भाजपा : एक नया जोश

राष्ट्रीय जनभावना उल्लास और आक्रोश के बीच झूल रही है, साथ ही शोक भी व्याप्त है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नाराज़ हैं। वह चुनाव आयोग से टकराव की स्थिति में हैं और उसे “भाजपा के एजेंट” करार देते हुए कहती हैं, “वे ऐसे बात करते हैं मानो वे ज़मींदार हों और हम उनके नौकर।”
बैठक के बाद बनर्जी, जो अपने दल के सांसदों के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रही थीं, ने चुनाव आयोग को “झूठा और अहंकारी” बताया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि एसआईआर मुद्दे पर जब वह उनके कार्यालय गईं तो उन्होंने उनका “अपमान, अनादर और तिरस्कार” किया। बनर्जी ने कहा, “मैंने ऐसा मुख्य चुनाव आयुक्त कभी नहीं देखा। वह बहुत अहंकारी हैं। उन्होंने हमारे साथ बेहद खराब व्यवहार किया।”
दूसरी ओर आयोग ने आरोप लगाया कि टीएमसी विधायकों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ “अपमानजनक और धमकी भरी भाषा” का प्रयोग किया। सूत्रों के अनुसार, “उन्होंने दुर्व्यवहार किया, मेज़ थपथपाई और चली गईं।” बनर्जी के त्वरित क्रोध और उग्र स्वभाव को देखते हुए यह आरोप संगत प्रतीत होता है।
पश्चिम बंगाल के अलावा महाराष्ट्र राज्य में एक अलग तरह की राजनीति सामने आ रही है, शोक की राजनीति। विडंबना यह है कि वही राजनीति उस त्रासदी और शोक को भी पृष्ठभूमि में धकेल रही है। 28 जनवरी को एक विमान दुर्घटना में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अ​िजत पवार की मृत्यु हो गई। यह घटना अचानक और स्तब्ध कर देने वाली थी। उनकी पत्नी सुनेत्रा की शुरुआती तस्वीरें, जिनमें अ​िजत की चचेरी बहन सुप्रिया सुले उनका हाथ थामे दिखाई दे रही थीं, टेलीविजन स्क्रीन पर प्रसारित हुईं। अ​िजत के निधन के बाद वह सुनेत्रा के साथ मज़बूती से खड़ी दिखीं और उस भावनात्मक सहारे का संबल बनीं जिसकी किसी भी विधवा को ऐसी त्रासदी के समय आवश्यकता होती है। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि शोक ने उस परिवार को एकजुट कर दिया जो अ​िजत के जीवनकाल में अलग-थलग था। हालांकि यह आश्चर्यजनक नहीं था, क्योंकि सुले ने हमेशा राजनीति से ऊपर परिवार को रखा। यहां तक कि उस संकट के समय भी, जब अ​िजत ने अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ राजनीतिक कदम उठाया था, वह संयमित और गरिमामय ही दिखाई दीं। उनका स्पष्ट रुख रहा, वह मेरे भाई हैं और हमेशा रहेंगे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कभी भी अपने चचेरे भाई को नीचा दिखाने वाली कोई टिप्पणी नहीं की।
निस्संदेह यह आंशिक रूप से दिखावे की राजनीति थी किंतु सुप्रिया ने कभी मर्यादा नहीं लांघी, यहां तक कि तब भी नहीं जब अ​िजत ने 2024 के लोकसभा चुनाव में अपनी पत्नी सुनेत्रा को उनके खिलाफ मैदान में उतारा था। पर अब वह अतीत की बात है। वर्तमान पर आएं तो पति के अंतिम संस्कार के कुछ ही घंटों के भीतर सुनेत्रा ने उनका राजनीतिक दायित्व संभाल लिया। उन्हें राज्य की उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई, वही पद, जिस पर उनके दिवंगत पति अचानक निधन तक आसीन थे। इस अप्रत्याशित चयन से इतर कुछ बातें विशेष रूप से ध्यान खींचती हैं, समय, शपथ ग्रहण की जल्दबाज़ी और निर्णय के चारों ओर बनी गोपनीयता।
वास्तव में शरद पवार स्वयं सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि सुनेत्रा को पदासीन करने के निर्णय पर उनसे न तो परामर्श किया गया और न ही उन्हें इसकी सूचना दी गई। यह स्थिति भाजपा के लिए अनुकूल कही जा सकती है, क्योंकि अ​िजत के जीवनकाल में एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की बातचीत आगे बढ़ रही थी। इस दृष्टि से उनका असामयिक निधन शरद पवार के लिए व्यक्तिगत के साथ-साथ राजनीतिक आघात भी है और प्राथमिकता क्रम में राजनीतिक अधिक। अपने जीवनकाल में अ​िजत पवार ने एनसीपी को क्षति पहुंचाई और अपने चाचा व मार्गदर्शक शरद पवार की सर्वोच्चता को चुनौती दी। उनका आक्रोश इस बात को लेकर था कि वरिष्ठ पवार अपनी पुत्री को आगे बढ़ा रहे थे और उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी मानते थे।
उनकी मृत्यु के बाद परिवार भले एकजुट दिखाई दिया किंतु सुनेत्रा के शपथ ग्रहण के साथ ही दरारें उभर आईं, क्योंकि शरद पवार गुट से न तो परामर्श किया गया और न ही उसे विश्वास में लिया गया। इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं कि शरद पवार, उनकी पुत्री सुप्रिया अथवा उनके गुट का कोई भी सदस्य शपथ ग्रहण समारोह में उपस्थित नहीं हुआ। यह कि सुनेत्रा एक अप्रत्याशित चयन थीं, इसमें कोई संदेह नहीं किंतु आलोचक इस निर्णय की विवेकशीलता पर भी प्रश्न उठा रहे हैं। पहला कारण यह है कि वह राजनीति में अभी अप्रशिक्षित मानी जाती हैं, उनकी राजनीतिक शुरुआत 2024 के लोकसभा चुनाव से हुई थी, जिसमें उन्हें सुप्रिया सुले से पराजय का सामना करना पड़ा। बाद में सुनेत्रा राज्यसभा सदस्य के रूप में संसद पहुंचीं किंतु अब विधानसभा चुनाव लड़ने के कारण वह सीट रिक्त होने वाली है। सुनेत्रा की नियुक्ति ने राजनीतिक स्थिति को और जटिल बना दिया है, क्योंकि बदले हुए हालात में विलय की बातचीत अब दूर की कौड़ी प्रतीत होती है और इससे स्पष्ट रूप से भाजपा को लाभ मिलता दिख रहा है। राज्य स्तरीय राजनीति से इतर राष्ट्रीय स्तर पर भी अलग-अलग पटकथाएं लिखी और बदली गईं जिनमें केंद्रीय बजट की प्रस्तुति, भारत-यूरोपीय संघ समझौता और भारत-अमेरिका व्यापार समझौता प्रमुख रहे।
जब केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश का आम बजट प्रस्तुत किया तो उन्होंने लगातार नौवीं बार बजट पेश कर एक प्रकार का इतिहास रचा। यह पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के दस बजट के रिकॉर्ड से मात्र एक कम है, हालांकि उनके बजट अलग-अलग अवधियों में थे, छह बजट 1959 से 1964 के बीच वित्त मंत्री रहते हुए और चार 1967 से 1969 के बीच। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम भी नौ बार बजट पेश कर चुके हैं किंतु लगातार नहीं।
जब वह बजट पढ़ रही थीं, तब सत्ता पक्ष की बेंचों से मेज़ थपथपाकर उत्साह प्रकट किया गया, संभवतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रेरित होकर, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से बजट को भारत की “रिफॉर्म एक्सप्रेस” और “असीम अवसरों का राजमार्ग” बताया।
विपक्ष का मत इससे भिन्न रहा उनके अनुसार यह “ढाक के तीन पात” जैसा था। तृणमूल कांग्रेस सांसद सौगत राय के शब्दों में, बजट “रंगहीन और गंधहीन” था।
हालांकि, बजट इस पूरी कहानी का केवल एक हिस्सा है। भाजपा के पास प्रस्तुत करने के लिए और भी उपलब्धियां हैं, दो ऐसे समझौते, जिन्हें सभी समझौतों का “माता और पिता” कहा जा रहा है, क्रमशः यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापार समझौते।
जब दोनों पक्षों ने भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए तो इसे “सभी समझौतों की जननी” बताया गया। यह केवल समझौते के आकार का प्रश्न नहीं था, बल्कि अमेरिका से व्यापारिक निर्भरता कम करने के अवसर का संकेत भी था अर्थात वैश्विक व्यापारिक समीकरणों में संभावित बदलाव। यह यूरोपीय संघ की लचीलेपन और ‘लेन-देन की भावना’ को भी दर्शाता है जो भारत के संदर्भ में अमेरिका के कथित ‘लो या छोड़ो’ रुख से भिन्न माना जा रहा है। दूसरी ओर अमेरिका ने भी देर नहीं की और भारत–ईयू समझौते के कुछ ही दिनों के भीतर दोनों देशों ने एक व्यापार संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत भारतीय निर्यात पर शुल्क 50 प्रतिशत की दंडात्मक दर से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया जो प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में सबसे कम दरों में गिना जा रहा है। अपेक्षानुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जल्दबाज़ी दिखाते हुए भारत से पहले ही सोशल मीडिया पर इस समझौते की घोषणा कर दी। इस बार इस समझौते को राज्यसभा के नामित सदस्य हर्षवर्धन श्रृंगला के शब्दों में “सभी समझौतों के पिता” की संज्ञा दी गई। जहां केंद्रीय बजट के बाद शेयर बाज़ार में गिरावट आई थी, वहीं भारत–अमेरिका समझौते के बाद न केवल उसमें सुधार हुआ, बल्कि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह “आठ महीनों में सबसे अच्छा दिन” साबित हुआ।
महत्वपूर्ण यह है कि दोनों समझौते केवल बारीक शर्तों या इस प्रश्न तक सीमित नहीं हैं कि किसे अधिक लाभ मिला और किसे कम; बल्कि उनका असली महत्व धारणा और समय-निर्धारण में निहित है। भारत–ईयू समझौते के तुरंत बाद अमेरिकी संधि का होना भाजपा के लिए यह संकेत देने का अवसर बना कि ट्रंप को झुकना पड़ा।
तथ्यों से परे, प्रधानमंत्री मोदी के मज़बूत स्थिति से काम करने की छवि और अमेरिका के अलावा अन्य देशों के साथ साझेदारी में उनकी “दूरदर्शिता” ऐसा विषय है जिसे भाजपा और सरकार राजनीतिक लाभ के लिए प्रमुखता से उभारने की कोशिश करेंगी।
व्यापार समझौतों, शुल्क, कर और वित्तीय चर्चाओं के शोर तथा महाराष्ट्र की राजनीतिक घटनाओं के बीच फिलहाल स्थिति भाजपा के लिए लाभकारी प्रतीत होती है। अतः यह कहना कि भाजपा उत्साह के शिखर पर है, कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। दो बड़े व्यापार समझौतों की सफलता और महाराष्ट्र में घटनाक्रम का अनुकूल दिशा में बढ़ना, उसके लिए किसी अप्रत्याशित वरदान से कम नहीं।
इन सब कारकों को मिलाकर देखें तो निकट भविष्य में भाजपा के लिए राजनीतिक सफर अपेक्षाकृत सुगम दिखाई देता है।

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