संसद और महिला आरक्षण

Summary :

संसद के लोकसभा सदन में महिला आरक्षण से सम्बन्धित 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर जो बहस चल रही है उसका निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि मोदी सरकार 2023 में इसी बारे में किये गये संविधान संशोधन को भी जीवित रखना चाहती है जिससे यदि वर्तमान 131वां संशोधन लोकसभा में गिर भी जाये तो आरक्षण का कानून जारी रहे। इसी वजह से सरकार ने 2023 में बनाये गये कानून को भारत के राजपत्र (गजट) में अधिसूचित करके इसे 16 अप्रैल से लागू कर दिया है। एक प्रकार से कहा जा सकता है कि मोदी सरकार इस मामले में…

संसद के लोकसभा सदन में महिला आरक्षण से सम्बन्धित 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर जो बहस चल रही है उसका निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि मोदी सरकार 2023 में इसी बारे में किये गये संविधान संशोधन को भी जीवित रखना चाहती है जिससे यदि वर्तमान 131वां संशोधन लोकसभा में गिर भी जाये तो आरक्षण का कानून जारी रहे। इसी वजह से सरकार ने 2023 में बनाये गये कानून को भारत के राजपत्र (गजट) में अधिसूचित करके इसे 16 अप्रैल से लागू कर दिया है। एक प्रकार से कहा जा सकता है कि मोदी सरकार इस मामले में अपने दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहती है। सरकार 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून में ही संशोधन करने के लिए 131वां संशोधन 2026 में लायी है जिस पर फिलहाल बहस हो रही है। प्रश्न बहुत सीधा है कि क्या मोदी सरकार के पास संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में वर्तमान विधेयकों को पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत प्राप्त है? तो इसका उत्तर है नहीं और इसी सम्भावना के कारण नया महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में ​िगर गया। इसके साथ ही सरकार ने दो अन्य परिसीमन और केन्द्र शासित क्षेत्र विधेयकों को वापिस ले​ लिया।
लोकसभा में सत्तारूढ़ भाजपा गठबन्धन एनडीए के कुल 293 सांसद हैं जबकि विपक्ष के पास 234 सदस्य हैं। लोकसभा की वर्तमान सांसद शक्ति 540 की है। दो-तिहाई बहुमत के लिए मोदी सरकार को 360 सांसद चाहिए। इस प्रकार उसे 67 और सांसदों की आवश्यकता थी। जब लोकसभा में विधेयक पर मतदान हुआ तो समर्थन में 298 और विरोध में 230 मत मिले, जिससे विधेयक गिर गया। संभवतः इस खतरे को देखते हुए ही मोदी सरकार ने 2023 के महिला आरक्षण कानून को गत रात्रि से लागू कर दिया है। 2023 के कानून में प्रावधान है कि यह चुनाव क्षेत्र परिसीमन के बाद ही लागू होगा जिससे यह आयोग नये चुनाव क्षेत्रों को चिन्हित कर सके। परिसीमन आयोग का गठन नई जनगणना के बाद ही होगा। अतः मोदी सरकार ने इस कानून में संशोधन करने की व्यवस्था की और इसमें प्रावधान किया कि बिना नई जनगणना के ही 2011 की पुरानी जनगणना के आधार पर परिसीमन आयोग लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़ा कर 850 करे। देश की सबसे प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस का सहयोगी गठबन्धन इंडिया इसका पुरजोर विरोध कर रहा है और कह रहा है कि जब 2023 में संसद के दोनों सदनों ने महिला आरक्षण विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया था तो उसी में 2026 में संशोधन करने के लिए नया 131वां संशोधन क्यों लाया गया? विपक्ष के इस तर्क में ठोस वजन है। मोदी सरकार कह रही है कि वह महिला आरक्षण को जल्दी से जल्दी लागू करना चाहती है अतः देश में चल रही ताजा गणना से इसका सम्बन्ध विच्छेद कर रही है। परन्तु विपक्ष कह रहा है कि सरकार महिला आरक्षण की आड़ में चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन अपने राजनीतिक हानि-लाभ को देखकर उसी प्रकार करना चाहती है जिस प्रकार उसने जम्मू-कश्मीर और असम राज्यों में किया। निश्चित रूप से यह राजनीतिक विषय है क्योंकि यदि एक बार परिसीमन आयोग ने चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन कर दिया तो उसे सर्वोच्च न्यायालय में भी चुनौती नहीं दी जा सकती।
विपक्ष कह रहा है कि जब 2023 में ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें सर्वसम्मति से आरक्षित कर दी गई थीं तो इसके लगभग ढाई साल बाद नया महिला आरक्षण विधेयक लाने का क्या तुक है ? अतः सरकार की मंशा कुछ अलग है और वह बिना नई जनगणना कराये ही परिसीमन आयोग का गठन करके अपने राजनीतिक हित साधना चाहती है। इसी वजह से कांग्रेस से लेकर समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस व द्रमुक आदि विपक्षी पार्टियां आरोप लगा रही हैं कि सरकार की नीयत ठीक नहीं है। इसमें मजेदार बात यह है कि 2023 में सभी विपक्षी पार्टियां कह रही थी कि महिला आरक्षण तुरन्त लागू करो। उस समय सरकार उसकी मांग नहीं मान रही थी और आज जब 2026 में सरकार कह रही है वह बिना नई जनगणना के ही परिसीमन आयोग गठित करेगी तो विपक्ष इसका पुरजोर विरोध कर रहा है। विपक्ष का यह भी कहना है कि वर्तमान लोकसभा की 543 शक्ति में ही 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए 2023 में ही आरक्षित हो जानी चाहिए थीं। तब सरकार ने इसे जनगणना व परिसीमन से जोड़ दिया था। जाहिर है कि संसद के दोनों सदनों लोकसभा व राज्यसभा में मोदी सरकार के पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है। सदस्य संख्या के अंक गणित में 131वां संशोधन विधेयक गिर भी सकता है जिसकी वजह से सरकार ने 2023 का कानून अधिसूचित कर दिया है। इसका एक कारण यह भी है कि बीते कल 16 अप्रैल को जब सरकार की तरफ से तीन विधेयक (महिला आरक्षण, परिसीमन आयोग व केन्द्र शासित राज्यों की 20 से बढ़ाकर 30 सीटें करने सम्बन्धी) पुनर्स्थापित किये गये तो विपक्षी सांसदों ने इनके प्रस्तुतीकरण के अवसर पर ही मतदान की मांग कर डाली जिस पर सदन में इस मुद्दे पर मतदान हुआ तो सदन में कुल 436 सांसद उपस्थित थे । इनमें से 251 ने विधेयकों को विचारार्थ स्वीकार करने के पक्ष में और 185 ने विरोध में मत दिया। जाहिर है कि यह आंकड़ा सरकार के लिए परेशानी का सबब बना क्योंकि उसे विधेयकों को पारित कराने के लिए 360 सांसदों की जरूरत है। अतः अपना पक्ष हर हालत में मजबूत रखने के लिए सरकार ने 2023 में बने कानून को अधिसूचित कर डाला लेकिन इस विषय पर जब बहस शुरू हुई तो दोनों ही ओर के सांसदों ने इतिहास की पर्तें खोलते हुए नारी शक्ति वन्दन का खूब गुणगान किया।
एक तरफ प्रधानमन्त्री ने विपक्ष से नये विधेयकों के मामले में समर्थन मांगा तो दूसरी ओर कांग्रेस की श्रीमती प्रियंका गांधी ने नारी को अधिकार सम्पन्न किये जाने के मुद्दे पर 1928 में स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान ही स्व. मोती लाल नेहरू के नेतृत्व में गठित संविधान लेखन समिति की सिफारिशों का जिक्र करते हुए बताया कि किस प्रकार 1931 में कराची में हुए सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस अधिवेशन में भारत के सभी स्त्री- पुरुष नागरिकों को 19 मूल अधिकार देने का प्रस्ताव पारित हुआ था। यदि हम गौर से कल की लोकसभा बहस की विवेचना करें तो गृहमन्त्री श्री अमित शाह का यह कथन भी बहुत महत्वपूर्ण है कि भारत के लोकतन्त्र को कोई भी समाप्त नहीं कर सकता है। वह विपक्ष द्वारा नये विधेयकों को लोकतन्त्र को चोट पहुंचाने का आरोप लगाये जाने के वक्तव्यों पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे। कुल मिलाकर यह निष्कर्ष निकलता है कि 2026 के 131वें संशोधन विधेयक का हश्र चाहे जो भी हो मगर महिला आरक्षण हर सूरत में महफूज रहेगा।

Aditya Chopra

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