व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का ज्ञान

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी शब्द पत्रकार जगत ने गढ़ा है। यह एक व्यंग्यात्मक शब्द है, जिसका उपयोग व्हाट्सएप पर प्रसारित होने वाले अविश्वसनीय भ्रामक या फर्जी खबरों, इ​ितहास को तोड़-मरोड़ कर परोसी जा रही गलत जानकारी के संदर्भ में किया जाता है। पिछले कुछ समय से समाज की सामूहिक समझ को आकार देने में व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। इस भूमिका का सकारात्मक पहलू भी है, तो दूसरा पहलू नकारात्मक भी है। देश की सर्वोच्च अदालत ने सबरीमला मंदिर में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और ​िवभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और उसके दायरे को लेकर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि वह सभी प्रख्यात लेखकों और विचारों का सम्मान करता है लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से मिली जानकारी या ज्ञान को स्वीकार नहीं किया जा सकता। 9 जजों की संविधान पीठ ने दाऊदी बोहरा समुदाय की ओर से पेश वकील की दलील पर यह​ टिप्पणी की। सीजीआई सूर्यकांत ने भी स्पष्ट किया कि हम सभी प्रख्यात न्यायविदों और बुद्धिजीवियों का सम्मान करते हैं लेकिन उनकी राय व्यक्तिगत होती है।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी व्हाट्सएप की नकारात्मक भूमिका को उजागर करने के लिए काफी है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी कोई शिक्षण संस्थान नहीं है बल्कि उन लोगों पर तीखा प्रहार करती है जो व्हाट्सएप पर प्रसारित हर बात पर विश्वास कर लेते हैं, चाहे वह फर्जी ही क्यों न हो। हाल ही के वर्षों में व्हाट्सएप राजनीतिक संदेशों और दुष्प्रचार के प्रसार के माध्यम से एक बड़ा प्रभावी मंच बन गया है। इससे समाज के हर आयु के वर्ग के लोगों की मानसिकता कुंद हो रही है। लगभग सभी राजनीतिक दल और उनके आईटी सेल इस प्लेटफार्म का इस्तेमाल झूठ और दुष्प्रचार फैलाने के लिए करते हैं। वहीं धार्मिक संगठन कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने वाले आतंकवादी संगठन, नफरत आैर हिंसा फैला रहे हैं। समाज में नफरत का बाजार गर्म है। यह वास्तविकता है कि लोग जिज्ञासु होते हैं आैर उन्हें ज्ञान की प्यास होती है। व्हाट्सएप पर शेयर आैर फॉरवर्ड मैसेज इसी उद्देश्य को पूरा करने का प्रयास करते हैं। समस्या यह है कि ऐसे संदेश जिन्हें आमतौर पर हानि रहित माना जाता है। गलत सूचना और भ्रामक जानकारी फैलाने में सक्षम होते हैं। गलत संदेशों से कई बार देश में साम्प्रदायिक हिंसा की स्थिति पैदा हो जाती है। कुछ वर्ष पहले बच्चे चोरी होने की अफवाहें फैलाने से कुछ लोगों की हत्याएं भी हो चुकी हैं। हिंसा की सुनियोजित साजिशों के पीछे भी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का ज्ञान काम कर रहा है। आम लोगों की धारणाओं आैर सोच को आकार देने में इतिहास विदों की भूमिका सीमित होती है लेकिन आज के दौर में इतिहास विदों का मजाक उड़ाया जा रहा है।
वैज्ञानिकों के तार्किक आधारों को हवा में उड़ाया जा रहा है। राजनीतिक ताकतें इतिहास और विज्ञान को ​िवकृत ढंग से प्रस्तुत कर अपनी विचारधारा फैलाने के ​िलए अभियान चलाए हुए है। राजनीतिक ताकतें व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर अपने फायदे के​ लिए ऐसी सामग्री परोस रही हैं जिसके आधार पर जनाधार बनाया जाता है। लोगों के दिमाग में यह भर दिया जाता है कि यह करना समाज और उनके हित में है। ऐसी स्थिति में सच छिप जाता है और राजनीतिक दल चतुराई से अपना एजैंडा लागू कर देते हैं। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर चाहे अमेरिका, ईरान, इजराइयल युद्ध हो या फिर कोई और युद्ध, धड़ाधड़ ज्ञान परोसा जा रहा है। सभी सोशल मीडिया मंचों पर हिन्दू-मुस्लिमों में जहर फैलाने की सामग्री परोसी जा रही है। हर कोई डॉक्टर, हर कोई पुलिस, हर कोई पत्रकार, सम्पादक और आधा-अधूरा ज्ञान देने वाले वैज्ञानिक या इतिहासकार बन चुके हैं और इन सभी के पास आप के सभी सवालों के जवाब हैं। आप को ​िसर्फ इतना करना है कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर उंगलियां चलाइये। बेरोजगारी हो, भुखमरी हो, युवतियों से बलात्कार हो या यौन पिपासु भोगी बाबाओं की खबर हो, आप को कहीं जाने की जरूरत नहीं, झट से आपको खबर मिल जाएगी। कभी-कभी तो ऐसा काल्पनिक जाल रचा जाता है ​जैसे देश में बेटियां बेखौफ घूम रही हों। पेड़ों पर फलों की बजाय नोट लग रहे हों। लम्बे चमचमाते हाईवे पर बेशकीमती गाड़ियां भाग रही हों। प्रदूषण का नाम निशान नहीं हो। आकाश साफ नीला दिखाई दे रहा हो। ऐसी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी को झुक कर नमस्कार करने को दिल करता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा मिसइंफॉर्मेशन है। वैसे हमारे बड़े-बुजुर्ग कहकर ही गए हैं कि ‘अधजल गगरी छलकत जाए’, इस मुहावरे का सीधा-सपाट मतलब है कि जिन लोगों के पास कम ज्ञान या जानकारी होती है, वो शेखी ज्यादा बघारते हैं यानी उसका बखान ज्यादा करते हैं। फेक न्यूज या मिसइंफॉर्मेशन के संदर्भ में भी ये बात सटीक साबित होती है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर लोगों को सही फैक्चुअल जानकारी नहीं मिलती, इसलिए ये आने वाले समय में लोगों के लिए बड़ा खतरा साबित होने वाली है। इससे एक बात तो साफ है कि आने वाले सालों में ‘फैक्ट चेक’ के काम की जरूरत और बढ़ सकती है। मिसइंफॉर्मेशन के बाद दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बाढ़-सूखा जैसी अन्य प्राकृतिक आपदा है। जबकि अगले 10 साल के अनुमान में ये दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इससे एक बात तो साफ है कि आने वाले दिनों में ‘जलवायु परिवर्तन’ एक बड़ा खतरा बनने जा रहा है। इस रिपोर्ट में समाज के अंदर ध्रुवीकरण बढ़ने को तीसरा, साइबर असुरक्षा को चौथा, अलग-अलग देशों के बीच युद्ध को पांचवां, लोगों के लिए आर्थिक अवसर में कमी आना 6वां, महंगाई को 7वां, मजबूरी में पलायन 8वां, आर्थिक मंदी के आसार’ को 9वां और प्रदूषण को 10वां सबसे बड़ा जोखिम माना गया है। देशवासियों को सतर्क होकर अपनी स्वतंत्र विचारधारा बनानी होगी। आम जनता की धारणाएं साम्प्रदायिक नहीं बल्कि भाईचारे को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए। जनता की सोच वैज्ञानिक और भारतीय राष्ट्रवाद के मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए। सामाजिक संस्कार और पारिवारिक मूल्यों को बचाने की चुुनौती भी समाज के सामने है। बेहतर यही होगा कि समाज व्हाट्सएप ​यूनिवर्सिटी के ज्ञान से बचे और विवेक से काम लें।

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