हर घर रोशन हो

Summary :

उम्मीद का दीपक, हृदय में जलता, अंधेरों के बीच रास्ता बनाता। जब रात घनेरी छा जाए आकाश,न तारा दिखे न चांद का प्रकाश। तब मन के कोने में एक चिंगारी,जगाए उजाला बने उजियारी। वह दीपक छोटा पर शक्ति अपार, हर मुश्किल में देता विश्वास का आधार। आज समूचा भारत दीप पर्व मना रहा है। कहते हैं जहां-जहां तमस वहां-वहां प्रकाशदीप। भारत दीपावली की रात दिव्य दीपशिखा हो जाता है। घर-आंगन तुलसी के चैबारे, अमीरों के महलों से लेकर गरीबों की झोपड़ियों, खेत, गांव, मकान, दुकान सब तरफ दीपशिखा ही दिखाई देती है। दीपावली पर्व के धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक पहलू…

उम्मीद का दीपक, हृदय में जलता, अंधेरों के बीच रास्ता बनाता।
जब रात घनेरी छा जाए आकाश,न तारा दिखे न चांद का प्रकाश।
तब मन के कोने में एक चिंगारी,जगाए उजाला बने उजियारी।
वह दीपक छोटा पर शक्ति अपार, हर मुश्किल में देता विश्वास का आधार।

आज समूचा भारत दीप पर्व मना रहा है। कहते हैं जहां-जहां तमस वहां-वहां प्रकाशदीप। भारत दीपावली की रात दिव्य दीपशिखा हो जाता है। घर-आंगन तुलसी के चैबारे, अमीरों के महलों से लेकर गरीबों की झोपड़ियों, खेत, गांव, मकान, दुकान सब तरफ दीपशिखा ही दिखाई देती है। दीपावली पर्व के धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक पहलू भी हैं। परन्तु यह उत्सव केवल बाहर के दीये जलाने के लिए नहीं है। अंदरूनी प्रकाश आना जरूरी है। प्रकाश का अर्थ है स्पष्टता। अगर आपके भीतर उजाला नहीं है तो बाहरी प्रकाश का कोई फायदा नहीं है। यह उत्सव समाज की सामूहिक समृद्धि, आपसी सौहार्द और विकेन्द्रीकृत, आर्थिक व्यवस्था का प्रतीक है लेकिन वर्तमान काल खंड ने बहुत कुछ बदल दिया है। समाज में विरोधाभासी परिदृश्य दिखाई दे रहे हैं। बढ़ते उपभोक्तावाद और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और कार्पोरेट सैक्टर ने उत्सव को विशुद्ध बाजार में बदल दिया है।
दीपावली के सांस्कृतिक मूल्य कहीं दिखाई नहीं देते और ऑनलाइन प्लेटफार्मों ने अरबों-खरबों का राजस्व जुटाने के लिए ऐसा आभासी मायाजाल बिछा दिया है जिसने सबको निगल लिया है। लोग भूल चुके हैं कि इस रोशनी में थोड़ा सा हिस्सा उसका भी है जिसने चाक पर गीली मिट्टी रखकर दीपक को आकार दिया है। इस रोशनी में थोड़ा सा हिस्सा उसका भी है जिसने दीपक की बाती के लिए कपास उगाया है। थोड़ा सा हिस्सा उसका भी है जिसके पसीने से तेल बना है। इस रोशनी में थोड़ा सा हिस्सा उस अंधेरे का भी है जो दीये के नीचे चुपचाप पसरा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्सव का देश के अर्थतंत्र से सीधा संबंध है। यह बात हर भारतीय के लिए काफी सुखद है कि जब पूरी दुनिया युद्धों के परिणामों से त्रस्त है और कई देश आंतरिक तूफानों को झेल रहे हैं लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था के सभी संकेतक बेहतर परिणाम दे रहे हैं। तमाम चुनौतियों के बावजूद भारत गरीबी से उभर रहा है। सामाजिक रूप से कभी-कभी हमें ऐसी घटनाएं देखने को मिल जाती हैं जो साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए खतरा पैदा करती हैं।
अगर परिवारों की बात करें तो कभी वह दौर था जब परिवार एकजुट होकर गांव पूरा इकट्ठा होकर दीवाली मनाता था। आज परिवार खंडित हो चुके हैं। परिवारों के भीतर समझ, सहयोग और स्नेह का अभाव है। परिवारों के आपसी रिश्ते मजबूत नहीं रहे। पारिवारिक ताना-बाना ध्वस्त होता दिखाई दे रहा है। समाज में समरस्ता, भाईचारे का अभाव है। याद रखना होगा कि परिवार मजबूत होने से ही समाज सुदृढ़ होता है। समाज से ही मजबूत राष्ट्र बनता है। यह भी वास्तविकता है​ कि रुपया बड़ा शक्तिशाली होता है। ऋगवेद में मुद्रा को देवता जैसा शक्तिशाली बताया गया है। रुपया वहरूपिया है। दीपावली लक्ष्मी अराधना का मुहूर्त है। लक्ष्मी मनुष्य को धन अर्जन, शुभ लाभ देती है। शुभ लाभ भारतीय चिंतन का विकास है लेकिन देश के कुछ व्यापारिक घराने भ्रष्टाचार और घोटालों के चलते लगातार संपदा अर्जित करते जा रहे हैं। जबकि मजदूरों, किसानों का लगातार शोषण हो रहा है। युवा वर्ग में भी असंतोष दिखाई देता है। कट्टरपंथी विचारधाराएं युवा वर्ग को घेर रही हैं और समाज में अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। यह सही है कि भारत ने विकसित राष्ट्र की ओर कदम बढ़ाए हैं। हमारा सपना एक आत्मनिर्भर समृद्ध और खुशहाल भारत का है। हम आधुनिकता के साथ जीवन यापन करें लेकिन हमें अपनी जड़ों से कटना नहीं चाहिए। हमें सामाजिक समरस्ता, परिवार प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, नागरिक कर्त्तव्यों के पालन और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने का संकल्प लेना होगा। लोग अपने घरों की सफाई तो करते हैं लेकिन घरों का कचरा बाहर फैंक देते हैं। बाजार में मादक क्रांति है, गरीब देखकर हैरान हैं कि वह करें तो क्या करें। दीवाली नाक का सवाल बन गई है। खरीदारी स्टेटस सिम्बल बन चुकी है। जिसने खरीदारी नहीं की वह उत्सव से बाहर हो गया। ऋगवेद में एक सूक्त का अर्थ है कि सौ हाथों से धन कर अर्जन करो और हजार हाथों से उसका समाज में वितरण कर दो। धन चंद लोगों के हाथ में नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज में हाशिये पर बैठे लोगों तक भी पहुंचना चाहिए अन्यथा अर्थतंत्र का कोई मतलब नहीं रह जाता।
अर्थव्यवस्था का लाभ समाज के हर वर्ग को मिलना ही चाहिए। दीपावली पर हमें संकल्प लेना होगा कि हम स्वदेशी उत्पादों का समर्थन करेंगे जिससे देश के श्रमिकों, कारीगरों के घर में पैसा जाए। हमारे मन में सामूहिकता का भाव हो। पंजाब केसरी के पाठकों को दीपावली की शुभकामनाएं देते हुए यही कामना है कि हर घर रोशन हो। दीपावली भारत में जन गन मन को आलौकित करे, आभा दे और दीपशिखा की प्रभा दे।

Aditya Chopra

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