कांग्रेस के भीतर भी अनेक नेताओं और कार्यकर्ताओं के मन में एक प्रश्न बार-बार उठ रहा है, क्या कांग्रेस ने सही कदम उठाया? इसके साथ ही एक और सवाल गंभीर रूप से सामने है, जब भारतीय जनता पार्टी स्वयं विपक्ष में रहते हुए विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई करती रही है, तो अब वह इन्हीं प्रदर्शनों पर आपत्ति क्यों जता रही है? इस संदर्भ में वर्ष 2010 की ओर लौटना प्रासंगिक है। कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी को स्मरण कराया कि दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान आयोजन स्थल पर स्वयं भाजपा ने प्रदर्शन किए थे। कांग्रेस का कहना था, “उस समय भाजपा ने विरोध को लोकतांत्रिक अधिकार बताया था।
आज जब युवा कांग्रेस प्रदर्शन कर रही है, तो उसे देशद्रोह करार दिया जा रहा है। यह भाजपा के दोहरे मानदंडों को उजागर करता है।” कांग्रेस ने इस आरोप को भी अस्वीकार किया कि शिखर बैठक स्थल पर हुए प्रदर्शनों से देश की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची। एक अन्य तर्क भी सामने आया, प्रदर्शनकारियों द्वारा कमीज़ उतारने पर भाजपा को आपत्ति क्यों है? आखिर महात्मा गांधी भी केवल एक धोती में रहते थे। फिर एक कमीज़ को लेकर इतना विवाद क्यों? कृत्रिम बुद्धिमत्ता विषयक शिखर बैठक सरकार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई थी। वह इसे हर हाल में सफल बनाना चाहती थी। यह विश्व समुदाय के समक्ष यह संदेश देने का अवसर था कि भारत वैश्विक मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुका है।
बैठक की सफलता निर्विवाद रही, किंतु इसके साथ जुड़ी प्रतिकूल सुर्खियां सरकार की अपेक्षाओं से परे थीं। विशेष रूप से चीनी यांत्रिक कुत्ते ने व्यापक चर्चा बटोरी। संभवतः सरकार ने यह भी नहीं सोचा था कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस उसे असहज स्थिति में ला खड़ा करेगा।
20 फरवरी को कुछ प्रदर्शनकारी भारत मंडपम के एक सभागार में प्रवेश कर गए, जहां उच्चस्तरीय शिखर बैठक चल रही थी। पुलिस के अनुसार, बाद में जिन युवकों की पहचान युवा कांग्रेस के सदस्यों के रूप में हुई, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध प्रदर्शन किया। नाटकीय घटनाक्रम तब शुरू हुआ जब प्रदर्शनकारियों ने अनिवार्य ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया पूरी कर परिसर में प्रवेश किया।
उन्होंने स्वेटर और जैकेट के नीचे टी-शर्ट पहन रखी थीं। अंदर पहुंचते ही जैकेट उतार दी गईं और फिर टी-शर्ट भी। अर्धनग्न अवस्था में युवकों ने प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध नारेबाजी शुरू कर दी। उनकी टी-शर्टों पर भी प्रधानमंत्री विरोधी आपत्तिजनक संदेश अंकित थे। यह तथाकथित ‘निर्वस्त्र प्रदर्शन’ सरकार द्वारा भारत–अमेरिका व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के विरोध में था, जिसे कांग्रेस ‘समर्पण’ करार देती है।
इस बात पर मतभेद रहा कि क्या यह प्रदर्शन अशोभनीय था और क्या इससे उस समय देश की छवि प्रभावित हुई, जब विश्वभर से आए विदेशी प्रतिनिधि शिखर बैठक में उपस्थित थे।
विपक्षी दलों और कांग्रेस के सहयोगियों ने यद्यपि संयमित प्रतिक्रिया दी, किंतु अधिकांश ने इसे “अस्वस्थ मानसिकता की अपरिपक्व सोच” बताकर समर्थन नहीं किया। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि “वैश्विक मंच पर कांग्रेस ने जो किया, उससे देश को शर्मिंदगी उठानी पड़ी।” वहीं बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने टिप्पणी की कि “अर्धनग्न होकर आक्रोश व्यक्त करना न तो शोभनीय है और न ही स्वीकार्य।”प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी ‘नग्नता प्रकरण’ को अपने राजनीतिक भाषणों में प्रमुखता से उठाया। मेरठ की एक जनसभा में उन्होंने कहा, “कांग्रेस पहले ही नग्न हो चुकी थी। भारत के एक वैश्विक आयोजन को कांग्रेस ने अपनी गंदी और नग्न राजनीति का मंच बना दिया। विदेशी मेहमानों के सामने उसके नेता निर्वस्त्र होकर पहुंचे।
देश पहले से जानता है कि आप नग्न हैं, फिर कपड़े उतारने की क्या आवश्यकता थी?” उन्होंने यह भी दोहराया कि शिखर बैठक किसी एक दल का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि राष्ट्र का आयोजन था। वास्तव में, राहुल गांधी की वेशभूषा पिछले कुछ समय से संसद की अलिखित परंपराओं के उल्लंघन को लेकर चर्चा में रही है। संसद में उपस्थित होते समय सांसद प्रायः मर्यादित और औपचारिक परिधान—कुर्ता-पायजामा अथवा कॉलर वाली कमीज़ और पतलूनधारण करते हैं। अनौपचारिक वस्त्र,विशेषकर जींस, को पूर्णतः वर्जित माना जाता रहा है। किंतु राहुल गांधी ने इस परंपरा से भिन्न अपनी पहचान के रूप में आधी बाँह की सफेद टी-शर्ट को अपनाया। एक अवसर पर, जब संसद की कार्यवाही देर रात तक चली, तब वह रात्रि-वस्त्र पायजामा में सदन में प्रवेश करते देखे गए।
यह सर्वविदित है कि संसद सत्र के दौरान राहुल गांधी प्रायः सुर्खियों में रहते हैं। उन पर सदन में व्यवधान उत्पन्न करने और कार्यवाही बाधित करने के आरोप लगते रहे हैं। इसी माह फरवरी में उन्होंने पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक का उल्लेख करते हुए लोकसभा की कार्यवाही में व्यवधान खड़ा कर दिया। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से चीन सीमा पर सरकार की निष्क्रियता को लेकर प्रश्न उठाते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया। पुस्तक के कुछ अंशों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2020 में गलवान घाटी की झड़प के बाद “चीनी टैंक भारतीय क्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे” के संदर्भ में प्रधानमंत्री ने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।
भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों ने आपत्ति जताई कि अप्रकाशित पुस्तक से उद्धरण देना संसदीय नियमों के विरुद्ध है। पुस्तक विवाद से इतर, विपक्ष की महिला सांसदों ने हाथों में तख्तियाँ लेकर प्रधानमंत्री की सीट की ओर कूच किया। प्रधानमंत्री को धन्यवाद प्रस्ताव पर उत्तर देने के लिए लोकसभा आना था, किंतु महिला सांसदों ने भारत–अमेरिका व्यापार समझौते और नरवणे पुस्तक विवाद को लेकर वहीं विरोध दर्ज कराया। बाद में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री से “अनुरोध” किया था कि वह सदन में न आएँ, क्योंकि आशंका थी कि महिला सांसद प्रधानमंत्री की सीट के समीप “अनुचित घटना” कर सकती हैं। महिला सांसदों ने इस आरोप को “मानहानिकारक” बताते हुए अस्वीकार कर दिया। तथापि, यह विपक्ष के लिए एक प्रकार की राजनीतिक सफलता रही, क्योंकि प्रधानमंत्री निचले सदन में बहस का उत्तर नहीं दे सके।
कांग्रेस मानो वही कर रही है, जो बाइस वर्ष पूर्व उसके साथ हुआ था। जून 2004 में, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भारतीय जनता पार्टी के विरोध के कारण लोकसभा में बहस का उत्तर नहीं दे सके थे, तब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव उनके उत्तर के बिना ही पारित हुआ था। एक वर्ष बाद धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए डॉ. सिंह ने उल्लेख किया था कि उन्हें पिछले वर्ष बोलने का अवसर नहीं दिया गया था। राजनीति में कभी जीत होती है, कभी हार; कुछ रणनीतियाँ सफल होती हैं, तो कुछ विफल। इस बार यदि कांग्रेस ने प्रधानमंत्री को बोलने से रोककर और अपनी आवाज़ उठाने के अधिकार पर जोर देकर अंक बटोरे, तो ‘निर्वस्त्र प्रदर्शन’ के मुद्दे पर उसकी स्थिति कमजोर प्रतीत होती है।
अनेक लोगों का मत है कि भले ही विरोध का कारण उचित रहा हो, किंतु स्थान और तरीका दोनों ही अशोभनीय थे—विशेषकर उस दल के लिए, जो स्वयं को प्रमुख विपक्ष के रूप में स्थापित करना चाहता है। राहुल गांधी ने प्रदर्शनकारियों को “बब्बर शेर” कहकर मानो आग में घी डाल दिया। उन्होंने लिखा, “मुझे अपने बब्बर शेर साथियों पर गर्व है, जिन्होंने समझौता कर चुके प्रधानमंत्री के विरुद्ध निडर होकर आवाज़ उठाई।” एक नेता के रूप में उनका यह रुख अपेक्षित माना गया, क्योंकि यदि वह पीछे हटते, तो आलोचना का लक्ष्य स्वयं बनते। फिर भी, इस बिंदु पर ठहरकर कुछ मूलभूत प्रश्न उठते हैं, क्या राजनीति राष्ट्र से ऊपर है? क्या कोई शिखर बैठक किसी एक दल का कार्यक्रम होती है? क्या विदेशी गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में भारत की प्रतिष्ठा से समझौता किया जाना चाहिए? और क्या अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को तुच्छ
राजनीतिक लाभ के लिए बंधक बनाया जाना उचित है?
इन प्रश्नों पर अंतिम निर्णय अभी शेष है। (समाप्त)


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