हाल के सालों में किसी भी विधानसभा चुनाव प्रचार में खाने-पीने को लेकर इतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी पश्चिम बंगाल के चुनाव में हुई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जब यह डर जताया कि अगर भाजपा सत्ता में आई, तो राज्य के लोगों की थालियों से मांस और मछली गायब हो जाएंगे, तो भगवा पार्टी के नेताओं ने अपनी मांसाहारी पहचान साबित करने में ज़रूरत से ज़्यादा समय लगा दिया। कुछ उम्मीदवारों का हाथों में मछली लेकर घर-घर घूमना तो एक मज़ाकिया नज़ारा था ही, इसके अलावा भाजपा के बड़े नेताओं ने पहले चरण का चुनाव प्रचार एक शानदार बंगाली दावत के साथ खत्म किया, जिसमें राज्य की मशहूर डिश सरसों वाली मछली की करी पर खास ज़ोर दिया गया था। टीवी कैमरों को बुलाया गया ताकि वे केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और दूसरे नेताओं को मछली की करी का लुत्फ़ उठाते हुए फ़िल्मा सकें; उन्हें उम्मीद थी कि इन दृश्यों को देखकर बंगाली वोटर पार्टी की तरफ़ आकर्षित होंगे।
बाद में पीएम मोदी का मुरमुरे से बनाया जाने वाला ‘टी टाइम स्नैक’ झालमुड़ी बहुत चर्चित रहा। उस छोटे से कागज़ के कोन के पैसे देने के लिए अपनी जेब से 10 रुपये का नोट भी निकाला। भाजपा के ‘खाने पर केंद्रित’ 2026 के चुनाव प्रचार की वजह से अब बंगाल के खान-पान की पसंद-नापसंद पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई है।
पवन खेड़ा को लेकर चुप क्यों हो गये सरमा
पवन खेड़ा कहां हैं? कांग्रेस के ये जाने-पहचाने और बेबाक प्रवक्ता, जिन्होंने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी के तीन विदेशी पासपोर्ट को लेकर आरोप लगाकर सरमा को नाराज़ कर दिया था। असम पुलिस द्वारा मानहानि के आरोप में उनके ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज किए जाने के बाद से खेड़ा गायब हो गए हैं। उन्हें आख़िरी बार हैदराबाद में देखा गया था, जहां उनकी पत्नी रहती हैं। लेकिन उस दिन के बाद से, जो कि कई दिन पहले की बात है, उन्हें फिर कभी नहीं देखा गया। ऐसा लगता है कि वे कहीं छिपे हुए हैं और गुवाहाटी हाई कोर्ट के उस फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे हैं, जो उन्होंने अग्रिम ज़मानत के लिए दायर अपनी अर्ज़ी पर मांगा है; इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने उनकी वह ज़मानत रद्द कर दी थी, जो उन्होंने तेलंगाना हाई कोर्ट से किसी तरह हासिल कर ली थी। हैरानी की बात यह है कि सरमा ने भी अब खेड़ा के बारे में चुप्पी साध ली है। खेड़ा द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए गए चौंकाने वाले आरोपों के बाद सरमा ने काफ़ी हंगामा मचाया था और राज्य पुलिस को उनके पीछे लगा दिया था। लेकिन उसके बाद से सरमा की तरफ़ से इस मामले में कोई खास कार्रवाई या प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली है। भाजपा के अंदरूनी लोग सोच रहे हैं कि क्या उन्हें अपनी पत्नी से जुड़े विवाद पर चुप रहने के लिए कहा गया है। इस बीच, खेड़ा की गैरमौजूदगी की वजह से कांग्रेस की ब्रीफिंग का असर कम हो गया है। उन पर भरोसा किया जा सकता था कि वे अपनी तीखी प्रेस कॉन्फ्रेंस और भाजपा की आलोचना करने वाले ट्वीट्स से विवाद खड़े करेंगे। कांग्रेस के हलकों में यह चर्चा है कि उन्हें कब तक छिपकर रहना पड़ेगा।
राघव और आप के बीच जंग कर परिणाम सामने आया
आम आदमी पार्टी के बागी राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा और उनकी पार्टी के बीच जंग का परिणाम सामने आ गया है। राघव चढ्ढा ने केजरीवाल को झटका देते हुए कई राज्यसभा सांसदों के साथ पार्टी को तोड़ दिया और भाजपा में अपने गुट का विलय करने का ऐलान कर दिया। आप के एक प्रवक्ता ने हाल ही में आरोप लगाया था कि चड्ढा ने पार्टी के साथी और राज्यसभा सांसद अशोक कुमार मित्तल के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी करवाने के लिए भाजपा नेताओं से गुपचुप मुलाकात की थी। मित्तल को राज्यसभा में आप का उप-नेता चड्ढा की जगह नियुक्त किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि संसद के ऊपरी सदन में पार्टी के पद से चड्ढा को हटाए जाने के कुछ ही दिनों के भीतर ईडी ने मित्तल से जुड़े दफ्तरों और ठिकानों पर छापेमारी की। मित्तल पंजाब में कई शिक्षण संस्थानों के मालिक हैं, जिनमें फगवाड़ा स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी भी शामिल है। ईडी ने दावा किया है कि ये छापेमारी मित्तल के संस्थानों के खिलाफ फेमा जांच के सिलसिले में की गई थी। जिस बात ने शक पैदा किया है, वह है छापेमारी का समय। ये छापेमारी तब हुई, जब चड्ढा को राज्यसभा में उप-नेता के पद से हटा दिया गया था और उनकी जगह मित्तल को नियुक्त किया गया था। अब मित्तल भी राघव चढ्ढा के साथ आम आदमी पार्टी से बगावत करके भाजपा में शामिल हो गये हैं। आप प्रवक्ता द्वारा उठाया गया दूसरा दिलचस्प मुद्दा वह ‘जैड प्लस’ सुरक्षा थी, जो चड्ढा को उप-नेता के पद से हटाए जाने के बाद दी गई थी। प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि जब वह भाजपा के शीर्ष नेताओं से मिले थे, तो उन्होंने सुरक्षा की इस सर्वोच्च श्रेणी की मांग इस आधार पर की थी कि पार्टी के कार्यकर्ता उन पर शारीरिक हमला कर सकते हैं।
चुनावी भविष्यवाणी करना आसान नहीं ?
तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चल रहे विधानसभा चुनावों के नतीजों की भविष्यवाणी करने वाला चुनावी विश्लेषक इतिहास में अपना नाम दर्ज कराएगा। जहां केरल और असम में चुनाव काफी सीधे-सादे हैं, वहीं तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनावी समीकरण इतने पेचीदा हैं कि चुनावी विश्लेषक भी उलझन में पड़ गए हैं। अभिनेता विजय के चुनावी मैदान में उतरने से डीएमके और अन्नाद्रमुक के बीच चली आ रही पारंपरिक दो-ध्रुवीय लड़ाई अब त्रिकोणीय मुकाबले में बदल गई है, और चुनावी विश्लेषकों ने टेलीविजन पर यह स्वीकार किया है कि वे किसी नतीजे की भविष्यवाणी करने में हिचकिचा रहे हैं। हालांकि, सबसे ज्यादा उलझाने वाला चुनाव पश्चिम बंगाल में हो रहा है, जहां चुनाव आयोग ने जल्दबाजी और लापरवाही भरे ‘एसआईआर’ (मतदाता सूची संशोधन) अभियान के जरिए स्थिति को और भी ज्यादा अस्पष्ट बना दिया है, जिसके चलते मतदाता सूची से करोड़ों नाम हटा दिए गए हैं। 29 अप्रैल के एग्जिट पोल देखना दिलचस्प होगा। कौन सा पोलस्टार, खासकर पश्चिम बंगाल के मामले में, जोखिम उठाने की हिम्मत करेगा?
बंगाल के खान-पान की पसंद-नापसंद रही चर्चा में
Summary :
हाल के सालों में किसी भी विधानसभा चुनाव प्रचार में खाने-पीने को लेकर इतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी पश्चिम बंगाल के चुनाव में हुई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जब यह डर जताया कि अगर भाजपा सत्ता में आई, तो राज्य के लोगों की थालियों से मांस और मछली गायब हो जाएंगे, तो भगवा पार्टी के नेताओं ने अपनी मांसाहारी पहचान साबित करने में ज़रूरत से ज़्यादा समय लगा दिया। कुछ उम्मीदवारों का हाथों में मछली लेकर घर-घर घूमना तो एक मज़ाकिया नज़ारा था ही, इसके अलावा भाजपा के बड़े नेताओं ने पहले चरण का चुनाव प्रचार एक शानदार बंगाली…


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