सर्वाइकल कैंसर विश्व स्तर पर महिलाओं में होने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है, जिसके प्रतिवर्ष लगभग 660,000 नए मामले सामने आते हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राजस्थान के अजमेर में 14 वर्षीय लड़कियों के लिए राष्ट्रव्यापी ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) टीकाकरण अभियान का शुभारंभ किया, जो गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर को रोकने की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर सहमति के बाद स्वैच्छिक, निःशुल्क, एकल खुराक एचपीवी वैक्सीन दी जाएगी।
डब्ल्यूएचओ से जुड़े क्षेत्रों में दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र का गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की घटनाओं (नये मामलों) और मृत्यु दर में दूसरा सर्वोच्च स्थान है, जिसमें भारत का योगदान 65 फीसदी से ऊपर है। भारत में महिलाओं में यह दूसरा सबसे आम कैंसर है, जिसके बारे में अनुमान लगाया गया कि साल 2022 में देश में 127,526 नये मामले सामने आये और इससे 79,906 मौतें हुईं। राष्ट्रीय स्तर पर इसकी जांच का विस्तार चिंताजनक रूप से निम्न है और 30-49 साल की केवल 1.9 फीसदी महिलाओं की जांच की जा रही है। हालांकि, एचपीवी वैक्सीन के काले अतीत को भुलाया नहीं जा सकता।
साल 2009-10 में आंध्र प्रदेश और गुजरात में एक परीक्षण का हिस्सा रही सात लड़कियों की मौत हो गयी थी। आईसीएमआर की जांच में दावा किया गया कि जो कारण थे वो “शायद वैक्सीन से जुड़े नहीं थे। हालांकि, इन सभी मामलों में मौत की वजह पक्के तौर पर स्थापित नहीं की जा सकती”। इसने सभी एईएफआई की पहचान करने और उनकी छानबीन करने की जरूरत की ओर भी एक प्रमुख चिंता के रूप में ध्यान दिलाया। भारत द्वारा 14 वर्षीय लड़कियों के लिए राष्ट्रव्यापी ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) टीकाकरण कार्यक्रम शुरू करने का कदम ऐसे समय में विज्ञान के समर्थन में सशक्त संदेश है जब पूरी दुनिया में टीकाकरण-विरोधी भावनाएं खतरनाक रूप से तेजी पकड़ रही हैं।
टीकों से परहेज का असर अमेरिका में साफ दिख रहा है जहां वर्तमान में 26 राज्यों में खसरा की महामारी पांव पसार रही है। एचपीवी टीकाकरण केवल निर्धारित सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में और प्रशिक्षित स्वास्थ्य अधिकारियों की मौजूदगी में संचालित किया जायेगा। साथ ही, कुशल स्वास्थ्य-देखभाल टीमें वैक्सीन लगाने के बाद निगरानी और ‘टीकाकरण के पश्चात होने वाली प्रतिकूल घटनाओं’ (एईएफआई) से निपटने के लिए तैयार रहेंगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित एक खुराक वाली वैक्सीन इस्तेमाल में लायी जायेगी। इस बात के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं कि गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर के लगभग सभी मामलों में एचपीवी की उच्च-जोखिम वाली किस्मों, खासकर 16 व 18, से लगातार संक्रमण ही कारण होता है।
भारत में गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के कुल मामलों में 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा इन्हीं दोनों किस्मों का है। साक्ष्य इस तथ्य की ओर भी इशारा करते हैं कि गर्भाशय ग्रीवा कैंसर को एचपीवी टीकाकरण और नियमित जांच के जरिए काफी हद तक रोका जा सकता है और अगर जल्दी पता लग जाए और तुरंत इलाज शुरू हो जाए तो यह ठीक हो सकता है। गर्भाशय ग्रीवा कैंसर ऐसा विरल कैंसर है जिसमें टीका एक बेहतरीन निवारक साबित हुआ है। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में जहां टीकाकरण और स्क्रीनिंग की सुविधा सीमित है, वहां मामलों की संख्या कहीं अधिक है। गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के अधिकांश मामले लगातार बने रहने वाले ह्यूमन पैपिलोमावायरस संक्रमण के कारण होते हैं।
यह विचार कि कैंसर किसी वायरस के कारण हो सकता है, सबसे पहले 1930 के दशक में सामने आया, जब डॉ. रिचर्ड शोप ने यह सिद्धांत दिया कि पैपिलोमावायरस संक्रमण जानवरों में मस्से और कैंसर का कारण बन सकता है। इस खुलासे ने जर्मन वायरोलॉजिस्ट प्रोफेसर हेरोल्ड ज़ुर हाउसेन को मानव कैंसर में वायरस की भूमिका की जांच करने के लिए प्रेरित किया। गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के नमूनों का परीक्षण करके, एचपीवी के कई उपभेदों की पहचान की गई। बाद में यह स्पष्ट हो गया कि गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के नमूनों का एक बड़ा हिस्सा एचपीवी 16 और 18 संक्रमणों से जुड़ा था। इस खोज के आधार पर, शोधकर्ताओं ने उच्च जोखिम वाले एचपीवी उपभेदों को लक्षित करने वाले टीके विकसित किए जिससे अंततः यूके का पहला एचपीवी टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हुआ।
प्रोफेसर ज़ुर हाउसेन को उनके योगदान के लिए 2008 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दशकों के शोध के बाद एचपीवी संक्रमण को रोकने वाला पहला टीका 2006 में यूके और यूएसए में लाइसेंस प्राप्त हुआ। तब से एचपीवी के विभिन्न प्रकारों से सुरक्षा प्रदान करने वाले कई एचपीवी टीके सफलतापूर्वक विकसित किए गए हैं। एचपीवी के उच्च जोखिम वाले प्रकारों को लक्षित करने वाले टीकों के सफल विकास के बाद पहला यूके एचपीवी टीकाकरण कार्यक्रम 2008 में शुरू किया गया था। यह कार्यक्रम 12-13 वर्ष की आयु की लड़कियों के लिए स्कूलों में चलाया गया था और शुरू में इसमें टीके की तीन खुराकें अनिवार्य थीं।
सितंबर 2019 से टीकाकरण और प्रतिरक्षण पर संयुक्त समिति (जेसीवीआई) से प्राप्त साक्ष्य और सलाह के आधार पर, एचपीवी टीकाकरण कार्यक्रम को 12-13 वर्ष की आयु के लड़कों को भी शामिल करने के लिए विस्तारित किया गया ताकि उन्हें एचपीवी से संबंधित कैंसर से बचाया जा सके और वायरस के प्रसार को कम किया जा सके। एचपीवी वैक्सीन गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के खिलाफ लड़ाई में क्रांतिकारी साबित हुई है।























