भारत के जिन राज्यों में आगामी 23 व 29 अप्रैल को चुनाव होने जा रहे हैं उनमें से तमिलनाडु में एक ही चरण में मतदान पूरा हो जायेगा जबकि प. बंगाल में मतदान दो चरणों में उपरोक्त तारीखों पर होगा। तमिलनाडु में चुनावों की राजनीति शेष देश के सभी अन्य राज्यों से भिन्न रही है । यहां आजादी के पहले से ही सामाजिक न्याय के आधार पर क्षेत्रीय पार्टियां बनती –बिगड़ती रही हैं। इस राज्य की एक और खूबी रही है कि तमिल फिल्म उद्योग से जुड़े सितारों से लेकर पटकथा लेखकों का राजनीति में बोलबाला रहा है। स्व. एम.जी. रामचन्द्रन से लेकर स्व. एम. करुणानिधी और जय ललिता तक जैसे राजनेता राज्य की विधानसभा में अपना दबदबा कायम रखने में कामयाब रहे हैं। फिलहाल एक नवोदित लोकप्रिय फिल्मी सितारे टीवी के विजय चुनावी मैदान में अपनी नई पार्टी के साथ जोर- आजमाइश कर रहे हैं और उन्होंने सत्तारूढ़ द्रमुक से लेकर विपक्षी पार्टी अन्नाद्रमुक के नेताओं की नींद उड़ा रखी है हालांकि उनकी लोकप्रियता तमिलनाडु के युवा वर्ग तक ही सीमित है फिर भी हम देख सकते हैं कि इस बार कहीं तिकोना संघर्ष चुनावी मैदान में न हो जाये मगर इसके ठीक उलट प. बंगाल का चुनावी परिदृश्य है। यहां असली टक्कर सत्ताधारी ममता दीदी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी व भाजपा के बीच है। ममता दी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह बंगाली राजनीतिक संस्कृति के अनुरूप जमीन पर संघर्ष करके लोकप्रिय नेता बनी हैं। उन्होंने नब्बे के दशक के शुरू में ही कांग्रेस से अलग होकर अपनी तृणमूल कांग्रेस पार्टी बनाई थी और प्रतिज्ञा की थी कि वह राज्य से वामपंथियों के शासन को उखाड़ कर ही दम लेंगी। इस काम में उन्हें 15 वर्ष से कुछ अधिक का समय लगा और 2011 में जाकर उन्होंने प. बंगाल में अपना राज कायम करने में सफलता पाई। 2011 में ममता दी का राजनीतिक जलवा इस कदर उफान पर था कि उन्होंने उस समय के मार्क्सवादी मुख्यमन्त्री बुध देव भट्टाचार्य को भी कोलकाता की जादवपुर सीट से चुनाव में पराजय दिला दी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा है। हालांकि राज्य में भाजपा का उदय भी उनके ही सहयोग से तब हुआ था जब देश में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार थी। बेशक भाजपा बंगाल में हाशिये पर पड़ी हुई पार्टी मानी जाती थी, मगर 2016 के विधानसभा चुनावों के बाद इसमें जान आनी शुरू हुई और 2019 के लोकसभा चुनावों के आते–आते भाजपा राज्य की 42 सीटों में से 22 जीतने में सफल हो गई। इसके बाद के 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कुल 294 सीटों में से 77 जीत लीं। इस राज्य में भाजपा का यह अभी तक का सबसे ऊंचा रिकार्ड है वैसे यह राज्य इस पार्टी के मूल संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का राज्य है उनके जीवन काल में 1952 के लोकसभा चुनाव में जनसंघ अधिकतम दो सीटें जीत पाई थी। इसके बाद वाजपेयी शासनकाल के दौरान भी भाजपा इतनी ही सीटें जीत पाई मगर केन्द्र में श्री नरेन्द्र मोदी की भाजपा नीत एनडीए सरकार गठित होने के बाद से बंगाल की राजनीति ने करवट ली और 2011 में ममता दी के हाथों पिटे वामपंथ की जगह भाजपा लेती गई और आज हालत यह हैं कि भाजपा ममता दी को सीधी चुनौती दे रही है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का ग्राफ गिरा और इसकी सीटें 12 ही रह गईं। इसके बावजूद इसका मत प्रतिशत बढ़ा। इसे देखकर ही भाजपा नेता कह रहे हैं कि राज्य से तृणमूल की विदाई का समय आ गया है, मगर यह आसान नहीं है क्योंकि ममता दी सरकार चलाने के साथ–साथ लगातार जमीन पर भी आम आदमी के साथ महत्वपूर्ण मुद्दों पर कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने में माहिर मानी जाती हैं। वह बंगाली मतदाताओं की अपेक्षा व इच्छा को भलीभांति समझती हैं और बंगाली अस्मिता के मुद्दे को राजनीति से जोड़ने में भी महारथ रखती हैं। किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जब देश की राजधानी दिल्ली में स्थित संसद भवन में महिला आरक्षण विधेयक को लेकर गरमागर्म बहस हो रही है तो ममता दी की पार्टी में सबसे ज्यादा महिला विधायक व सांसद आज भी हैं। 23 व 29 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनावों में उन्होंने सर्वाधिक 27 प्रतिशत महिला उम्मीदावार उतारे हैं, जबकि भाजपा भी सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है मगर इसने केवल 33 महिला प्रत्याशी उतारे हैं वहीं वामपंथी गठबन्धन ने भी 34 महिला उम्मीदावर ही दिए हैं जबकि कांग्रेस पार्टी ने 35 प्रत्याशी दिये हैं। ममता दी ने 55 महिला उम्मीदावार उतारकर बाजी मार ली है। इसलिए भाजपा महिला आरक्षण को बंगाल में मुद्दा बनाने पर सौ बार सोचेगी। ममता दी का राजनीतिक कौशल भी कम आश्चर्य करने वाला नहीं होता। इसका उदाहरण राज्य में चल रहा मतदाता सूची पुनरीक्षण का कार्य है जो चुनाव आयोग कर रहा है। ममता दी ने इसे ही राज्य का मुख्य चुनावी मुद्दा बना दिया है और चुनाव आयोग को सड़क से लेकर संसद व सर्वोच्च न्यायालय तक में घेरा है। यह स्थिति तब है जबकि बिहार में पिछले वर्ष में हुए चुनावों के दौरान भी पुनरीक्षण का काम किया था और कई लाख मतदाताओं के नाम काट दिये थे। उस समय कांग्रेस व लालू जी की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने इसे एक चुनावी मुद्दा बनाया था मगर इन दोनों दलों को जबर्दस्त मुंह की खानी पड़ी थी, लेकिन ममता दी ने इसे ही बंगाल के चुनावों में प्रमुख मुद्दा बनाकर भाजपा को रक्षात्मक पाले में लाने की कोशिश की है जबकि बिहार का नतीजा उनके सामने हैं। इससे पता चलता है कि ममता बनर्जी की राजनीति अन्य विपक्षी दलों से बिल्कुल अलग है । वह हर मुद्दे को बंगाली नजरिये से परखने में सिद्धहस्त मानी जाती है। हालांकि भाजपा ने उन्हें शासन व भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चारों तरफ से घेर रखा है, परन्तु वह इसे केन्द्रीय मुद्दा बनने ही नहीं दे रही है। मतदाता सूची पुनरीक्षण पर उन्होंने चुनाव आयोग को ही उल्टे कटघरे में खड़ा कर दिया है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने ताजा आदेश दिया है कि आयोग ने जिन मतदाताओं के नाम पुरानी सूची से काटे हैं और वे सुनवाई के लिए गठित ट्रिब्यूनल के पास गये हैं। यदि ट्रिब्यूनल ने सुनवाई करके उनमें से जिन लोगों के नाम भी सूची में डालने के आदेश दिये हैं वे 23 अप्रैल 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में हिस्सा ले सकते हैं। यही विधा ममता बनर्जी की राजनीति की असली ताकत है। अतः भाजपा को पहले उनकी इस राजनीतिक शतरंज को समझाना होगा और फिर अपनी बाजी बिछानी होगी। दुर्भाग्य यह है कि स्व. प्रोफेसर हरिपद भारती के बाद भाजपा को अभी तक बंगाल की धरती से जनसंघ की परंपराओं में पला बड़ा कोई नेता नहीं मिला है। वैसे इस बार चुनाव बहुत कांटे का होने जा रहा है क्योंकि भाजपा व तृणमूल कांग्रेस के कुल मतों में अन्तर बहुत कम होता जा रहा है और प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता में भी कोई कमी नहीं आई है। बंगाल का चुनाव भाजपा श्री मोदी के चेहरे पर ही लड़ती है। अवैध मतदाताओं के नाम कटने से इस बार हार-जीत का अन्तर भी बहुत कम रहने की उम्मीद है। देखते हैं 4 मई को ऊंट किस करवट बैठता है!
बंगाल में चुनावी युद्ध का ‘सुपर खेला’
Summary :
भारत के जिन राज्यों में आगामी 23 व 29 अप्रैल को चुनाव होने जा रहे हैं उनमें से तमिलनाडु में एक ही चरण में मतदान पूरा हो जायेगा जबकि प. बंगाल में मतदान दो चरणों में उपरोक्त तारीखों पर होगा। तमिलनाडु में चुनावों की राजनीति शेष देश के सभी अन्य राज्यों से भिन्न रही है । यहां आजादी के पहले से ही सामाजिक न्याय के आधार पर क्षेत्रीय पार्टियां बनती –बिगड़ती रही हैं। इस राज्य की एक और खूबी रही है कि तमिल फिल्म उद्योग से जुड़े सितारों से लेकर पटकथा लेखकों का राजनीति में बोलबाला रहा है। स्व. एम.जी.…


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