प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले सप्ताह किर्गिस्तान के बिश्केक शहर में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से जैसे ही यह कहा कि युद्ध में बीता हर दिन मानवता को पीछे धकेलता है तो दुनियाभर में इसकी चर्चा होने लगी, साथ में यह भी पूछा जाने लगा कि क्या मोदी की बात पुतिन सुनेंगे? यह भी पूछा जाने लगा कि क्या भारत ने इस तरह का बयान अमेरिका और यूरोप को खुश करने के लिए दिया है? क्या रूस के समर्थन का स्टैंड भारत बदल रहा है?
ऐसे और भी बहुत से सवाल इस वक्त चर्चा में हैं, मगर मुझे लगता है कि भारत का हमेशा से एक ही स्टैंड रहा है और वह है शांति का। भारत की मिट्टी में भगवान महावीर, भगवान बुद्ध और अंग्रेजों के चंगुल से भारत को सत्याग्रह के माध्यम से मुक्त कराने वाले महात्मा गांधी के विचारों की खुशबू समाहित है। हमने आजादी के लिए भी अहिंसक तरीका अपनाया और आजादी के बाद भी सत्य और अहिंसा को ही जीवन का आधार बनाया। जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक की समय अवधि में देश ने हमेशा वैश्विक शांति की ही बात की है।
हम वसुधैव कुटुंबकम की नीति में पूरा भरोसा रखते हैं, हम पंचशील के सिद्धांतों पर अडिग हैं। हमारी शांति की नीति कभी नहीं बदली। दुनिया में हम अकेले ऐसे देश हैं जिसने कभी किसी पर हमला नहीं किया, यदि शस्त्र उठाए भी हैं तो खुद की रक्षा के लिए, दूसरों की रक्षा के लिए या फिर हमलावर को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुतिन से युद्ध खत्म करने का जो आग्रह किया है, वह हमारी इसी शांति नीति को दर्शाता है और यह कोई पहली बार नहीं है जब मोदी जी ने पुतिन के सामने इस तरह का आग्रह किया है।
जहां तक मुझे याद है, मोदी जी कम से कम चार बार यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने और शांति का रास्ता अपनाने का आग्रह कर चुके हैं। फरवरी 2022 में यूक्रेन और रूस में जंग शुरू हुई और सितंबर 2022 में उज्बेकिस्तान के समरकंद में मोदी ने पुतिन के सामने सार्वजनिक रूप से कहा था कि आज का समय युद्ध का नहीं है। उनके इस बयान की चर्चा दुनिया भर में हुई थी। यहां तक कि जी-20 घोषणापत्र में भी इसकी सराहना की गई थी। इसके बाद नरेंद्र मोदी जुलाई 2024 में जब मास्को पहुंचे तो उस वक्त उन्होंने पुतिन से कहा कि समाधान युद्ध के मैदान में नहीं मिल सकता।
बम और गोलियों के बीच शांति वार्ता संभव नहीं है और युद्ध को बातचीत के जरिये खत्म किया जाना चाहिए। अक्तूबर 2024 में रूस के कजान शहर में उन्होंने दोहराया कि रूस-यूक्रेन संघर्ष का जल्द और शांतिपूर्ण समाधान होना चाहिए। भारत विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का पक्षधर है। और अब बिश्केक, किर्गिस्तान में मोदी ने मंत्र दिया कि युद्ध के अंत की ओर बढ़ना होगा। युद्ध में बीता हर दिन मानवता को पीछे धकेलता है, और शांति की दिशा में उठाया गया हर कदम मानवता को नई आशा और उत्साह से भर देता है। पुतिन का जवाब बहुत ही सधा हुआ था कि हम इस दिशा में बढ़ रहे हैं। सवाल उठना लाजमी है कि क्या वास्तव में पुतिन शांति की ओर कदम बढ़ा रहे हैं? ऐसा लगता तो बिल्कुल नहीं है।
वे यदि झुके तो उनके लिए जीवन की सबसे बड़ी हार होगी। वे ऐसा कभी नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें भरोसा है कि वे यूक्रेन के बड़े हिस्से को हजम करने वाले हैं। हां, कभी ऐसा मौका आया कि पुतिन लाभ की स्थिति में पहुंच चुके हों और जंग को अपनी शर्तों पर खत्म करना चाहें तो वे भारत के कंधे का सहारा ले सकते हैं। इस वक्त जो लोग यह समझ रहे हैं कि मोदी जी का बयान रूस के खिलाफ है तो उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि राजनीति और कूटनीति के अखाड़े में जो जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं है। ये पूरा प्रसंग कूटनीति के अखाड़े में शांति की तलाश का है।
इतिहास गवाह है कि शांति तभी आती है जब महाबली संतुष्ट होता है और महाबली की भूख अभी शांत नहीं हुई हैै।
भारत के जीडीपी ग्रोथ की दुनिया में दहाड़…! शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के समय भारत की जीडीपी के प्रथम तिमाही में 7.8 प्रतिशत रहने की खबर को दुनिया में भारत की दहाड़ के रूप में भी देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सोशल मीडिया संदेश के माध्यम से देश के साथ तो यह जानकारी साझा की ही, दुनिया को यह संदेश भी दिया कि तमाम वैश्विक उथल-पुथल, तेल की कीमतों के झटके और सप्लाई चेन की भीषण बाधाओं के बावजूद भारत ने यह मजबूत रफ्तार हासिल की है।
ये नए दौर का भारत है, यहां के युवा दुनिया में अपनी धाक जमा चुके हैं और पीछे मुड़कर देखने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। भारत की शक्ति को कोई दरकिनार नहीं कर सकता! डीजे वाले जरा धीरे बजा। एक बार फिर यह सवाल खड़ा हुआ है कि उत्सव के दौरान शोर को कैसे नियंत्रित किया जाए। महाराष्ट्र के कुछ ज़िलों में कानफोड़ू डीजे पर एक नवंबर तक सख्ती के आदेश दिए गए हैं। मैं मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस की इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए आम सहमति से व्यापक नीति बनाई जाए। निश्चय ही हम सब उत्सव प्रिय लोग हैं। उत्सव हमारी सांस्कृति का हिस्सा है और हमारे पास इतने सुमधुर वाद्य यंत्र हैं जिनमें आनंद भरा होता है और कोई शोर नहीं होता।
हम उनका उपयोग करें। कौन नहीं जानता कि डीजे की कर्कश आवाज खासकर बच्चों, बुजुर्गों और हृदय के मरीजों के लिए अत्यंत घातक होती है। कान तो खराब होते ही हैं, कई बार जान तक चली जाती है। ऐसा नहीं है कि केवल उत्सव में ही ध्वनि प्रदूषण होता है, सड़क पर आज भी वाहनों का प्रेशर हॉर्न लोगों के कान फोड़ता है। ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ हम सबको एक जिम्मेदार नागरिक की तरह खड़ा होना होगा। यह एक गंभीर समस्या बन चुकी है।


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