विभाजन की दास्तानों का डिजिटल व दस्तावेजीकरण

Summary :

न घाव भरे, न चर्चाएं थमीं। संग्रहालय भी बन गए, अमृतसर में, दिल्ली में (दारा शिकोह लायब्रेरी) और पाकिस्तान में लाहौर के बीचोंबीच। अब दिल्ली विश्वविद्यालय में विभाजन की दास्तानों का ‘डिजिटल रूप’ और विभाजन संबंधी पुस्तकों का एक संग्रहालय भी बन रहा है। अमृतसर स्थित विभाजन-म्यूजियम की चर्चा में बहुत हो चुकी, हालांकि बीच-बीच में यह ‘म्यूजियम’ बंद हो जाता है। इसे देखने के लिए महंगी-टिकट का प्रावधान भी कभी-कभी चुभता है। थोड़ा लाहौर के म्यूजियम पर भी चर्चा कर लें। वैसे यह म्यूजियम काफी पुराना है, लेकिन विभाजन से संबंधित स्मृतियों के लिए इसी में जिन्नाह के नाम…

न घाव भरे, न चर्चाएं थमीं। संग्रहालय भी बन गए, अमृतसर में, दिल्ली में (दारा शिकोह लायब्रेरी) और पाकिस्तान में लाहौर के बीचोंबीच। अब दिल्ली विश्वविद्यालय में विभाजन की दास्तानों का ‘डिजिटल रूप’ और विभाजन संबंधी पुस्तकों का एक संग्रहालय भी बन रहा है। अमृतसर स्थित विभाजन-म्यूजियम की चर्चा में बहुत हो चुकी, हालांकि बीच-बीच में यह ‘म्यूजियम’ बंद हो जाता है। इसे देखने के लिए महंगी-टिकट का प्रावधान भी कभी-कभी चुभता है। थोड़ा लाहौर के म्यूजियम पर भी चर्चा कर लें। वैसे यह म्यूजियम काफी पुराना है, लेकिन विभाजन से संबंधित स्मृतियों के लिए इसी में जिन्नाह के नाम को समर्पित एक गैलरी है। इस गैलरी में विभाजन के मध्य रेलों के मॉडल भी हैं और पाकिस्तान की स्थापना के लिए मुस्लिम लीग के संघर्ष की दास्तानें भी हैं। वैसे इस म्यूजियम का एक बड़ा भाग अब ‘मिल्ट्री-म्यूजियम’ के रूप में बदल गया है।
80 वर्ष पुराने घाव अब फिर से ताजा होने लगे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में विभाजन-अध्ययन और स्वाधीनता की दास्तान पर शोध एवं दस्तावेजीकरण के लिए ‘सीआईपीएस’ (सेंटर फॉर इंडिपेंडेंस एंड पार्टीशन स्टडीज) के नाम से एक अलग केंद्र स्थापित किया है। यद्यपि यह केंद्र वर्ष 2023 में एक अध्यादेश के अंतर्गत स्थापित किया गया था लेकिन इन दिनों ‘विभाजन के शेष जीवित प्रत्यक्षदर्शियों के अपने संस्मरणों का संकलन हो रहा है।’ विश्वविद्यालय की टीमें अपनी कैमरा-यूनिट्स के साथ उन लोगों के साक्षात्कार ले रही हैं जो अब भी जीवित हैं और उनकी स्मृतियों में विभाजन की त्रासद दास्तानें अभी मौजूद हैं। साथ-साथ ऐसी सामग्री पर शोधार्थियों व सामुदायिक नेताओं की संगोष्ठियां भी आयोजित हो रही हैं और प्रामाणिक स्तर उपलब्ध सामग्री का आकलन भी जारी है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में भारत विभाजन से जुड़े शोध, अध्ययन और कार्यक्रमों के प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं- साक्षात्कार और अभिलेखागार : इस केंद्र के माध्यम से दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले विभाजन पीडि़तों के साक्षात्कार रिकॉर्ड किए जा रहे हैं और उन्हें वीडियो तथा दस्तावेजों के रूप में संग्रहित किया जा रहा है।
शोध-पत्र और साहित्य संग्रह : डीयू के इस केंद्र द्वारा तैयार की गई सूची में विभिन्न भाषाओं की पुस्तकें शामिल हैं। इसमें 245 अंग्रेजी, 31 हिंदी, 87 पंजाबी, 4 उर्दू, 7 बंगाली और अन्य भाषाओं की पुस्तकों के साथ-साथ विभाजन पर कई शोध-पत्र भी संकलित किए गए हैं।
राष्ट्रीय संगोष्ठियां और सेमिनार : डीयू समय-समय पर भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद व अन्य संस्थाओं के सहयोग से ‘भारत विभाजन के सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव’ जैसे विषयों पर राष्ट्रीय संगोष्ठी और सेमिनार आयोजित करता है, जहां शोधार्थियों और विशेषज्ञों द्वारा विभाजन के कारणों और परिणामों पर चर्चा की जाती है। दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता एवं विभाजन अध्ययन केंद्र ने विभाजन के पीडि़तों के साथ 100 साक्षात्कार पूरे कर मौखिक इतिहास का एक डिजिटल संग्रह तैयार किया है। इस पहल का उद्देश्य व्यक्तिगत अनुभवों को संरक्षित करना, इसे राष्ट्रव्यापी स्तर पर विस्तारित करना और भारत के 1947 के विभाजन के मानवीय प्रभाव पर शोध को मजबूत करना है। कुछ कहानियों को भुला देना ही बेहतर होता है जबकि कुछ कहानियों को सामने लाना, उनका उत्खनन करना और आने वाली पीढि़यों के लिए उन्हें पुनर्स्था​िपत करना जरूरी होता है। देश का विभाजन शायद इन दोनों का मिश्रण था लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता और विभाजन अध्ययन केंद्र (सीआईपीएस) के अनुसार, गलतियों को दोहराने से बचने का एकमात्र तरीका उन्हें याद रखना है।
विभाजन से बचे लोगों की कहानियों को संकलित करने का विशाल कार्य इस केंद्र द्वारा किया गया है जो विभाजन की कहानियों को उजागर करने के लिए समर्पित एक शोध विभाग है। हालांकि विभाग ने देश के विभाजन से हुए सांस्कृतिक नुकसान को समझने की दृष्टि से एक यात्रा शुरू की लेकिन एक प्राथमिक परियोजना विभाजन के पीडि़तों का साक्षात्कार लेना और अगली पीढ़ी के लिए उन वृत्तांतों का एक डिजिटल संग्रह बनाना रही। वर्ष 2023 में स्थापित सीआईपीएस ने गत दिवस अपना 100वां साक्षात्कार पूरा किया।
निदेशक डा. रविंद्र कुमार के अनुसार, विभाजन के पीडि़तों से हमें जो कहानियां सुनने को मिलती हैं, उनमें भावनाओं का एक पूरा दायरा समाहित होता है। पाकिस्तान में उनके जीवन से लेकर उनके विस्थापन तक उनके खोए हुए लोगों से लेकर उनके देखे गए दृश्यों तक, और अंत में विभाजन के बाद उन्होंने अपने जीवन का पुनर्निर्माण कैसे किया, हर कहानी अपने आप में एक अनूठी कहानी है।
पीडि़त लोग कष्ट, संघर्ष और घाव भूले नहीं हैं। अब यह हमारी जि़म्मेदारी है कि हम उन कहानियों को इक्ट्ठा करें, उनका विश्लेषण करें और उन्हें समझें ताकि ऐतिहासिक वृत्तांतों में मौजूद कमियों को दूर किया जा सके। इस बीच, केंद्र ने भारत के इतिहास के सबसे उथल-पुथल भरे दौर में से एक को वृत्तांतों के एक सुव्यवस्थित संग्रह में संगठित किया है। साक्षात्कार आयोजित करने के अलावा जिन्हें केंद्र की वेबसाइट और यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया जाता है, केंद्र ने पुस्तकों और अन्य साहित्य की एक सूची भी तैयार की है।
अब तक हम दिल्ली एनसीआर में रहने वाले विभाजन पीडि़तों के साक्षात्कार लेते रहे हैं। हमारा लक्ष्य अब अन्य राज्यों तक विस्तार करना है और हम विभाजन पीडि़तों की कहानियों को बताने में देर होने से पहले यथासंभव अधिक से अधिक लोगों के साक्षात्कार लेने पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं, कुमार ने कहा। यह महत्वपूर्ण है कि आने वाली पीढिय़ां अपने पूर्वजों के इतिहास और उनके बलिदानों के बारे में जानें क्योंकि यह किसी विशेष समुदाय के बारे में नहीं है, यह देश के विभाजन के बारे में है।
केंद्र की वेबसाइट पर उपलब्ध साक्षात्कारों में पीजीडीएवी कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य मोहन लाल अब्रोल, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रो. वाइस चांसलर कपिल कपूर, राजिंदर कुमार मोहता, जिनके पूर्वजों के पास कराची में आलीशान मोहता पैलेस था और कई अन्य नाम शामिल हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति योगेश सिंह, सीआईपीएस के अध्यक्ष रवि प्रकाश टेकचंदानी और सीआईपीएस की संयुक्त निदेशक ज्योति त्रेहन शर्मा के योगदान के बिना केंद्र की सफलता संभव नहीं होती।
इस केंद्र की स्थापना 2023 में व्यापक शोध करने, अभिलेखीय सामग्री एकत्र करने और 1947 के विभाजन से प्रभावित समुदायों के दस्तावेजों, तस्वीरों और मौखिक इतिहास का एक भंडार बनाने की परिकल्पना के साथ की गई थी।

Dr. Chander Trikha