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अपने क्षत्रपों से भी मिल रही है भाजपा को चुनौती

‘इतना चमका यह सूरज कि आंखों से नर्म मखमली धूप ले गया
दबे पांव जो आया था यह सवेरा, उसके सब रंग रूप ले गया’

लोकसभा चुनाव का पहला चरण चुपचाप गुज़र गया है, पर अनुशासित कही जाने वाली भाजपा में चुप सन्नाटों की बतकहियां बेतरह शोर मचा रही हैं। मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे हिंदी पट्टी के बड़े राज्यों में किनारे कर दिए गए भगवा क्षत्रप तेवर दिखा रहे हैं और उनके समर्पित समर्थक अपने नेताओं के मनोभवों के अनुरूप ही आचरण कर रहे हैं। शिवराज की जगह जब से मोहन यादव को प्रदेश की कमान सौंपी गई है ​िशवराज समर्थकों की नाराज़गी गाहे-बगाहे दिख ही जाती है। इनके बीच एक आम धारणा बलवती हुई है कि ‘दूसरे दलों से आए नेताओं को पार्टी में ज्यादा तरजीह दी जा रही है और भ्रष्टाचार अब पार्टी के लिए इतना बड़ा मुद्दा भी नहीं रह गया है।’
अब राजस्थान का ही मामला ले लें वसुंधरा राजे को सुनियोजित तरीके से किनारे करने के बाद भाजपा नेतृत्व ने कोई 5 वर्षों के बाद मानवेंद्र सिंह जसोल की घर वापिसी कराई है। सनद रहे कि मानवेंद्र सिंह वाजपेयी के बेहद करीबी रहे पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह के बेटे हैं जिनका वसुंधरा से हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा। वसुंधरा से मतभेदों के चलते ही मानवेंद्र ने 2018 में भाजपा छोड़ कांग्रेस ज्वॉइन कर ली थी और वसुंधरा के सामने ही कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा था और उस चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। इसके बाद फिर से 2023 के विधानसभा चुनाव में मानवेंद्र सिवाना सीट से चुनाव लड़े लेकिन एक बार फिर से उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।
भाजपा नेतृत्व से वसुंधरा की नाराज़गी भी अब सार्वजनिक तौर पर सामने दिखने लगी है। वसुंधरा तो अब चुनाव प्रचार के लिए घर से भी नहीं निकल रहीं। सूत्रों की मानें तो वसुंधरा की नाराजगी की वजह से भाजपा को 5-7 सीटों का नुक्सान उठाना पड़ सकता है जिसमें बाड़मेर, चुरु, दौसा जैसी सीटों के नाम लिए जा सकते हैं। बाड़मेर में पीएम मोदी की बड़ी रैली भी हुई है। मानवेंद्र सिंह को इस संसदीय सीट का जिम्मा भी सौंपा गया, फिर भी भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार कैलाश चौधरी मुकाबले में पिछड़ते नजर आ रहे हैं। पिछड़ तो कांग्रेस के उम्मेद राम बेनीवाल भी रहे हैं क्योंकि यहां से एक निर्दलीय युवा उम्मीदवार रविन्द्र सिंह भाटी मैदान मारने को तैयार बताए जाते हैं।
राजपूतों की नाराज़गी कैसे दूर करेगी भाजपा
उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के राजपूतों में भाजपा को लेकर एक रोष नजर आ रहा है। राजपूतों के आक्रोश की वजह है 23 मार्च को दिया गया केंद्रीय मंत्री परुषोत्तम रूपाला का वो बयान जिसमें उन्होंने कहा था ‘विदेशी शासकों और अंग्रेजों के उत्पीड़न के आगे तत्कालीन महाराजाओं ने अपने घुटने टेक दिए थे और यहां तक कि अपनी बेटियों की शादियां भी उनसे कर दी थीं लेकिन दलित समाज ने ऐसा नहीं किया जबकि उनके ऊपर ज्यादा अत्याचार हुए।’
क्षत्रिय समाज रूपाला के बयान से इतना आहत हुआ कि उन्होंने भाजपा से रूपाला की टिकट वापिस लेने की मांग तक कर दी। बवाल इतना बढ़ा कि अन्य राज्यों के राजपूतों में भी इसका असर दिखने लगा। मामले को तूल पकड़ता देख केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। गांधी नगर से अपना नामांकन भरने से पहले एक कार्यक्रम में शाह ने कहा कि ‘रूपाला ने दिल से क्षत्रिय समाज से माफी मांग ली है अब तो उन्हें छोड़ दो।’ वहीं सूत्र बताते हैं कि क्षत्रिय समाज की नाराज़गी की एक और बड़ी वजह है कि इस दफे के चुनाव में भाजपा ने राजपूतों की जगह ओबीसी जातियों को ज्यादा महत्व दिया है। यूपी जैसे बड़े राज्य में अब तक केवल 3 राजपूतों को ही पार्टी टिकट मिल पाई है।
बंसल की नाराज़गी कैसे दूर करेंगे मनीष
इस दफे मनीष तिवारी जैसा चाहते थे वैसा ही हुआ, वे आनंदपुर साहिब की जगह चंडीगढ़ से अपने लिए पार्टी टिकट चाहते थे वजह चंडीगढ़ अपेक्षाकृत एक छोटी सीट है, यहां महज़ साढ़े 6 लाख मतदाता हैं। पढ़े-लिखे मतदाताओं की ज्यादा बड़ी आबादी है जिससे उन तक पहुंचना ज्यादा आसान है। पूर्वांचल और उत्तराखंड के मतदाताओं का भी एक बड़ा वोट बैंक है और चंडीगढ़ सीट पर भाजपा ने अपेक्षाकृत एक कमजोर उम्मीदवार को मैदान में उतारा है। मनीष अपनी फरियाद सोनिया गांधी के पास लेकर गए थे, वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से भी मिले थे। सूत्र बताते हैं कि सोनिया के कहने पर ही मनीष को चंडीगढ़ से टिकट दिया गया। चंडीगढ़ सीट पर पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष पवन बंसल का सबसे बड़ा दावा था, पर उनके बही-खाता के ब्यौरों को लेकर गांधी परिवार की किंचित नाराजगी बताई जा रही थी, लिहाज़ा उनका टिकट कट गया। जैसे ही मनीष के टिकट की घोषणा हुई तो सोनिया ने मनीष को फोन कर कहा कि वे फौरन बंसल से बात करें और उनसे उनका समर्थन मांगे। मनीष ने कोई तीन-चार दफे पवन बंसल को फोन लगाया पर बंसल ने मनीष का ना कोई फोन उठाया न ही कॉल बैक ही किया। इसके बाद मनीष अपने लाव-लश्कर के साथ दिल्ली से चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए, वहां पहुंच कर उन्होंने बंसल के करीबी लोगों से संपर्क साधा और बंसल को चुनाव में साथ आने का संदेशा भिजवाया।
इसके बावजूद भी बंसल ने मनीष से कोई बात नहीं की। पर उन्होंने मनीष को यह संदेशा जरूर भिजवा दिया, ‘मैं एक पुराना कांग्रेसी हूं, क्षेत्र में आपका विरोध नहीं करूंगा, पर आपका प्रचार भी नहीं करूंगा।’ इसके बाद जब हाईकमान एक्टिव हुआ तो बंसल से जुड़े लोग मनीष तिवारी के चुनाव प्रचार में सक्रिय हो गए।
अपने काम की गारंटी पर वोट मांग रही हैं मेनका
भाजपा की वरिष्ठ नेत्री मेनका गांधी अपने दीगर और दिलचस्प अंदाज में सुल्तानपुर में अपना चुनाव प्रचार कर रही हैं। यूपी में भाजपा के अन्य प्रत्याशी जहां मोदी की गारंटी और डबल इंजन की सरकार के नाम पर वोट मांग रहे हैं वहीं मेनका गांधी क्षेत्र में किए अपने विकास कार्य गिना रही हैं। मेनका अपने क्षेत्रवासियों को यह बताने से नहीं चूक रहीं कि ‘कोरोना काल में उन्होंने यहां के लोगों की दिल खोल कर मदद की। एक लाख बीस हजार पक्के घर बनावाए और क्षेत्र के लोगों के लिए बतौर सांसद वह हमेशा एक फोन काल की दूरी पर उपलब्ध रहीं।’
मेनका अपने चुनाव प्रचार में सुल्तानपुर के ‘इंटरनेशनल स्पोर्टस ट्रेनिंग कांप्लेक्स’, रेडियो स्टेशन, रोड क्नेक्टिविटी और सुल्तानपुर से लखनऊ और मुंबई की रेल संपर्क की याद दिला रही हैं। वो भूले से कभी गांधी परिवार या राम मंदिर का नाम नहीं ले रहीं। यहां तक कि पीएम मोदी का जिक्र भी बमुश्किल ही अपने चुनावी प्रचार में करती है।
मुश्किल में कई केंद्रीय मंत्री
भाजपा के कई मंत्रियों की सीटें फंसी हुई हैं, जहां उन्हें उनके विरोधी उम्मीदवारों से कड़ी टक्कर मिल रही हैं। चाहे वह ओडिशा में धर्मेंद्र प्रधान की सीट हो, केरल में राजीव चंद्रशेखर की, मुंबई में पीयूष गोयल की या यूपी में मुजफ्फरनगर से संजीव बालियान की। लेकिन केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह लखनऊ में मजे में हैं, यहां उनका कोई मुकाबला ही नहीं दिखता। बावजूद लखनऊ से लगी बाराबंकी सीट पर भाजपा उम्मीदवार को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। कम से कम बाराबंकी सीट पर राजनाथ सिंह का कोई प्रभाव नहीं दिखता।
…और अंत में
जाटों के सबसे बड़े सिरमौर समझे जाने वाले चौधरी चरण सिंह का प्रभाव और प्रभुत्व क्या उनकी तीसरी पीढ़ी तक पहुंचते-पहुंचते बेदम होने लगा है। नहीं तो अब तलक जाट समुदाय में चौधरी चरण सिंह के नाम का सिक्का चलता था। आमजन में मान्यता है कि ‘यूपी में किसी भी मतदान से एक दिन पहले चौधरी चरण सिंह किसी बड़े-बुजुर्ग जाट के सपने में आ जाते थे और टोपी उतार कर अपनी इज्जत की भीख मांगते थे और अगले ही दिन जाट समुदाय एकजुट होकर अजित सिंह के पक्ष में अपना वोट डाल आते थे।’ पर लगता है इस दफे यह परंपरा और मान्यता चौधरी चरण सिंह के पोते और अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी की दहलीज तक नहीं पहुंच पा रही है। क्या रंग बदल कर भगवा होना जयंत के लिए महंगा साबित हो रहा है।

– त्रिदिब रमन 

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