हमारे सार्वजनिक अधिनियमों में न्यायाधिकरणों के गठन से जुड़े कुछ ही प्रश्न ऐसे हैं जिनकी इतनी बार पुनर्समीक्षा हुई है। 1987 के एस. पी. संपत कुमार मामले से लेकर नवंबर 2025 में मद्रास बार एसोसिएशन से संबंधित निर्णय तक, न्यायालयों ने कानून निरस्त किये, निर्देश जारी किए और फिर उसी आधार पर स्वयं को नए कानूनों की समीक्षा करते हुए पाया। यह विषय इतने चक्र से गुजरा है, जो अपने आप में दर्शाता है कि समस्या कितनी कठिन रही है।
न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 इसीलिए ध्यान आकर्षित करता है क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि उसने अंततः वास्तविक समस्या की पहचान कर ली है और उम्मीद है कि समाधान भी खोज लिया है। यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। दूसरे देशों को भी इसका सामना करना पड़ा है और उनका निदान ध्यान देने योग्य है। ब्रिटेन में जब सर एंड्रयू लेगट ने 2001 में इस क्षेत्र की समीक्षा की, तो पाया कि सत्तर से अधिक न्यायाधिकरणों का प्रशासन उन्हीं विभागों द्वारा किया जा रहा था, जिनके निर्णयों की वे समीक्षा करते थे। उन्होंने इसे मूल दोष माना। उनका उपाय कार्यकाल में बदलाव या योग्यताओं को परिष्कृत करना नहीं था। उनका समाधान था कि न्यायाधिकरणों को उनके प्रायोजक विभागों से अलग कर उनका प्रशासन एकल सेवा के अधीन किया जाए।
यही सुधार 2007 के अधिनियम का आधार बना। यह सुधार संरचनात्मक था। उसने निर्भरता के लक्षणों को नहीं, बल्कि निर्भरता की वजह का समाधान किया। भारत ने न्यायाधिकरणों की व्यवस्था को प्रारंभिक चरण में ही अपनाया और, कुल मिलाकर, यह सफल रही। 1941 में स्थापित आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण आज भी विशेषज्ञतापूर्ण न्याय निर्णय न के बेहतरीन उदाहरणों में से एक है। इस प्रारूप को अनुच्छेद 323ए और 323बी तथा प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, 1985 द्वारा आगे बढ़ाया गया और बाद में विभिन्न नियामक क्षेत्रों में उस उच्च स्तर पर इसका विस्तार हुआ, जिसे उच्च न्यायालय नहीं ले सकते थे।
पर हमारी समस्या अलग तरह की थी। जैसा कि न्यायालय की 2020 की टिप्पणी में कहा गया कि स्वतंत्रता तभी सुनिश्चित की जा सकती है जब न्यायाधिकरणों को अपने कार्य करने के लिए कार्यपालिका के कंधों का सहारा न लेना पड़े। इस बारे में सुधार एक से अधिक बार किए गए हैं और हर बार सच्ची भावना के साथ किए गए हैं। इसके बाद होने वाली अधिकांश मुकदमेबाजी इस बात को लेकर रही कि कार्यकाल तीन वर्ष का होना चाहिए या 4 या 5 वर्ष का, न्यूनतम आयु 50 वर्ष होना स्वीकार्य है या नहीं, और एक नाम या दो नामों की समिति की सिफारिश होनी चाहिए। सम्मानपूर्वक कहना होगा कि इनमें से कोई भी बात मूल समस्या तक नहीं पहुंचती।
स्वतंत्र न्यायाधिकरण अंकगणित पर निर्भर नहीं करते। कार्यकाल, आयु और नामों की संख्या वे लक्षण हैं जिनके माध्यम से रोग का निदान किया गया है। वे स्वयं बीमारी नहीं हैं। नया विधेयक उन सभी बिंदुओं पर न्यायालय को उत्तर देता है, जिन पर न्यायालय अपनी बात कह चुका है लेकिन इससे भी बढ़कर एक ऐसी संस्था स्थापित करने का प्रयास है जो उन उत्तरों को स्वयं लागू करने योग्य बना दे। राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की स्थापना कानून द्वारा की जानी है। उसका अस्तित्व, गठन और कार्य किसी कार्यपालिका आदेश से नहीं, बल्कि अधिनियम से संचालित होंगे और उसे चयन, निगरानी, अनुशासन तथा न्यायाधिकरणों की आवश्यकताओं के आकलन का दायित्व है।
उसके चारों ओर एक स्थायी पेशेवर सचिवालय स्थापित किया जाएगा। विधेयक में उन प्रत्येक बिंदुओं पर न्यायिक सर्वोच्चता बनाए रखी गयी है, जहां उसका महत्व है। आयोग की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जाएगी और उसमें न्यायिक बहुमत का प्रावधान है। समितियों की अध्यक्षता न्यायिक रूप से की जाती है तथा निर्णायक मत न्यायिक अध्यक्ष के पास ही होता है। चयन, निगरानी, अनुशासन और कार्य-प्रदर्शन सभी का नेतृत्व न्यायिक तौर पर किया जाता है।
यह उस बात के अनुरूप है जो न्यायालय आर. गांधी मामले के बाद से कहता आया है कि कार्यपालिका, जो सबसे बड़ी वादी है, उन लोगों के चयन में प्रमुख भूमिका नहीं निभा सकती जो उसके मामलों का निर्णय करते हैं। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण यह है कि सर्वोच्चता का अर्थ नियंत्रण नहीं है। पूरी व्यवस्था न्यायिक पक्ष को सौंप देना भी चुनौतियों के रूप में देखा जाता है। इसलिए यह विधेयक न्यायाधिकरण को तीन स्तरों से कार्यपालिका और न्यायपालिका से समान दूरी पर रखता है। केंद्र सरकार नियमों द्वारा व्यापक सिद्धांत निर्धारित करती है। आयोग उन नियमों को लागू करने के तरीके को नियंत्रित करने वाले विनियम बनाता है।
सचिवालय इसी ढांचे के तहत काम करता है। उसे कार्य करने के तरीके के बारे में मार्गदर्शन दिया गया है लेकिन परिचालन स्तर पर उसे निर्देशित नहीं किया जाता और वह अपने कार्य अधिनियम से प्राप्त करता है, न कि अधिकार या कार्य किसी दूसरे को सौंपे जाने के प्रत्यायोजन से। विधेयक द्वारा कायम यही वह नाजुक संतुलन है। इसमें न तो प्रशासन में न्यायिक हस्तक्षेप है और न ही वास्तविक रूप से कार्यपालिका पर निर्भरता, जबकि चयन, निगरानी, अनुशासन और कार्य-प्रदर्शन में न्यायिक सर्वोच्चता बनी रहती है। कनाडा ने 2014 में इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाया था, जब उसने अपने संघीय न्यायाधिकरणों की सहायक सेवाओं को एक ही संगठन के अधीन लाते हुए उनके न्याय निर्णय संबंधी स्वतंत्रता बरकरार रखी।
इस प्रकार के कानून का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि वह न्यायिक चुनौती में टिकता है या नहीं। इसका मूल्यांकन इस तथ्य के आधार पर होना चाहिए कि क्या वह उन स्थितियों को समाप्त करता है, जिनसे ये चुनौतियां पैदा हुईं। विधेयक इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। यदि यह अपने निर्धारित स्वरूप में काम करता है, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि न्यायाधिकरण व्यवस्था में काफी सुधारआएगा। इसमें वादी को अंततः ऐसा मंच मिलेगा जो उचित रूप से गठित,पर्याप्त रूप से व्यवस्थित होगा, जहां रिक्तियां समय पर भरी जाएंगी तथा जो अपने कार्य-प्रदर्शन के लिए जवाबदेह होगा। विकसित किया गया यह मॉडल, यदि सफल रहा तो भविष्य में अन्य प्रकार के चयन के लिए भी काफी उपयोगी होगा।


Download Android App
Download iOS App




