झारखंड की हेमन्त सोरेन सरकार द्वारा विगत 2 अगस्त से अनशन पर बैठे हुए आन्दोलनकारी छात्रों की 98 प्रतिशत मांगें मान लिये जाने के बावजूद यदि छात्रों ने सोमवार को विधानसभा को घेरने के अपने इरादे को अंजाम दिया तो इसका अर्थ यही निकलता है कि इस आन्दोलन में राजनीति प्रवेश कर चुकी है जिसकी वजह से छात्र अपनी हड़ताल वापस नहीं ले रहे हैं। सामान्य से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होना भारत के विभिन्न प्रदेशों की ऐसी समस्या है जिसका स्थायी हल यदि निकट भविष्य में नहीं खोजा जाता है तो युवा शक्ति को विक्षोभ में जाने से रोकना मुश्किल कार्य होगा।
पिछले दिनों हमने देश की राजधानी दिल्ली में मेडिकल प्रवेश की परीक्षा नीट के पेपर लीक होने के मुद्दे पर छात्र जगत व युवा वर्ग का गुस्सा देखा था। यह गुस्सा तभी शान्त हुआ जब केन्द्रीय शिक्षा मन्त्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा हो गया। इस आन्दोलन के दौरान हमने दिल्ली में हिंसा भी देखी थी और पुलिस व छात्रों के बीच मुठभेड़ें भी हुई थीं परन्तु झारखंड की राजधानी रांची में चल रहे छात्रों का आन्दोलन बहुत अनुशासित है और गांधीवादी तरीके से किया जा रहा है जिसमें आन्दोलनकारी छात्र पूरी तरह अहिंसा का पालन कर रहे हैं और सच्चे सत्याग्रह का रास्ता पकड़े हुए हैं।
दूसरी तरफ राज्य की सोरेन सरकार भी शुरू से ही आन्दोलनकारी छात्रों के प्रति सदाशयता दिखा रही है और बातचीत के रास्ते से समस्या को सुलझाने के बहुत करीब है। सोरेन सरकार ने पहले दिन से ही वार्ता के रास्ते खुले रखे और छात्रों के अहिंसक आन्दोलन को भी सम्मान की दृष्टि से देखा। सरकार ने यहां तक ऐलान किया कि वह भी छात्रों के साथ है। मुख्यमन्त्री सोरेन ने तो साफ कहा कि छात्रों को न्याय दिलाने से उनकी सरकार पीछे नहीं हटेगी और उनकी हर उस जायज मांग को स्वीकार करेगी जो राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है।
इसी का परिणाम रहा कि सरकार पहले सप्ताह से ही छात्रों से बातचीत करने लगी और उनकी मांगों पर रचनात्मक व सकारात्मक तरीके से विचार करने लगी। वस्तुतः छात्रों की ओर से भी कहा गया कि उनका रास्ता पूरी तरह गांधीवादी रास्ता होगा और वे संविधान के दायरे में रह कर ही अपनी मांगें मनवाने का प्रयास करेंगे। अतः सरकार व छात्रों के बीच कई दौर की वार्ताएं हुई जिसके परिणामस्वरूप उनकी 98 प्रतिशत मांगें मान ली गईं और सरकार ने इस तरफ कारगर कार्रवाई भी शुरू कर दी। जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि हेमन्त सरकार की नीयत साफ है और वह आन्दोलनकारी छात्रों की मांगें स्वीकार करने में अपनी हेठी नहीं समझ रही है।
विगत रविवार को ही सरकार ने छात्रों के दो प्रतिनिधिमंडलों से लम्बी वार्ता की और लगभग वे सभी मांगें मान लीं जिनकी छात्र मांग कर रहे थे। सरकार तीन प्रतियोगी परीक्षाओं को रद्द करने के लिए राजी हो गई जिनमें झारखंड लोक सेवा आयोग की प्राथमिक परीक्षा भी शामिल है। इसके साथ ही सरकार ने छात्रों की यह मांग भी मान ली कि राज्य लोक सेवा आयोग की ताजा परीक्षा में हुई धांधली में वित्तीय घपला होने की भी प्रवर्तन निदेशालय से जांच कराई जाये, बल्कि इस सिलसिले में निदेशालय तो सोमवार को ही हरकत में आ गया और उसने जांच भी शुरू कर दी।
छात्रों के आन्दोलन के 16वें दिन 9 अगस्त को ही झारखंड लोक सेवा आयोग के तीन महत्वपूर्ण सदस्यों ने इस्तीफा भी दे दिया। मुख्यमन्त्री ने छात्रों से वार्ता करने के लिए अपने उच्च शिक्षण संस्थान मन्त्री सुदिव्य कुमार सोनू को अधिकृत किया जिन्होंने रविवार को छात्रों के दो प्रतिनिधिमंडलों से वार्ता करके किसी नतीजे पर पहुंचने का प्रयास किया परन्तु छात्र कह रहे हैं कि जब तक झारखंड की स्नातक स्तर की संयुक्त अधीनस्थ सेवा के परीक्षाफल को रद्द नहीं किया जाता है और इसकी सी.बी.आई. जांच नहीं कराई जाती है तब तक वे अपना आन्दोलन वापस नहीं लेंगे। छात्रों की यह मांग इसलिए विसंगति भरी है क्योंकि यह परीक्षा उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में सम्पन्न हुई थी।
अतः राज्य सरकार सीधे इसे रद्द करने का आदेश नहीं दे सकती है क्योंकि यह न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का मामला है। यह परीक्षा 2025 में हुई थी जिसकी वजह से इस परीक्षा में उत्तीर्ण हुए कई छात्रों की नौकरी भी लग चुकी है। राज्य सरकार इस मामले में तभी हस्तक्षेप कर सकती है जबकि न्यायालय उसे निर्देश दे। मगर छात्र परीक्षा रद्द करने की मांग पर अड़ गये हैं। जबकि सरकार ने सुझाव दिया है कि वह इस मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच किसी अवकाश प्राप्त न्यायाधीश द्वारा कराये जाने को तैयार है।
इससे सरकार को सुरक्षा कवच मिल जायेगा कि वह न्यायिक मामले में हस्तक्षेप नहीं कर रही है। मगर हेमन्त सोरेन ने एक और बहुत बड़ी बात कही है कि उनकी सरकार छात्रों को न्याय देने के लिए कटिबद्ध है और वह छात्रों के खिलाफ किसी भी प्रकार के हिंसक तरीकों का इस्तेमाल नहीं करेगी। आज विधानसभा घेरने जा रहे छात्रों पर एक स्थान पर पानी की बौछारों का इस्तेमाल तो किया परन्तु छात्रों के विधानसभा के निकट पहुंचने पर लाठीचार्ज और अश्रुगैस का इस्तेमाल भी करना पड़ा। मगर सवाल यह है कि अब इससे आगे क्या हो ? इस मुद्दे पर छात्रों को भी सोचना चाहिए और सरकार को भी। आगे की रणनीति झारखंड में त्रुटिहीन परीक्षा प्रणाली की होनी चाहिए जिसमें निजी ठेका फर्मों का प्रवेश निषेध हो।


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