प. बंगाल और तमिलनाडु के मतदाताओं ने इस बार मत देने में जो नया रिकाॅर्ड बनाया है उसका स्वतन्त्र भारत के संसदीय इतिहास में कोई तोड़ नहीं है। यह रिकाॅर्ड इस हकीकत के बावजूद बना है, जबकि दोनों ही राज्यों में कुल मतदाताओं की संख्या में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण के चलते क्रमश: 12 प्रतिशत व पांच प्रतिशत मतदाताओं की संख्या घटी थी। बंगाल में मतदान प्रतिशत लगभग 93 प्रतिशत और तमिलनाडु में 85 प्रतिशत से ऊपर रहा। यह मतदान प्रतिशत 1952 के प्रथम चुनावों से लेकर अभी तक का सर्वाधिक है। तमिलनाडु में इससे पूर्व सर्वाधिक मतदान 2011 के विधानसभा चुनावों में 78.29 प्रतिशत हुआ था। इसी प्रकार बंगाल में भी 2011 के विधानसभा चुनावों में 84.72 प्रतिशत का रिकाॅर्ड बना था। बंगाल में कुल 294 विधानसभा सीटें हैं जिनमें से 23 अप्रैल को केवल 152 सीटों पर ही मतदान हुआ था, जबकि तमिलनाडु में कुल 234 सीटें हैं जिन पर सभी में मतदान हुआ था। प. बंगाल के सन्दर्भ में इस रिकाॅर्ड बम्पर मतदान को लेकर सत्तारूढ़ ममता दीदी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी व विरोधी भारतीय जनता पार्टी परस्पर अपनी जीत के दावे ठोक रही हैं। इसके साथ ही राजनीतिक विश्लेषक व पंडित भी भारी गफलत में नजर आ रहे हैं । कुछ कह रहे हैं कि यह सत्ता के विरुद्ध जनरोष है जबकि कुछ कह रहे हैं कि इसका अर्थ वर्तमान सत्ता को कायम रखना है क्योंकि इन दोनों तर्कों के पक्ष में ही पिछले कुछ उदाहरण हैं, परन्तु विश्लेषक और पंडित उस मूल डर की वजह को पकड़ने से कतरा रहे हैं जो मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान आम मतदाता के मन में बैठ गया था। यह डर इस बात का था कि यदि किसी मतदाता का नाम सूची में दर्ज नहीं होता है तो उसकी नागरिकता भी खतरे में पड़ सकती है। दूसरे चुनाव आयोग ने जितनी बेरहमी से नागरिकों के नाम मतदाता सूचियों से काटे उसकी वजह से उनमें चुनाव आयोग के प्रति भारी क्रोध जाग्रत हुआ और उन्होंने बदले में अपनी पूरी ताकत के साथ मतदान में हिस्सा लिया। बंगाल में जिन मतदाताओं के नाम कटे उनमें हिन्दू व मुसलमान दोनों ही बराबर की संख्या में हैं। अतः यह कहना उचित नहीं है कि केवल मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं के नाम ही कटे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि बंगाल के मुर्शीदाबाद जिले की समसेरगंज विधानसभा चुनाव क्षेत्र में पूरे राज्य में सबसे ज्यादा वोटरों के नाम सूची से उड़ाए गये। इस क्षेत्र में 23 अप्रैल को 96 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ। इसी प्रकार जिले की लालगोला, भगवानगोला, रघुनाथ गंज, व फरक्का सीटों पर कुछ में 97 प्रतिशत तक मतदान हुआ। यह जिला मुस्लिम बहुल है। मगर 23 अप्रैल के पहले चरण में जिन हिन्दू बहुल जिलों में मतदान हुआ औऱ वहां भी भारी संख्या में वोट काटे गये, उनमें भी मतदान का प्रतिशत 94 के करीब रहा। पहले चरण में कुल 16 जिलों में मतदान हुआ था। अतः यह तर्कपूर्ण लगता है कि मतदान का बढ़ा हुआ प्रतिशत चुनाव आयोग की वोटर काटने की प्रतिक्रिया है। यही वजह रही कि जिस परिवार के यदि दो सदस्यों के वोट भी कटे तो बाकी सभी सदस्यों ने बड़ी बेताबी से मतदान में हिस्सा लिया। बेशक यह सही है कि मुस्लिम मतदाताओं में डर का भाव ज्यादा था क्योंकि उन्हें डर था कि यदि उन्होंने इस बार अपना वोट दर्ज नहीं कराया तो उन्हें घुसपैठिया करार दिया जा सकता है और उनकी नागरिकता जा सकती है। कमोबेश यह डर हिन्दू मतदाताओं में भी था, क्योंकि 1947 में बंटवारे के समय पूर्वी पाकिस्तान से हिन्दू नागरिक भी भारी संख्या में भारत आये थे, परन्तु इतने अधिक मतदान के बावजूद 23 अप्रैल को जो वोट डाले गये वे 2021 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले इन 152 क्षेत्रों में 12 प्रतिशत कम थे। इस बार पिछले चुनावों के मुकाबले 47 लाख कम मतदाताओं ने वोट डाले। यह भी इस बात का सबूत है कि जिस मतदाता का नाम भी पुनरीक्षित सूची में था उसने वोट डालना अपना धर्म माना। बंगाल में पुनरीक्षण का काम पिछले वर्ष अक्तूबर महीने से शुरू हुआ था। बंगाल में कुल आठ करोड़ से कुछ कम मतदाता थे, मगर चुनाव आयोग ने 91 लाख से कुछ अधिक मतदाताओं के नाम काट दिये जिसकी वजह से कुल मतदाता 7 करोड़ के करीब रह गये। प्रथम चरण में कुल तीन करोड़ 60 लाख मतदाता पंजीकृत थे जिनमें से तीन करोड़ 34 लाख ने मताधिकार का प्रयोग किया जो कि पिछली बार से 47 लाख कम है। अतः हर पंजीकृत मतदाता ने भरसक प्रयत्न किया कि वह अपना मत जरूर डाले। इसी वजह से मतदान का प्रतिशत रिकार्ड स्तर तक पहुंचा। इसलिए इस विषय में ज्यादा माथा-पच्ची करने की जरूरत नहीं है। राजनीति वैसे भी विज्ञान कही जाती है अतः हर क्रिया की प्रतिक्रिया होना इसमें भी जरूरी होता है। इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में काम करने वाले बंगाली मतदाता अपना वोट डालने के लिए 23 अप्रैल तक बंगाल के अपने गांव तक पहुंचे और इसके लिए उन्होंने भारी खर्चा भी उठाया। यह अपनी नागरिकता को बचाये रखने का डर ही था जिसकी वजह से रिकाॅर्ड मतदान हुआ है। इसके साथ यह भी सत्य है कि बंगाल की जनता राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक है और वह चुनावों को एक यज्ञ के रूप में लेती है तथा सत्ता में अपनी भागीदारी का इसे सक्रिय औजार मानती है। इसके बहुत से एेतिहासिक कारण भी हैं। इसी वजह से बंगाल को भारत का दिमाग और पंजाब को भारत की ताकत तक कहा जाता था। इसके पीछे के राजनीतिक कारण बहुत स्पष्ट हैं। दुर्भाग्य से 1947 में ही इन दोनों राज्यों का हिन्दू–मुसलमान के आधार पर बंटवारा होकर पाकिस्तान का निर्माण हुआ था। अब हम तमिलनाडु को लें तो यहां भी रिकाॅर्ड मतदान हुआ है। इस राज्य में भी मतदान बढ़ने का मोटा–मोटा कारण यही है, क्योंकि इस राज्य में भी चुनाव आयोग ने भारी संख्या में मतदाताओं की छंटनी की है। वैसे इससे लगे पुडुचेरी केन्द्र प्रशासित क्षेत्र में विगत 9 अप्रैल को 89 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ था। तमिलनाडु भी राजनीतिक रूप से बहुत सचेत राज्य माना जाता है मगर यहां क्षेत्रीय दलों का विशेष प्रभाव तमिल या द्रविड़ उप राष्ट्रीयता की वजह से 1967 के बाद से रहता आया है। 1967 तक यहां कांग्रेस का ही राज था। मगर अब यह पार्टी क्षेत्रीय दल द्रमुक की पिछलग्गू बन कर रह गई है। इस राज्य में बढे़ हुए मतदान का अर्थ भी मतदाताओं द्वारा अपनी भारतीय पहचान को सर्वोपरि रखना माना जा रहा है। एक मायने में चुनाव आयोग ने इस सन्दर्भ में हर प्रदेश के नागरिक में भारतीयता को उभारने का काम अनजाने में ही कर डाला है। विभिन्न आलोचनाओं के बावजूद इस काम का श्रेय़ तो उसे देना ही होगा।
बंगाल, तमिलनाडु में रिकाॅर्ड मतदान का असली मतलब
Summary :
प. बंगाल और तमिलनाडु के मतदाताओं ने इस बार मत देने में जो नया रिकाॅर्ड बनाया है उसका स्वतन्त्र भारत के संसदीय इतिहास में कोई तोड़ नहीं है। यह रिकाॅर्ड इस हकीकत के बावजूद बना है, जबकि दोनों ही राज्यों में कुल मतदाताओं की संख्या में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण के चलते क्रमश: 12 प्रतिशत व पांच प्रतिशत मतदाताओं की संख्या घटी थी। बंगाल में मतदान प्रतिशत लगभग 93 प्रतिशत और तमिलनाडु में 85 प्रतिशत से ऊपर रहा। यह मतदान प्रतिशत 1952 के प्रथम चुनावों से लेकर अभी तक का सर्वाधिक है। तमिलनाडु में इससे पूर्व सर्वाधिक मतदान 2011 के…


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