बंदी सिखों का मुद्दा पिछले लंबे समय से सिख राजनीति का एक प्रमुख विषय बना हुआ है। चुनाव आते ही अकाली दल और विभिन्न पंथक संगठन बंदी सिखों की रिहाई को लेकर आवाज बुलंद करते हैं, धरने-प्रदर्शन होते हैं, बयान जारी किए जाते हैं और सरकारों को कठघरे में खड़ा किया जाता है लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी वहीं खड़ा है, आखिर बंदी सिखों की समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं निकल पाया? शायद आम सिख समाज के एक बड़े हिस्से को यह भी पूरी तरह मालूम नहीं कि ‘बंदी सिख’ कहे जाने वाले व्यक्तियों का मामला वास्तव में क्या है। विडंबना यह है कि बंदी सिखों का मुद्दा जितना पुराना होता जा रहा है, उतना ही यह राजनीतिक नारों में अधिक दिखाई देता है और वास्तविक समाधान में कम। अकाली दल सहित विभिन्न सिख राजनीतिक संगठनों से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि जब उन्हें सत्ता में रहने का अवसर मिलता है, तब बंदी सिखों की रिहाई के लिए उनकी प्राथमिकता क्या रहती है? और जब वह सत्ता से बाहर होते हैं तभी यह मुद्दा अचानक इतना महत्वपूर्ण क्यों हो जाता है?
यदि किसी पार्टी को वास्तव में लगता है कि बंदी सिखों के साथ अन्याय हो रहा है तो उसे सत्ता में रहते हुए भी इस मुद्दे पर उसी गंभीरता से काम करना चाहिए जिस गंभीरता से विपक्ष में रहते हुए बयान दिए जाते हैं। बंदी सिखों के परिवार वर्षों से इंतजार कर रहे हैं। उनके लिए यह चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि उनके जीवन और परिवारों से जुड़ा प्रश्न है। कुछ समय पहले श्री अकाल तख्त साहिब के तत्कालीन जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह के द्वारा देशभर के सिख संगठनों की एक समिति बनाने का प्रयास भी किया गया था। उद्देश्य यह था कि इस विषय को राजनीतिक दलों की सीमाओं से बाहर निकालकर एक व्यापक पंथक और कानूनी प्रयास में बदला जाए लेकिन राजनीतिक सहमति और सहयोग के अभाव में वह प्रयास भी अधिक समय तक आगे नहीं बढ़ सका। यदि बंदी सिखों की रिहाई वास्तव में पंथ का साझा मुद्दा है तो फिर इस पर अकाली दल, अन्य राजनीतिक दलों, धार्मिक संस्थाओं और सिख संगठनों के बीच न्यूनतम साझा रणनीति क्यों नहीं बन सकती? क्या राजनीतिक मतभेद इतने बड़े हैं कि बंदी सिखों का भविष्य भी उनके बीच की खींचतान का शिकार हो जाए? जरूरत इस बात की है कि बंदी सिखों के प्रत्येक मामले की व्यक्ति-विशेष के आधार पर कानूनी समीक्षा हो। किसने कितनी सजा पूरी की, किस मामले में क्या कानूनी स्थिति है, किन मामलों में पैरोल या रिहाई का प्रावधान लागू हो सकता है और किन मामलों में कोई कानूनी बाधा है। इसके लिए अनुभवी वकीलों, मानवाधिकार विशेषज्ञों और पंथक प्रतिनिधियों की एक गैर-राजनीतिक व्यवस्था बनाई जा सकती है। सिर्फ ‘बंदी सिख रिहा करो’ का नारा लगाने से समस्या हल नहीं होगी।
धर्म की आड़ में पाकिस्तान का युवा विरोधी खेल
भारत के खिलाफ पाकिस्तान की रणनीति में समय के साथ बदलाव जरूर आया है, लेकिन उसका उद्देश्य बदला नहीं है। जब प्रत्यक्ष युद्ध के मैदान में भारत को चुनौती देना कठिन होता गया, तब सीमा पार से आतंकवाद, नशीले पदार्थों, हथियारों और अब सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं को अपने जाल में फंसाने जैसी रणनीतियां चिंता का नया कारण बनकर सामने आ रही हैं। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत की युवा शक्ति को धर्म, पहचान, आर्थिक मजबूरी और सोशल मीडिया के माध्यम से प्रभावित करके देश विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल करने की कोशिश तो नहीं हो रही? कहीं. नेटवर्क से जुड़े लोगों के द्वारा युवाओं को रेकी, जासूसी तथा हिंसक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करने का प्रयास किया जा रहा है। धर्म किसी भी समाज की आस्था और नैतिक शक्ति का स्रोत है। यदि कोई विदेशी खुफिया नेटवर्क उसी आस्था को हथियार बनाकर युवाओं को भ्रमित करने का प्रयास करता है, तो उसका मुकाबला केवल पुलिस कार्रवाई से नहीं किया जा सकता। परिवार, धार्मिक संस्थाएं, शिक्षण संस्थान, सामाजिक संगठन और डिजिटल प्लेटफॉर्म, सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी। पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों की स्थिति इस चुनौती को और गंभीर बनाती है। भारत सरकार ने संसद में बताया कि विदेशी तत्व पंजाब और जम्मू-कश्मीर में सीमा पार से मादक पदार्थ पहुंचाकर नार्काे-टेरर के लिए धन जुटाने में शामिल रहे हैं और 2025 में भारत-पाकिस्तान सीमा पर 292 ड्रोन बरामद या जब्त किए गए। पंजाब में नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी के लिए ड्रोन के इस्तेमाल की समस्या नई नहीं है। सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से इसके खिलाफ एंटी-ड्रोन तकनीक और खुफिया तंत्र को मजबूत कर रही हैं लेकिन अब चुनौती केवल सीमा पर ड्रोन रोकने की नहीं है। असली चुनौती उस नेटवर्क को रोकने की है जो सीमा के उस पार बैठे व्यक्ति और सीमा के इस पार मौजूद भारतीय युवाओं के बीच संपर्क स्थापित करता है। पंजाब के सीमावर्ती जिलों से अक्सर नाबालिगों तक के ड्रग्स और हथियार तस्करी में इस्तेमाल होने की खबरें सामने आती हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 14 महीनों में 54 नाबालिगों को सीमा-पार ड्रग्स और हथियार तस्करी से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया। यह आंकड़ा केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, यह इस बात का संकेत है कि अपराध और सीमा-पार नेटवर्क किस तरह हमारी युवा पीढ़ी को अपनी गिरफ्त में लेने का प्रयास कर रहे हैं। पंजाब के आगामी 2027 विधानसभा चुनाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चुनावी समय में सोशल मीडिया पर अफवाह, धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली सामग्री, फर्जी नैरेटिव और विदेशी प्रभाव की संभावना पर सुरक्षा एजेंसियों को विशेष निगरानी रखनी चाहिए लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है, किसी राजनीतिक दल, नेता या समुदाय पर बिना ठोस प्रमाण विदेशी एजेंसियों से संबंध होने का आरोप लगाना स्वयं लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए नुक्सानदायक होगा।
पंजाबी भाषा को किताब से करियर तक पहुंचाने की जरूरत
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह किसी समाज की पहचान, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों से उसके जुड़ाव का आधार भी होती है लेकिन आज पंजाबी भाषा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि पंजाबी बोलने वाले कम हो रहे हैं, बल्कि यह है कि नई पीढ़ी के एक हिस्से के मन में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि पंजाबी पढ़ने से रोजगार और करियर के अवसर सीमित हो जाते हैं। इस सोच को बदलना आज समय की सबसे बड़ी जरूरत है। दरअसल, जब तक किसी भाषा को रोजगार और भविष्य से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक केवल भावनात्मक अपील के सहारे युवाओं को उससे जोड़कर रखना कठिन होगा। अभिभावक स्वाभाविक रूप से चाहते हैं कि उनका बच्चा ऐसी शिक्षा प्राप्त करे जिससे उसके सामने अधिक से अधिक करियर विकल्प खुलें। इसलिए पंजाबी को भी युवाओं के लिए संभावनाओं की भाषा के रूप में प्रस्तुत करना होगा। इसी दिशा में पंजाबी हेल्पलाइन के मुखिया प्रकाश सिंह गिल और उनकी टीम के द्वारा निरन्तर प्रयास किए जा रहे हैं। उनका जोर केवल छात्रों को पंजाबी विषय लेने के लिए प्रेरित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह यह समझाने की कोशिश की जाती हैं कि पंजाबी भाषा के माध्यम और विषय के साथ भी युवा उच्च शिक्षा और प्रतिष्ठित सेवाओं तक पहुंच सकते हैं।
बंदी सिखों के नाम पर राजनीति कब तक?
Summary :
बंदी सिखों का मुद्दा पिछले लंबे समय से सिख राजनीति का एक प्रमुख विषय बना हुआ है। चुनाव आते ही अकाली दल और विभिन्न पंथक संगठन बंदी सिखों की रिहाई को लेकर आवाज बुलंद करते हैं, धरने-प्रदर्शन होते हैं, बयान जारी किए जाते हैं और सरकारों को कठघरे में खड़ा किया जाता है लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी वहीं खड़ा है, आखिर बंदी सिखों की समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं निकल पाया? शायद आम सिख समाज के एक बड़े हिस्से को यह भी पूरी तरह मालूम नहीं कि ‘बंदी सिख’ कहे जाने वाले व्यक्तियों का मामला वास्तव में…


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