भारतीय चिंतन परंपरा में नारी को केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि सृष्टि-चेतना की आधारशिला माना गया है। “नारी से नारायणी” की अवधारणा उसी आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है, जहां स्त्री धैर्य, संयम, मौन, सहनशीलता से आगे बढ़कर रणनीतिक, सृजनात्मक और दिव्य शक्ति का स्वरूप धारण करती है। यह परिवर्तन केवल अधिकारों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मबोध और शक्ति-साक्षात्कार की प्रक्रिया है। भारतीय संस्कृति में स्त्री-शक्ति के आठ दिव्य रूपों की कल्पना अष्टलक्ष्मी के रूप में की गई है। ये आठ स्वरूप जीवन के विविध आयामों में नारी की शक्ति को अभिव्यक्त करते हैं।
यदि हम आधुनिक नारी सशक्तिकरण की यात्रा को इन स्वरूपों से जोड़ें, तो स्पष्ट होता है कि आज की नारी वास्तव में ‘नारायणी’ के पद पर प्रतिष्ठित हो रही है। आदि लक्ष्मी-आत्मबल और आध्यात्मिक चेतना आदि लक्ष्मी मूल शक्ति हैं। आज की नारी जब अपने आत्मसम्मान, शिक्षा और आत्मनिर्भरता को पहचानती है, तब वह इसी मूल चेतना का साक्षात्कार करती है। आत्मविश्वास ही उसके उत्थान की प्रथम सीढ़ी है। धन लक्ष्मी-आर्थिक स्वावलंबन आर्थिक स्वतंत्रता स्त्री सशक्तिकरण का प्रमुख आधार है।
उद्यमिता, नेतृत्व और वित्तीय प्रबंधन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी धन लक्ष्मी के स्वरूप को जीवंत करती है। धान्य लक्ष्मी- पोषण और संवर्धन परिवार, समाज और राष्ट्र के पोषण में स्त्री की भूमिका अद्वितीय है। वह केवल अन्न की संरक्षिका ही नहीं, संस्कारों और मूल्यों की भी धरोहर है। गज लक्ष्मी-सम्मान और प्रतिष्ठागज लक्ष्मी वैभव और सामाजिक सम्मान का प्रतीक हैं। आज की नारी प्रशासन, विज्ञान, सेना और राजनीति में उच्च पदों पर आसीन होकर इस प्रतिष्ठा को अर्जित कर रही है। संतान लक्ष्मी-सृजन और मार्गदर्शन संतान लक्ष्मी केवल मातृत्व का प्रतीक नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के निर्माण और मार्गदर्शन की शक्ति भी हैं।
शिक्षिका, मार्गदर्शिका और प्रेरणा-स्रोत के रूप में स्त्री समाज को दिशा देती है। वीर लक्ष्मी-साहस और पराक्रमवीर लक्ष्मी का स्वरूप स्त्री के साहस का प्रतीक है। चुनौतियों का सामना कर अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना उसी शक्ति का प्रमाण है। विजय लक्ष्मी उपलब्धि और सफलताहर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर नारी विजय लक्ष्मी के स्वरूप को साकार कर रही है। उसकी उपलब्धियां समाज के लिए प्रेरणा बन रही हैं। विद्या लक्ष्मी-ज्ञान और प्रज्ञाज्ञान ही वह दीप है जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है। शिक्षित और जागरूक नारी विद्या लक्ष्मी के रूप में समाज को प्रबुद्ध करती है।
भारतीय नारी की “नारी से नारायणी” की संकल्पना को अष्टलक्ष्मी और अष्टसिद्धि के साथ देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री-सशक्तिकरण कोई आधुनिक आंदोलन मात्र नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना की शाश्वत धारा है। आज की नारी मौन शक्ति से आगे बढ़कर नीति-निर्माण, विज्ञान, साहित्य, कला और आध्यात्मिकता में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ रही है। नारी जब अपने भीतर स्थित इन आठ शक्तियों को पहचान लेती है, तब वह केवल परिवार की आधारशिला नहीं रहती वह समाज और राष्ट्र की दिशा-निर्देशिका बन जाती है। यही है “नारी से नारायणी” की वास्तविक परिभाषा एक ऐसी यात्रा, जिसमें स्त्री अपनी अंतर्निहित दिव्यता को जागृत कर विश्व को आलोकित करती है।
नारी से नारायणी तक की भारतीय नारी की यात्रा पर दिल्ली के विज्ञान भवन में दो दिन का गहन मंथन हो रहा है। आज महिला सशक्तिकरण की चर्चा केवल अधिकारों तक सीमित नहीं है; महिलाएं समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्र निर्माण की सक्रिय निर्माता बन चुकी हैं। यह केवल एक वैचारिक मंच नहीं, बल्कि राष्ट्र के महिला शक्ति के आठ आयाम सम्मेलन में महिला सशक्तिकरण को आठ प्रमुख स्तंभों के माध्यम से परिभाषित किया गया है। विद्या : ज्ञान ही शक्तिउच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना, कौशल विकास, रोजगार और नेतृत्व के अवसर सुदृढ़ करना। क्योंकि शिक्षित नारी ही जागरूक समाज की आधारशिला है।
मुक्ति : आत्म जागरूकतासच्ची स्वतंत्रता आत्म-पहचान, मानसिक विकास और सामाजिक चेतना से प्राप्त होती है। गरीबी, हिंसा और असमानता से मुक्ति पाकर सम्मानपूर्ण जीवन ही वास्तविक आज़ादी है। प्रकृति: संवेदनशील व्यवस्था मासिक धर्म, मातृत्व, बाल-देखभाल और रजोनिवृत्ति जैसी अवस्थाओं में सहयोगी वातावरण का निर्माण। ऐसी कार्य-संरचना, जिससे महिलाएं परिवार और कार्यस्थल दोनों का संतुलन सहजता से कर सकें। सिद्धि: सफलता की कहानियां उन महिलाओं का सम्मान, जिन्होंने अपनी मेहनत और धैर्य से परिवार और समाज को सशक्त बनाया। उनकी उपलब्धियां नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
शक्ति: आत्मनिर्भरता आर्थिक साक्षरता, कौशल प्रशिक्षण और ऋण सुविधाओं के माध्यम से आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना। नैतिक मूल्यों के साथ उन्नति पर बल देना। चेतना: कार्यस्थल पर समानता भेदभाव और असमानता को समाप्त कर ऐसा वातावरण बनाना, जहाँ योग्यता के आधार पर महिलाओं को निर्णय लेने और नेतृत्व करने का अवसर मिले। संस्कृति : मजबूत जड़ें परिवार और समाज के संस्कारों को सुदृढ़ करने में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका। आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक चेतना को सुरक्षित रखना।
कृति: कार्य योजनाविचारों को ठोस योजनाओं में परिवर्तित करना। सम्मेलन को सकारात्मक परिवर्तन की स्थायी शुरूआत बनाना।दो दिन का सम्मेलन करना ही मात्र उद्देश्य नहीं है बल्कि इसको निरंतर आगे बढ़ाते रहना है । इस सम्मेलन के बाद भारत सरकार को ठोस नीति सुझाव प्रस्तुत किए जायेंगे “भारती” को महिला विचारकों का स्थायी मंच बनाना। विभिन्न क्षेत्रों में महिला नेतृत्व समूहों का गठन। महिला चिंतकों का राष्ट्रीय नेटवर्क तैयार करना और प्रतिवर्ष आयोजित करने की रूपरेखा बनाने का संकल्प भी है। “भारती नारी से नारायणी” तीन संस्थाएं मिल कर आयोजित कर रही हैं भारतीय विद्वत परिषद यह एक ट्रस्ट है, जो भारतीय शास्त्रों के अध्ययन और शोध को प्रोत्साहित करता है।


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