कवि और गीतकार प्रदीप का लिखा ये गाना आपने जरूर सुना होगा -‘हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के।’ संदेश बहुत साफ है कि हमारी अगली पीढ़ी ही भविष्य की कर्णधार है, इनका नजरिया और इनकी सोच ही हमारे भविष्य का पैमाना है। इसलिए मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत जी की इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि जेन-जी का विरोध- प्रदर्शन देश विरोधी नहीं है। वे हमारे अपने हैं, वे हमारी अगली पीढ़ी हैं। बातचीत के साथ-साथ अपनापन महसूस कराने की भी जरूरत है।
इसी कॉलम में पिछले महीने के अंतिम सप्ताह में मैंने लिखा था कि आज के नव-युवा राजनीति नहीं, पारदर्शी और भरोसेमंद शिक्षा व्यवस्था चाहते हैं, यदि युवाओं का विश्वास टूट गया तो देश की सबसे बड़ी पूंजी खो जाएगी और युवाओं का विश्वास बना रहे, इसके लिए बहुत जरूरी है कि हम उनकी भाषा समझें। उनका मन समझें, ठीक उसी तरह से जैसे एक मां अपने छोटे बच्चे की भाषा समझ लेती है। आज के नेतृत्वकर्ता उस पीढ़ी से हैं जिन्हें सिखाया गया कि बड़ों का आदर करो तो उन्होंने मान लिया, मैं खुद उसी पीढ़ी का हूं, मगर आज की पीढ़ी कहती है कि हम आदर जरूर करेंगे लेकिन यह विश्वास होना चाहिए कि वह आदर योग्य है।
नेतृत्वकर्ताओं को नव-युवाओं की भाषा में उनसे संवाद करना होगा और समझना होगा कि आज के नव-युवा किसी ब्रांड से बंधे हुए नहीं हैं। मुझे बहुत खुशी हुई जब मुंबई में नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में इंडिया इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस के 15वें स्थापना वर्ष के मौके पर मोहन भागवत ने नेतृत्वकर्ताओं को दिशा दी कि लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन भी सहमति बनाने का एक माध्यम है। जेन-जी की शिकायतें जायज हैं। भारत की शिक्षा व्यवस्था में बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है और वह नहीं हो पा रहा है, इसलिए ये मुद्दे उठ रहे हैं। निश्चित रूप से संवाद होना चाहिए लेकिन उद्देश्य सहमति बनाना होना चाहिए न कि समाज में विभाजन पैदा करना।
विरोध के दौरान अलग-अलग विचार सामने आते हैं और चर्चा के बाद एक सहमति बनती है, यानी सहमति ही महत्वपूर्ण है। भागवत जी की ये बात सौ फीसदी सही है क्योंकि किसी भी समस्या के निदान के लिए बातचीत बहुत जरूरी है। अब आप यह देखिए कि भारत और चीन के बीच सीमा को लेकर विवाद हमेशा तनाव के चरम बिंदु पर होता है लेकिन दोनों देश फिर भी बातचीत करते रहते हैं। अभी पिछले सप्ताह ही दोनों देशों में बातचीत हुई, पाकिस्तान से हमारा छत्तीस का आंकड़ा है लेकिन दोनों देशों में बातचीत की मांग उठ रही है।
जब ऑपरेशन सिंदूर हुआ तो दोनों देशों के बीच बातचीत से ही रुका। यानी हर हाल में बातचीत होनी ही चाहिए, प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक का मामला लगातार गंभीर होता गया है। पेपर लीक के सवा सौ से ज्यादा मामले पहले ही आ चुके थे, हम जानते हैं कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीति भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस की रही है। मगर शैक्षणिक संगठनों में कई लोगों को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं, नीट पेपर लीक मामला सामने आते ही यदि सख्त कदम उठा लिए जाते तो मामला यहां तक बढ़ता ही नहीं।
यदि मैं राहुल गांधी की बात करूं तो हो सकता है कि इसे राजनीतिक नजरिये से देखा जाए लेकिन सवाल है कि वे भी तो विद्यार्थियों की वाजिब मांगों पर ही बात कर रहे हैं। उन्हें भी इग्नोर नहीं किया जाना चाहिए। मोहन भागवत जी ने बहुत सही कहा है कि हमारे यहां तो शास्त्रार्थ की परंपरा रही है ताकि दोनों पक्षों के विचार को समझ कर सही निर्णय पर पहुंचा जा सके, शास्त्रार्थ के परिणाम को किसी की जीत और किसी की पराजय के रूप में बिल्कुल नहीं देखा जाना चाहिए। मैंने कहीं एक शेर पढ़ा था
हर पीढ़ी को अगली पीढ़ी
बिगड़ी सी लगती है
क्योंकि उसे बदलाव से ज्यादा
अपनी आदतों से प्रेम होता है !
हमें यह समझना होगा कि प्रकृति में क्रमानुगत विकास यानी इवोल्यूशन का एक साफ सिद्धांत है कि अगली पीढ़ी, पिछली पीढ़ी से ज्यादा तीक्ष्ण बुद्धि की होती है, इस सच को हमें स्वीकार करना होगा। हमारी मौजूदा जेन-जी के सामने दुनिया खुली है, नजरिया व्यापक है। मगर उन्हें यह भी सिखाना हमारा दायित्व है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा को कसौटियों पर जरूर तौलें लेकिन एक झटके से उसे दरकिनार न करें, उसे समझने की कोशिश करें और नीति नियंताओं से कहना चाहूंगा कि जिस राष्ट्र ने या जिस संगठन ने भी युवाओं की भावनाओं का ध्यान नहीं रखा, उसके लिए परिस्थितियां विकट हो जाती हैं।
मुर्गे की गर्दन नहीं
हाथी का सूंड कहिए
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर को आजादी के बाद से ही मुर्गे की गर्दन कहा जाता रहा है, इस इलाके की अधिकतम चौड़ाई केवल 22 किलोमीटर है, चीन और पाकिस्तान की चाहत रही है कि यदि मुर्गे की गर्दन तोड़ दी जाए तो काम तमाम! मगर हाल के दिनों में भारत ने पासा पलट दिया है, अब इसे चिकन नेक नहीं बल्कि हाथी की सूंड कहा जा रहा है, यानी सूंड पतली होती है लेकिन इतनी ताकतवर होती है कि तुर्रम खां को धूल चटा दे। गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले महीने ही हाथी की इस सूंड का जायजा लिया है, दुश्मनों के लिए संदेश साफ है उलझने की जुर्रत बिल्कुल मत करना।
हम क्यों चिंतित हों?
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने नाटो जैसा संगठन बना लिया है, ये तीनों ही चूंकि मुस्लिम देश हैं इसलिए हंगामा बहुत मचा है, मगर मुझे नहीं लगता कि हमें इससे चिंतित होने की कोई जरूरत है। इन तीनों के पास कुल मिलाकर 14 लाख से कम ही सैनिक हैं हमारे पास अकेले ही इससे ज्यादा सैन्य बल है, कोई मुकाबला ही नहीं है श्रीमान।


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