सुरक्षित रखने का धर्म निभाते हैं। क्योंकि मैं इसकी चेयरपर्सन हूं, पिछले दिनों तेलंगाना सरकार ने बुजुर्ग मां-बाप के आंसू पोंछने वाला कानून बनाया तो मुझे बड़ा सुकून मिला कि अब राज्य सरकार भी इस दिशा में पग उठाने लगी है। बच्चे जब बड़े होकर कैरियर बनाने के लिए घर-बार छोड़कर मां-बाप को अकेला छोड़े देते हैं तो बुजुर्गों का जीवन सिसकियों से भरने लगता है। इन घटनाओं को सामने रखकर तेलंगाना विधानसभा में एक विधेयक पारित किया गया है जिसके तहत व्यवस्था यह है कि अगर कोई समाज में माता-पिता की उपेक्षा करता है तो उनके वेतन में से धन काट कर बुजुर्ग माता-पिता को दिए जाने की व्यवस्था है। मैं इस पहल का स्वागत करती हूं। बुजुर्ग माता-पिता के आंसू पोंछने का यह पहला स्वागत योग्य कदम है। जहां बुजुर्गों को भगवान मान कर पूजा जाता है और जहां संतान के श्रवण कुमार बनने के साक्ष्य भी रहे हों तो उस देश में बुजुर्गों की उपेक्षा क्यों है। लेकिन यह बात अच्छी है कि सरकारें इस दिशा में उनके आत्मसम्मान को सुरक्षित रखने के लिए बहुत प्रयास कर रही हैं।
बुजुर्गों की इस घर-घर, शहर-शहर, देश और विदेश तक फैली गंभीर समस्या के निदान और अपनों द्वारा की जा रही उपेक्षा पर कुछ करने का सही वक्त आ गया है। देश में बुजुर्ग माता-पिता की उपेक्षा एक गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही है। गांवों से शहरों की ओर पलायन, संयुक्त परिवारों का टूटना और तेजी से बदलती जीवनशैली के कारण बुजुर्गों की देखभाल नहीं करने के मामले बढ़ते जा रहे हैं। कई दफा माता-पिता को उम्र के आखिरी पड़ाव पर या तो अकेले रहना पड़ता है या फिर किसी वृद्धाश्रम की शरण लेने को मजबूर होना पड़ता है।
मेरा मानना है कि भारतीय समाज में बुजुर्गों को हमेशा सम्मान की दृष्टि से देखा गया है। “मातृ देवो भव:, पितृ देवो भव:” जैसी परंपराएं हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का आधार रही हैं, लेकिन आधुनिक जीवनशैली, शहरीकरण और संयुक्त परिवारों के टूटने के कारण आज बुजुर्गों की स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। इसी संदर्भ में हाल ही में तेलंगाना सरकार द्वारा लिया गया निर्णय एक महत्वपूर्ण सामाजिक और कानूनी कदम के रूप में सामने आया है। हाल ही में तेलंगाना विधानसभा ने “तेलंगाना कर्मचारी जवाबदेही और माता-पिता सहायता निगरानी विधेयक, 2026” पारित किया। इस कानून का मुख्य उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। इस विधेयक के तहत सरकारी, निजी कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों को अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करना अनिवार्य होगा।
यदि कोई व्यक्ति अपने माता-पिता की उपेक्षा करता है तो उसके वेतन से 15 प्रतिशत या रुपए 10,000 (जो भी कम हो) काटकर माता-पिता को दिया जाएगा। इतना ही नहीं धन के न मिलने पर बुजुर्ग माता-पिता शिकायत कर सकते हैं और प्रशासन 60 दिनों के भीतर कार्रवाई करेगा। मां-बाप को अपनी जिंदगी बसर करने के लिए कानून की मदद लेनी पड़ रही है। हालांकि केन्द्र व राज्य सरकारें इस मामले में कानून पहले ही लागू कर चुकी हैं लेकिन फिर भी बुजुर्गों की उपेक्षा एक आम बात बन चुकी है। यद्यपि बुजुर्ग माता-पिता के लिए पोषणा व कल्याण अधिनियम 2007 लागू है, पर सोशल मीडिया लगातार कहता आ रहा है कि इसका असर जमीन पर दिखाई नहीं देता। यह कानून 2007 के केंद्रीय कानून से आगे बढ़कर अधिक सख्त और प्रभावी व्यवस्था प्रदान करता है। हमारे देश में यह अपनी तरह का पहला और अनूठा प्रयास माना जा रहा है, जिसमें पारिवारिक जिम्मेदारी को कानूनी रूप दिया गया है। तेलंगाना सरकार का यह कदम केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं है, बल्कि सामाजिक सुधार का प्रयास भी है। इसके पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं, आज के समय में कई लोग अपने करियर और व्यक्तिगत जीवन में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वे अपने माता-पिता की उपेक्षा करने लगते हैं। यह कानून लोगों को उनकी जिम्मेदारी का एेहसास कराता है। यह सच है कि ज्यादातर बुजुर्ग आर्थिक रूप से अपने बच्चों पर निर्भर होते हैं। इस कानून के माध्यम से उन्हें नियमित आर्थिक सहायता सुनिश्चित होगी। जहां पहले माता-पिता की सेवा केवल नैतिक कर्त्तव्य थी, अब इसे कानूनी दायित्व भी बना दिया गया है। इससे समाज में अनुशासन बढ़ेगा। तेलंगाना का यह निर्णय अन्य राज्यों के साथ-साथ न केवल भारत में बल्कि दुनियाभर में एक उदाहरण बन सकता है।























