भाजपा व्हाट्सएप की दुनिया में इतनी रच-बस गई है कि संसद के विशेष सत्र के लिए बैकग्राउंड ब्रीफ़ भी केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ़ से इसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए सर्कुलेट किया गया। इसके लिये कई स्थापित नियमों को नज़रअंदाज़ किया गया। विशेष सत्र में जिन संशोधनों पर चर्चा और उन्हें पारित करने की योजना है, वे कानून मंत्रालय के दायरे में आते हैं। लेकिन विपक्ष को इसकी जानकारी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दफ्तर से दी गई। इसके अलावा, ऐसे अहम फैसलों के लिए ब्रीफ़ पर या तो पहले से ही सर्वदलीय बैठक में चर्चा होनी चाहिए, या फिर संबंधित मंत्रालय के लेटरहेड पर सही फ़ॉर्मेट में सर्कुलेट किया जाना चाहिए। यह उन अहम फ़ैसलों के प्रति एक लापरवाह रवैया दिखाता है, जो भारत के चुनावी नक्शे को पूरी तरह बदल देंगे। व्हाट्सएप मैसेज 16 अप्रैल से कुछ ही दिन पहले आया था, जिस दिन सत्र शुरू होना था। बिल खुद सांसदों को सत्र शुरू होने से दो दिन पहले सर्कुलेट किए गए थे। इससे विपक्षी पार्टियों को बिलों का अध्ययन करने और प्रतिनिधि लोकतंत्र के भविष्य पर उनके असर को समझने के लिए बहुत ही कम समय मिल पाया। अगर व्हाट्सएप ही संसदीय संचार का भविष्य बनने वाला है, तो फिर एक विशाल सचिवालय को फंड देने का कोई मतलब नहीं रह जाता, जिसका काम संसद से जुड़े सभी मामलों पर बुलेटिन, संदेश और चिट्ठियों को संभालना होता है।
सांसदों की संख्या बढ़ने के साथ बढ़ेंगे बेतहाशा खर्च
परिसीमन पर चल रही बहस में, एक अहम मुद्दे को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है वह है एक बड़ी संसद से सरकारी खजाने पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ। इस बात पर ज़ोर देना ज़रूरी है कि न सिर्फ़ संसद की सदस्य संख्या 543 से बढ़कर लगभग 816 हो जाएगी, बल्कि पूरे देश की राज्य विधानसभाओं में भी सदस्यों की संख्या में भारी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। सरकारी खजाने पर लोकसभा के पांच साल के कार्यकाल के लिए, लगभग 5,855 करोड़ रुपये आता है। यह तो सिर्फ़ लोकसभा के सांसदों की सैलरी का खर्च है। इसके अलावा, हर सांसद को सांसद निधि के तहत सालाना 5 करोड़ रुपये मिलते हैं; साथ ही मुफ्त आवास, यात्रा भत्ता, मुफ्त चिकित्सा सुविधा, समर्पित स्टाफ़ और जरूरत पड़ने पर सुरक्षा भी मिलती है। फिर, एक और छोटी सी बात है हर उस सांसद के लिए मासिक पेंशन, जो अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करता है। 816 सांसदों की सैलरी पर टैक्स देने वालों को पड़ने वाले खर्च का एक मोटा-मोटा अनुमान 40,000 से 50,000 करोड़ रुपये के बीच है। इसमें अन्य सभी भत्ते और सुविधाएं शामिल नहीं हैं। और अभी राज्य विधानसभाओं में सदस्यों की बढ़ी हुई संख्या के खर्च का हिसाब इसमें शामिल नहीं है चुने हुए प्रतिनिधियों पर ज़्यादा खर्च करने के अलावा, राज्य के खजाने को संसद और राज्य विधानसभाओं के सचिवालय कर्मचारियों का विस्तार करने के लिए, शायद राज्यों में विधानसभा की बढ़ी हुई संख्या को समायोजित करने के लिए नई इमारतें बनाने, सुरक्षा बढ़ाने आदि के लिए और ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे। छिपे हुए खर्च चौंकाने वाले हैं और कोई भी इसके बारे में बात नहीं कर रहा है। हां, आबादी बढ़ी है और मतदाताओं को आनुपातिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। लेकिन एक और तथ्य पर विचार करें। संसद के सत्र छोटे से छोटे होते जा रहे हैं। आज, संसद साल में सिर्फ़ 70 दिन ही मिलती है। लोकसभा के 543 सांसदों में से ज़्यादातर को हंगामे और राजनीतिक दलों को दिए गए कम समय के बीच बोलने का मौका ही नहीं मिलता। 816 सांसद क्या सार्थक योगदान देंगे? यह एक सोचने लायक बात है।
भाजपा ने अन्नाद्रमुक पर ही छोड़ा तमिलनाडु का अभियान
तमिलनाडु में भाजपा कार्यकर्ताओं को शक है कि हाई कमान को आने वाले राज्य विधानसभा चुनाव में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है और उसने चुनाव प्रचार की ज़िम्मेदारी अपने सहयोगी अन्नाद्रमुक पर छोड़ दी है। यह भावना मुख्य रूप से इस वजह से बढ़ रही है कि पार्टी के कभी प्रमुख चेहरे रहे अन्नामलाई को इस चुनाव में किस तरह से किनारे कर दिया गया है। एक समय अन्नामलाई भाजपा में उभरते सितारे थे और उन्हें मुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के तौर पर पेश किया जा रहा था। लेकिन इस बार, उन्हें न सिर्फ़ चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं दिया गया, बल्कि उन्हें चुनाव प्रचार करने की भी इजाज़त नहीं दी जा रही है। इससे पार्टी में कई लोग निराश हैं, जिन्हें लगता था कि उनकी आक्रामकता और ऊर्जा की वजह से वही उनके लिए सबसे अच्छा विकल्प थे। ज़ाहिर है, इस चुनाव के लिए अन्नामलाई को राजनीतिक वनवास पर भेजने का फ़ैसला अन्नाद्रमुक के कहने पर लिया गया था, जिसे वह कभी पसंद नहीं आये। उन्हें लगता है कि वह अन्नाद्रमुक नेताओं पर भारी पड़ जाएंगे और उन्होंने अन्नामलाई को सालों से अन्नाद्रमुक के िखलाफ लगातार चलाए गए अभियान के लिए माफ़ नहीं किया है। हालांकि दूसरी तरफ डीएमके और उसके सहयोगी कांग्रेस के बीच साफ़ तौर पर मनमुटाव दिख रहा है, लेकिन भाजपा की तरफ से कोई जाना-पहचाना चेहरा न होने की वजह से अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन कहीं ज्यादा कमजोर नजर आ रहा है।
क्या भाजपा के लिए व्हाट्सएप ही संदेश देने का सबसे बड़ा साधन है ?
Summary :
भाजपा व्हाट्सएप की दुनिया में इतनी रच-बस गई है कि संसद के विशेष सत्र के लिए बैकग्राउंड ब्रीफ़ भी केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ़ से इसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए सर्कुलेट किया गया। इसके लिये कई स्थापित नियमों को नज़रअंदाज़ किया गया। विशेष सत्र में जिन संशोधनों पर चर्चा और उन्हें पारित करने की योजना है, वे कानून मंत्रालय के दायरे में आते हैं। लेकिन विपक्ष को इसकी जानकारी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दफ्तर से दी गई। इसके अलावा, ऐसे अहम फैसलों के लिए ब्रीफ़ पर या तो पहले से ही सर्वदलीय बैठक में चर्चा होनी चाहिए,…


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