सांस्कृतिक भारत की पहचान

Summary :

भारत की जिस हिन्दू संस्कृति में पूरे संसार के लोगों को अपना परिवार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ माना जाता हो यदि उसी भारत में एक धर्म विशेष के लोगों के सबसे बड़े धार्मिक उत्सव क्रिसमस दिवस पर विध्वंस का नंगा नाच किया जाये तो उसे कुछ लोगों की विकृत मानसिकता के सिवाय कुछ और नहीं कहा जा सकता है। मगर उनके एेसे कृत्यों से पूरे विश्व में भारत की छवि पर गहरा दाग लगता है और भारत के विश्व गुरु बनने की सामर्थ्य पर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है। सवाल यह है कि भारत की संस्कृति आदिकाल से ही सभी मतों…

भारत की जिस हिन्दू संस्कृति में पूरे संसार के लोगों को अपना परिवार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ माना जाता हो यदि उसी भारत में एक धर्म विशेष के लोगों के सबसे बड़े धार्मिक उत्सव क्रिसमस दिवस पर विध्वंस का नंगा नाच किया जाये तो उसे कुछ लोगों की विकृत मानसिकता के सिवाय कुछ और नहीं कहा जा सकता है। मगर उनके एेसे कृत्यों से पूरे विश्व में भारत की छवि पर गहरा दाग लगता है और भारत के विश्व गुरु बनने की सामर्थ्य पर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है। सवाल यह है कि भारत की संस्कृति आदिकाल से ही सभी मतों व धर्मों को एक साथ लेकर चलने की पक्षधर रही है और इसी देश में ईश्वरवादी व अनीश्वरवादी धर्म एक साथ समान्तर रूप से फले-फूले हैं। इसकी मुख्य वजह यही रही है कि हिन्दू संस्कृति मूल रूप से प्राणी मात्र के प्रति करुणा व ममता की दिग्दर्शक रही है और यह समूचे ब्रह्मांड के कल्याण की प्रार्थना करती रही है।
यह कोई छोटी बात नहीं है कि ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह के जन्म के बाद ईसाई धर्म यूरोप पहुंचने से पहले ही भारत पहुंचा। इसके केरल राज्य में आज भी दुनिया का प्राचीनतम गिरजाघर मौजूद है। भारत सभी धर्मों के अनुयायियों के लिए शुरू से ही सुरक्षित स्थान इसीलिए बना क्योंकि हिन्दू संस्कृति में धर्म के आधार पर भेदभाव की कोई गुंजाइश ही नहीं है। यह मानव मात्र में प्रेम भाव की प्रेरणा पैदा करता है और मानवीयता को सर्वोच्च मानती है। हिन्दुओं में सनातन धर्म को प्राचीन और आदि-अनन्त माना जाता है। इसी सनातन धर्म के उपासक जब आसुरी शक्तियों का विनाश करने वाली महाचंडी की उपासना करते हैं तो यही प्रार्थना करते हैं–हे देवी संसार के सभी लोगों को विद्यावान, यशवान व धनवान बनाओं और मुझे बुद्धि बल प्रदान करो,
विद्या वन्तं, यशस्वन्तं, लक्ष्मीवन्तं जनं कुरू
रूपं देहि , जयं देहि, यशो देहि द्विषो जहि
अतः जिस सनातन धर्म में समूची मानवजाति के विकास व उत्थान की कामना की जाती हो उसके मानने वाले किस प्रकार किसी एक धर्म इसाईत को मानने वाले लोगों के विरुद्ध घृणा का प्रदर्शन कर सकते हैं और उनके धार्मिक प्रतीकों को क्रिसमस दिवस के अवसर पर तहस-नहस कर सकते हैं। एेसे लोगों को इतनी भी समझ नहीं है कि उनके एेसा करने से विश्व के 120 ईसाई देशों व 57 मुस्लिम देशों में रहने वाले हिन्दू व अन्य भारतीयों के जीवन पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा और एक राष्ट्र के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय मोर्चे पर भारत को किस शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ेगा। यदि विदेशों में बसे भारतीयों के तीज-त्यौहारों पर भी वहां के मूल निवासी इसी प्रकार का रवैया अपनाएं और उनके होली, दीवाली जैसे त्यौहारों पर विघ्न डालें तो इससे भारतीयों को कैसा लगेगा। जबकि दीपावली को विश्व के त्यौहारों में शामिल कर लिया गया है। यह 21वीं सदी चल रही है और इसमें कोई भी देश अकेलपन में न तो जी सकता है और न ही तरक्की कर सकता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था के दौर में विभिन्न देशों के लोगों का विकास एक-दूसरे के यहां उपलब्ध आय स्रोतों पर निर्भर होता जा रहा है। जिस देश के पास जो विकास के साधन उपलब्ध हैं वह दूसरे देश को उपलब्ध करा कर ही विकास की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसका उदाहरण मुस्लिम देश संयुक्त अरब अमीरात है जहां के दुबई इलाके को आज सब प्रकार से सुरक्षित समझा जाता है और इसमें किये गये निवेश को महफूज समझा जाता है। आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत का विकास विदेशी निवेश पर निर्भर हो चुका है जिसके कारण भारत की सरकार अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए खोल रही है। यह निवेश तभी आयेगा जब भारत में सामाजिक रूप से सर्वत्र सुख-शान्ति होगी और लोगों में प्रेम व भाईचारे का माहौल होगा। मगर क्रिसमस दिवस पर देश के कुछ राज्यों विशेष रूप से छत्तीसगढ़ आदि में जिस प्रकार कुछ सिरफिरे लोगों ने इस दिन होने वाली पारंपरिक सजावट और सैंटा क्लाज के प्रतीक रूपों को तहस-नहस किया उससे अमरीका समेत सभी ईसाई देशों में यह सन्देश गया कि भारत में सामाजिक स्तर पर शान्ति का माहौल नहीं है और ईसाई समाज के लिए मुश्किलें बढ़ रही हैं जबकि यह धर्म दया, करुणा और प्रेम की ही बात करता है। हिन्दू संस्कृति भी इसी सिद्धान्त पर हजारों वर्षों से चल रही है जिसमें एक तरफ नितान्त भौतिकवादी ऋषि चारवाक भी होते हैं, सिद्धान्तवादी महाराज मनु भी होते हैं।
भारत में दोनों के ही मानने वाले बसते हैं। भारतीय संविधान सभी प्रकार के मतों में विश्वास रखने वाले व्यक्तियों के बराबर के विकास की वकालत करता है। यह प्रेरणा हमारे संविधान निर्माताओं को भारत की हिन्दू संस्कृति से ही मिली थी। आखिरकार देश में सामाजिक समरसता को बिगाड़ कर कुछ सिरफिरे लोग करना क्या चाहते हैं और उनकी मंशा क्या है ? उनका यह कृत्य किसी भी दृष्टि से राष्ट्रहित में नहीं हो सकता क्योंकि वे भारत की संस्कृति को संकीर्णता में समेटना चाहते हैं और इसकी पहचान को दूषित करना चाहते हैं। जरा कल्पना कीजिये यदि ईसाई देशों में वहां बसे हिन्दुओं के सबसे बड़े त्यौहार दीपावली पर जगमगाते दीपाें को वहां कोई बुझाये और भगवान गणेश की प्रतिमा से छेड़छाड़ करे तो उनके दिल पर क्या गुजरेगी? भारत तो वह धरती है जहां साढे़ पांच सौ वर्ष पहले ही एक नये सिख धर्म का उदय हुआ और इसके उत्प्रेरक गुरु नानक देव जी महाराज ने हिन्दू, मुस्लिम व ईसाई को एक समान माना और कहा कि,
कोई बोलै राम- राम, कोई खुदाए
कोई सेवै गुसैंया, कोई अल्लाए
अतः बहुत आवश्यक है कि हम भारत के लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान में किसी विसंगति को न घुसने दें और भारत की छवि खराब करने वालों के साथ सख्ती से निपटें।

Aditya Chopra

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