वन्दे मातरम् : मूल समस्या कहां है?

Summary :

हम जिस भारत देश में रहते हैं, इसकी बहुसंख्यक आबादी का धार्मिक विश्वास अल्पसंख्यक आबादी के विश्वास से अलग ही नहीं, बल्कि कहीं-कहीं टकराव भी है। इन परिस्थितियों में इस्लाम बड़ा सही रास्ता दिखाता है। हज़रत मुहम्मद (स.) का कहना है कि कोई भी व्यक्ति अपने किसी भी बोल, बयान या कार्य से कभी भी किसी के मन को ठेस न पहुंचाए, क्योंकि इस्लाम में यह जघन्य पाप है। फिर या तो सभी जानते हैं कि शताब्दियों से देश में हिंदू-मुस्लिम ऐसे ही रहते चले आ रहे हैं, जैस दूध और शक्कर। इनके समाजी, कारोबारी, मुलाजमती मामलात आपस में एक…

हम जिस भारत देश में रहते हैं, इसकी बहुसंख्यक आबादी का धार्मिक विश्वास अल्पसंख्यक आबादी के विश्वास से अलग ही नहीं, बल्कि कहीं-कहीं टकराव भी है। इन परिस्थितियों में इस्लाम बड़ा सही रास्ता दिखाता है। हज़रत मुहम्मद (स.) का कहना है कि कोई भी व्यक्ति अपने किसी भी बोल, बयान या कार्य से कभी भी किसी के मन को ठेस न पहुंचाए, क्योंकि इस्लाम में यह जघन्य पाप है। फिर या तो सभी जानते हैं कि शताब्दियों से देश में हिंदू-मुस्लिम ऐसे ही रहते चले आ रहे हैं, जैस दूध और शक्कर। इनके समाजी, कारोबारी, मुलाजमती मामलात आपस में एक दूसरे से नत्थी हैं।
दोनों सम्प्रदाय एक दूसरे से इसी प्रकार से अलग नहीं हो सकते, जैसे नाखून से गोश्त! जहां तक राष्ट्रीय संस्कृति का संबंध है, दोनों संप्रदायों का पहनावा, खानपान, सामाजिक रस्में आदि क्षेत्र के हिसाब से एक जैसी ही होती हैं। आए दिन वन्दे मातरम् को लेकर खींचातानी होती है। इस प्रकार के अन्य और गीत भी हैं, जिनको लेकर समाज में एक वैमनस्य की भावना संचारित होती है। बहुसंख्यक तबके में यह भावना घर कर गई है कि मुस्लिम वन्दे मातरम् नहीं गाते। इस संबंध में हमें पूर्ण इतिहास की पड़ताल करनी होगी। स्वतंत्रता संग्राम में सबसे अधिक गाया जाने वाला गाना वन्दे मातरम् ही था और जब तक गाया गया जब तक मुहम्मद अली जिन्ना ने इस पर आपत्ति नहीं जताई। इसी प्रकार से केरला में जब कुछ बच्चों के राष्ट्रगान न गाने पर उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया तो उन्होंने पहले तो हाई कोर्ट में, फिर 1986 में उच्चतम न्यायालय में अर्जी दाखिल की, जिस पर यह निर्णय दिया गया कि “जन गण मन” गाना अनिवार्य नहीं है, मगर इसका सम्मान आवश्यक है और अगर खड़े होकर इसको यदि गाया नहीं भी गया तो भी यही समझा जाएगा कि इसका सम्मान किया जा रहा है। इस्लाम की पूरी इमारत ही इस बुनियाद पर खड़ी है कि अल्लाह के साथ किसी की शिरकत या हिस्सेदारी नहीं हो सकती और जो इसको दाएं-बाएं करके यह कहते हैं कि वन्दे मातरम् की भारत माता पूजनीय है तो वह नामुमकिन है और उसकी कोई इजाज़त नहीं। फिर भी इस्लाम में भारत माता और हर धर्म का मान-सम्मान पूरा है। एक बार 26 जुलाई 1952 को भारत रत्न, मौलाना आज़ाद अपने मंत्रालय में वन्दे मातरम् पर संगोष्ठी कर रहे थे और इस बात पर आपत्ति जता रहे थे कि जिन्ना ने इसे रुकवा दिया था। इस समय न केवल वन्दे मातरम् का गायन हुआ था, बल्कि सरस्वती वंदना भी हुई थी और आज़ाद ने इसकी तारीफ़ भी की थी, जिसके कारण उन्हें कुफ्र के फतवे दिए गए थे। उनके जवाब में उन्होंने कहा था कि भारत न तो “दारुल हरब” (ग़ैर मुस्लिमों द्वारा चलाया जा रहा देश) और न ही “दारुल इस्लाम” (मुस्लिमों द्वारा संचालित देश), बल्कि यह तो “दारुल अमन” है और इस प्रकार की गतिविधियों से इस्लाम में उनकी आस्था और भी प्रगाढ़ होती है। कई लोग वन्दे मातरम् और भारत माता को “मादर-ए-वतन” कहते हैं और इस बात को भी रखते हैं कि वन्दे मातरम् कहने से इस्लाम पर कोई आंच नहीं आती क्योंकि इस्लाम इतना कमजोर नहीं कि अगर एक मुस्लिम सच्चा है और अपनी जड़ों से जुड़ा है तो उसे उसे कोई फ़र्क पड़े। इस संदर्भ में वन्दे मातरम् का सार व आधार समझना अति आवश्यक है। वास्तव में राष्ट्रीय गीत, वन्दे मातरम् का आधार भारत माता है, जो एक प्रतिमा के रूप में है और उसकी वंदना अर्थात पूजा की जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि सनातन धर्म, आस्था और परंपरा में जितने ईश्वर, परमात्मा, भगवान, अवतार आदि भी देवी-देवता हैं वे सभी पूजनीय हैं।
रही बात इस्लाम की, तो इसमें केवल एक ही परमात्मा की वंदना, नमाज़ होती है। इस्लाम में “वहदत”, अर्थात एक ही अल्लाह को पूजा जाता है या इसके आगे झुका जाता है और अल्लाह कोई मूर्ति नहीं, बल्कि एक नूर है। अल्लाह की प्रतिमा बना कर उसकी पूजा नहीं होती इस्लाम में। अतः इस्लाम में वन्दे मातरम् गायन की कोई कल्पना नहीं। वन्दे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता, एकता और सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक है। इस गीत ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देशवासियों में राष्ट्रभक्ति की चेतना जगाई और सभी समुदायों को एक सूत्र में बांधा। मौलाना आज़ाद ने भी कहा था कि वन्दे मातरम् में मां के रूप में मातृभूमि का सम्मान निहित है, जो भारतीय परंपरा का मूल भाव है। यह गीत किसी धर्म विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि भारत की साझा विरासत का उत्सव है। संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के दायरे में रहते हुए राष्ट्रगीत/राष्ट्रगान का सम्मान सभी को करना है। हां, इसको गाने के लिए किसी पर ज़ोर- जबरदस्ती हर्गिज नहीं करनी चाहिए। देशप्रेम और धार्मिक आस्था में कोई टकराव नहीं होना चाहिए। भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब में विविधता के साथ एकता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है और वन्दे मातरम् उसी भावना की अभिव्यक्ति है।
ऐसे विवाद भारत को जगत गुरु बनने के रस्ते में स्पीड ब्रेकर हैं, जो ठीक नहीं हैं।

Team Desk