नीतीश कुमार और बिहार

Summary :

बिहार के मुख्यमन्त्री श्री नीतीश कुमार लगभग 40 वर्ष बाद राज्य की सक्रिय चुनावी राजनीति से अलग हो रहे हैं और देश के उच्च सदन राज्यसभा में पहली बार पदार्पण करने का फैसला कर रहे हैं। नीतीश बाबू पहली बार विधानसभा में 1985 में पहुंचे थे। इसमें किसी प्रकार की दो राय नहीं हो सकती कि पिछले 20 साल से बिहार की राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रही है क्योंकि 2005 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के गठबंधन के साथ उनकी पार्टी जनता दल (यू) ने जिस प्रकार की शानदार जीत हासिल की थी उसने बिहार की पूरी राजनीति की…

बिहार के मुख्यमन्त्री श्री नीतीश कुमार लगभग 40 वर्ष बाद राज्य की सक्रिय चुनावी राजनीति से अलग हो रहे हैं और देश के उच्च सदन राज्यसभा में पहली बार पदार्पण करने का फैसला कर रहे हैं। नीतीश बाबू पहली बार विधानसभा में 1985 में पहुंचे थे। इसमें किसी प्रकार की दो राय नहीं हो सकती कि पिछले 20 साल से बिहार की राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रही है क्योंकि 2005 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के गठबंधन के साथ उनकी पार्टी जनता दल (यू) ने जिस प्रकार की शानदार जीत हासिल की थी उसने बिहार की पूरी राजनीति की दिशा बदल कर रख दी थी और 1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद उपजी सामाजिक न्याय की राजनीति के तेवर भी बदल कर रख दिये थे। 1990 से लेकर 2005 तक इस राज्य में नीतीश बाबू के समकक्ष और उन्हीं के संगी-साथी माने जाने वाले राष्ट्रीय जनता दल के नेता श्री लालू प्रसाद यादव का जिस प्रकार राजनीतिक उदय और पराभव हुआ उसने नीतीश बाबू की अपेक्षाकृत साफ-सुथरी व सौम्य सामाजिक न्याय की राजनीति को चमकाया जिसे सियासी हलकों में सुशासन की भी संज्ञा दी गई। मगर पिछले 20 वर्षों में दस बार राज्य के मुख्यमन्त्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश बाबू ने इसे इस प्रकार भुनाया कि उन्हें ही सुशासन बाबू कहा जाने लगा। उनकी इस छवि को कालान्तर में उनके कठोर प्रतिद्वन्द्वी बनकर उभरे श्री लालू प्रसाद भी नहीं तोड़ सके और 2015 के चुनावों में जब उन्होंने नीतीश कुमार की पार्टी जद (यू) के साथ मिलकर चुनाव लड़ा तो उनकी इस छवि को ही आगे रखना पड़ा लेकिन उनके अब पद छोड़ने की घोषणा के बाद बिहार की राजनीति एक और महत्वपूर्ण करवट ले सकती है जिसमें केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की प्रमुख भूमिका होने जा रही है।
जो लोग बिहार की राजनीति से परिचित हैं वे जानते हैं कि इस राज्य में जनसंघ या भाजपा अपनी राजनीतिक जगह बनाने के लिए कड़ा संघर्ष पिछले 55 साल से कर रही है। परन्तु इसकी यह यात्रा तभी शबाब पर आयी जब इसे श्री नीतीश कुमार का साथ मिला। नीतीश बाबू की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने भाजपा की घनघोर हिन्दुत्व परक राष्ट्रवादी राजनीति को सामाजिक आयाम दिया और बिहार की जाति मूलक राजनीति में नये वर्ग गत समीकरण गढ़े। इससे भाजपा को राज्य के गांवों तक पहुंचने में सफलता मिली जो इससे पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रभाव क्षेत्र माने जाते थे। हालांकि इसका दायरा बहुत सीमित ही था क्योंकि राज्य में 1990 से पहले तक समाजवादियों का खासा दबदबा था जिसके नेता भारत रत्न स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर थे। एेसे माहौल में भारतीय जनता पार्टी के लिए भी संभावनाएं बहुत अधिक नहीं थीं। हालांकि 1967 के बाद से इसके प्रभाव में वृद्धि होनी शुरू हो गई थी। परन्तु पिछले वर्ष 2025 के आते-आते नीतीश बाबू को साथ में लेकर चलने वाली भाजपा के ग्राफ में निर्णायक परिवर्तन हुआ और यह राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बन गई।
विधानसभा में इसके सर्वाधिक 89 विधायक चुनकर आये जिसके बाद नीतीश बाबू की जद (यू) के 85 विधायक चुने गये। इन चुनावों में मतदाताओं ने राज्य के प्रमुख विपक्षी दल माने जाने वाले लालू प्रसाद के राष्ट्रीय जनता दल को हाशिये पर धकेलते हुए केवल 25 सीटें ही दीं और देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस को केवल छह सीटें ही नवाजी जबकि इन दोनों पार्टियों ने मिलकर ही चुनाव लड़ा था। इससे यह साबित हुआ कि श्री नीतीश कुमार ने अपने पिछले 19 वर्ष के शासन के दौरान राज्य में जिस प्रकार का शासन चलाया उसे जनता ने सुशासन ही माना । बेशक यह कहा जा सकता है कि इस अवधि के दौरान 17 महीने का वह कार्यकाल भी रहा जिसमें लालू व नीतीश ने मिलकर सरकार चलाई। इसकी वजह से नीतीश बाबू को पल्टू चाचा का खिताब भी मिला। मगर आज मौजू सवाल यह है कि उनके गद्दी से हटने के बाद राज्य का मुख्यमन्त्री किस पार्टी का नेता बनेगा।
सभी जानते हैं कि जनता दल (यू) व भाजपा का पिछले तीन दशक से गठबन्धन चल रहा है (समता पार्टी के बनने के समय से)। यहां एक बिन्दु अति महत्वपूर्ण हो जाता है कि पिछले लगभग दो वर्षों से नीतीश बाबू का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा है। इसे लेकर उनके बारे में तरह-तरह की अटकलबाजियां और चर्चाएं हैं, जिनमें सबसे चिन्ताजनक उनकी मानसिक स्थिति को लेकर है। इस बारे में अधिकारिक तौर पर किसी प्रकार की विश्वस्त जानकारी जनता को उपलब्ध नहीं है मगर सार्वजनिक रूप से कुछ विशेष अवसरों पर जिस प्रकार का व्यवहार श्री नीतीश कुमार का बतौर मुख्यमन्त्री देखा गया है, उससे आम जनता में संशय जरूर है। मगर राज्यसभा में जाने की इच्छा मुख्यमन्त्री ने स्वयं प्रकट की है अतः उनकी चुनावी राजनीति की पारी का इसे विराम ही कहा जा रहा है लेकिन इसके साथ ही नीतीश बाबू अपने एकमात्र पुत्र निशान्त कुमार को राजनीति में लाना चाहते हैं और उसे अपनी पार्टी की राजनीतिक विरासत सौंपना चाहते हैं। यह कदम उनकी अपनी पार्टी में विद्रोह की संभावना को नकारने के लिए भी हो सकता है मगर इससे राज्य की आम जनता पर कोई विशेष प्रभाव पड़ेगा, यह नहीं कहा जा सकता क्योंकि नीतीश बाबू की जीवन पर्यन्त राजनीति परिवारवाद के खिलाफ ही रही है। चर्चा चल रही है कि निशान्त कुमार को सीधे उपमुख्यमन्त्री बनाया जायेगा और भाजपा के किसी नेता को मुख्यमन्त्री। जाहिर है कि इससे नीतीश बाबू द्वारा तैयार किये गये अति पिछड़े वोट बैंक का तभी कुछ लेना-देना हो सकता है जबकि निशान्त कुमार के पीछे पूरा जनता दल (यू) चट्टान की तरह अंध भक्त होकर खड़ा रहे। जबकि बिहार का इतिहास बताता है कि इस राज्य की जनता अंध भक्ति में विश्वास नहीं रखती। उदाहरण के लिए स्व. कर्पूरी ठाकुर के पुत्र का ही सन्दर्भ काफी है जो फिलहाल भी राजनीति में हैं।

Aditya Chopra

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