बांग्लादेश का नया राजनीतिक मोड़

बांग्लादेश में तारिक रहमान की पार्टी बीएनपी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आ गई है। यह जनादेश अपने आप में अभूतपूर्व है। तारिक रहमान ने 17 वर्ष निर्वासन के लंदन में बिताए। अब वह देश के प्रधानमंत्री का ताज पहनेंगे। इस जनादेश का महत्वपूर्ण पहलू यह है ​िक बांग्लादेश के अवाम ने कट्टरपंथी ताकतों को करारी हार दी है। कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी 11 दलों का गठबंधन था और भारत आैर हिन्दू विरोधी राजनीति का धुरी रहा। इन चुनावों में उसका इस्लामिक एजैंडा लोगों ने खारिज कर दिया। चुनावों के साथ-साथ बांग्लादेश की काम चलाऊ मोहम्मद यूनुस सरकार के 84 सूत्री जुलाई नैशनल चार्टर को भी जनमत संग्रह में मंजूरी मिल गई है। इस तरह जनता ने देश का संविधान बदलने और सुधारों के पक्ष में बड़ा फैसला सुना दिया है। इसके साथ ही बांग्लादेश नए राजनीतिक दौर में प्रवेश कर गया है।
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन कोई सामान्य परिवर्तन नहीं है। यह शेख हसीना की अवामी लीग पर प्रतिबंध, उनके भारत निर्वासन और मोहम्मद यूनुस से जुड़े एक अस्थिर अंतरिम दौर के बाद हुआ है। इसमें कोई संदेह नहीं ​िक अवामी लीग की अनुपस्थिति में पार्टी समर्थकों का वोट भी बीएनपी को ​िमला और हिंसा झेलने वाले अल्पसंख्यक हिन्दुओं ने भी बीएनपी को वोट दिया। कम से कम 36 सीटों पर अल्पसंख्यक हिन्दुआें ने चुनावी समीकरण बदलते हुए बीएनपी को जीत दिलाई। बांग्लादेश में हुए जनमत संग्रह का मुख्य उद्देश्य प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा तय करना और भारत की तरह लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाना रहा।
अब तक वहां प्रधानमंत्री के लिए कोई समय सीमा तय नहीं थी। नए सुधारों के तहत प्रधानमंत्री की शक्तियों को संतुलित करने और राष्ट्रपति के अधिकारों को बढ़ाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा न्यायपालिका को पूरी तरह से स्वतंत्र बनाने, अगली सरकार में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने और विपक्षी दलों को भी सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका देने की बात कही गई है। इसमें डिप्टी स्पीकर आैर संसदीय समितियों के अध्यक्ष पद विपक्ष को देने का प्रस्ताव है। इस सुधार पैकेज का एक और बड़ा हिस्सा संसद के ढांचे को बदलना है। अभी तक बांग्लादेश में एक ही सदन था। अब वहां द्विसदनीय संसद बनाने का प्रस्ताव है। इसमें 100 सदस्यों वाला एक ऊपरी सदन होगा। इस सदन का चयन पार्टियों को मिले कुल वोटों के अनुपात में किया जाएगा, किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए इस ऊपरी सदन की मंजूरी अनिवार्य होगी। इसके अलावा चुनाव के दौरान केयरटेकर गवर्नमेंट और चुनाव आयोग के गठन के नियमों में भी बड़े बदलाव किए गए हैं। इन सुधारों का मकसद चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना है। नेशनल कंसेंसस कमीशन ने इन सभी बदलावों को राज्य के पुनर्गठन के लिए जरूरी बताया है। जीत के बाद बांग्लादेश की नई संसद एक संविधान सुधार परिषद के रूप में काम करेगी और नई सरकार को शपथ लेने के 180 कार्य दिवसों के भीतर इन संवैधानिक सुधारों को लागू करना होगा। अब देखना होगा कि तारिक रहमान सरकार सुधारों को लेकर कैसे आगे बढ़ती है। यह बदलाव बांग्लादेश के भविष्य के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकते हैं। भारत और बांग्लादेश के संबंधों में आई कड़वाहट को दूर करने के लिए भी तारिक रहमान सरकार बहुत मायने रखती है। भारत की चिंता जमात-ए-इस्लामी को लेकर भी है जो पाकिस्तान के आतंकी संगठनों और वहां की खुफिया एजैंसी आईएसआई के प्रभाव में है। चुनाव में जमात की हार भारत के लिए बहुत बड़ी राहत है। बीएनपी के साथ भारत के रिश्ते पहले कभी सहज नहीं रहे। तारिक रहमान की मां खालिदा जिया के शासन में भारत विरोधी रवैया ही अपनाया जाता रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तारिक रहमान को फोन पर जीत की बधाई देकर सकारात्मक संकेत दे दिए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने लोकतांत्रिक और प्रगतिशील बांग्लादेश के साथ खड़े रहने का भरोसा दिलाया है, तो बीएनपी की तरफ से भी चुनावों को मान्यता देने पर भारत का आभार जताया गया है और कहा है कि भारत-बांग्लादेश संबंध अब मजबूत होंगे। भारत को उम्मीद है कि तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी सरकार भारत से रिश्तों को नया आयाम देगी। बीएनपी की जीत भारत के लिए राहत भरी खबर इसलिए भी है क्योंकि इस जीत को फिलहाल भारत न तो संकट मानेगा, न ही भारत के लिए अभी कोई जश्न का मौका ही होगा। इस तरह से कहें तो बीएनपी की जीत भारत के लिए एक लिटमस टेस्ट की तरह होगा। क्योंकि दोनों देशों के लिए सुरक्षा सहयोग, विदेश नीति का संतुलन और आर्थिक साझेदारी आगे का रास्ता तय करेंगे। ऐसे में देखना होगा कि बांग्लादेश की नई सरकार के साथ भारत के रिश्ते किस दिशा में जाते हैं। अगर रहमान की बीएनपी दोस्ती का हाथ बढ़ाएगी और भरोसा दे पाएगी तो भारत सहयोग बढ़ाएगा और प्रैक्टिकल होकर अपने नए विकल्पों के साथ आगे बढ़ेगा।
भारत अभी यह भी देखेगा कि बीएनपी चीन आैर पाकिस्तान के साथ कितनी​​ निकटता बढ़ाती है। अगर बीएनपी संतुलन बनाकर चलती है तो भारत के लिए सहजता होगी। दक्षिण एशिया में बांग्लादेश भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है। भारत की एक्ट ईस्ट नीति में भी बांग्लादेश का महत्वपूर्ण स्थान है। दक्षिण एशिया में संतुलन बहुत जरूरी है। तारिक रहमान ने चुनाव प्रचार से लेकर अब तक भारत के प्रति संयमित आैर तटस्थ रुख अपनाया है जो अतीत के रिश्तों से अलग है। भारत की चिंता यही है कि हिन्दुआें की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और कट्टरपंथी ताकतों पर ​िनयंत्रण रखा जाए। यद्यपि बीएनपी भारत में रह रहीं शेख हसीना की वापसी की मांग कर रही है और जल बंटवारे तथा सीमा मुद्दे को हल करने का मुद्दा उठा रही है, इसलिए कुछ चुनौतियां सामने आएंगी। तारिक अनवर ने बांग्लादेश फर्स्ट का नारा दिया है। यानी ‘‘ना दिल्ली, ना रावलपिंडी सबसे पहले बांग्लादेश कहकर तटस्थ विदेश नीति का संकेत दिया है। संदेश साकारात्मक है। उम्मीद है कि तारिक रहमान भारत से अपने रिश्ते सुधारेंगे। इसी में दोनों के हित सुरक्षित रहेंगे।

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