चढ़ावा चोरी से जुड़ी संवेदना !

Summary :

मेरे सामने आज के हिन्दी और अंग्रेजी के विभिन्न अखबार रखे हुए हैं जिनमें ये खबरें प्रमुखता से छपी हुई हैं कि अयोध्या के श्री राम मन्दिर के अलावा माता वैष्णो देवी के दरबार में चढ़ाये गये चांदी के चढ़ावे में भी 500 करोड़ रुपए का घपला हुआ है। इसके अलावा श्री बदरीनाथ धाम में भी चढ़ावा चोरी के मामले की जांच चल रही है। साथ ही यह खबर भी है कि राजधानी दिल्ली के एक इलाके में एक ई-रिक्शा व बस की टक्कर में एक 12 वर्षीय छात्रा की मौत हो जाने के बाद आसपास खड़े राहगीर किस तरह…

मेरे सामने आज के हिन्दी और अंग्रेजी के विभिन्न अखबार रखे हुए हैं जिनमें ये खबरें प्रमुखता से छपी हुई हैं कि अयोध्या के श्री राम मन्दिर के अलावा माता वैष्णो देवी के दरबार में चढ़ाये गये चांदी के चढ़ावे में भी 500 करोड़ रुपए का घपला हुआ है। इसके अलावा श्री बदरीनाथ धाम में भी चढ़ावा चोरी के मामले की जांच चल रही है। साथ ही यह खबर भी है कि राजधानी दिल्ली के एक इलाके में एक ई-रिक्शा व बस की टक्कर में एक 12 वर्षीय छात्रा की मौत हो जाने के बाद आसपास खड़े राहगीर किस तरह घटना की वीडियो बनाने में व्यस्त रहे न कि छात्रा को बचाने के प्रयास में जुटे रहे। इससे पता चलता है कि मानवीय संवेदनाओं की स्थिति क्या है? यदि समाज किसी किशोरी को मौत के मुंह में जाते देखकर भी स्पन्दनविहीन बना रहता है और उसकी संवेदना उसे नहीं झकझोरती है तो इसका अर्थ यही है कि आज का मानव समाज भौतिक मोह में इस कदर संलिप्त हो चुका है कि उसे ईश्वर द्वारा प्रदत्त सबसे अधिक अनमोल ‘मानव जीवन’ की भी कोई परवाह नहीं है।
हिन्दू संस्कृति मानव जीवन को अत्यधिक महत्व इस प्रकार देती है कि करोड़ों योनियों में जन्म लेने के बाद ईश्वर मानव रूप में किसी भी प्राणी को जन्म देते हैं और उसे सद्कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं परन्तु जब लोग भौतिक सुख के लिए मानवीय पीड़ा के एहसास का परित्याग कर केवल द्रव्य (धन) की लालसा में जीने लगते हैं तो उनके भीतर का ईश्वरत्व बोध समाप्त हो जाता है परन्तु इसी समाज के लोग मन्दिर में चढ़ाये गये चढ़ावे में चोरी होने पर विचलित हो जाते हैं और इसे ईश्वर का घनघोर निरादर कहते हैं। मगर उसका क्या होगा जो ईश्वर की अनमोल देन मानव जीवन के बारे में वह उपेक्षा का भाव रखता है। हिन्दू संस्कृति कहती है कि अहिंसा परम धर्म होता है और मानवीयता या मानव धर्म सर्वोच्च शिखर पर रहता है। इस दृष्टि से देखा जाये तो आज का समाज निपट भौतिकता की चकाचौंध में अपना रास्ता भूल चुका है और वह मात्र दिखावे के लिए सामाजिक नैतिकता का ढोल पीटता रहता है। क्या वजह है कि कल तक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगाने वाले लोग अयोध्या में उनके मन्दिर से चढ़ावा चोरी होने की घटना पर सबसे ज्यादा व्यथित होते हैं? क्या वजह है कि मन्दिर निर्माण आन्दोलन के दौरान राम भक्तों को गोलियों से भूनने वाले लोग चोरी की घटना से भाव विह्वल हो जाते हैं और इसे हिन्दुओं की आस्था व विश्वास पर सबसे बड़ा आघात बताते हैं? जिनके मन में आस्था तब विलुप्त थी जब मन्दिर निर्माण के लिए पूरे भारत में राष्ट्रीय आन्दोल चल रहा था और पूरा हिन्दू समाज यह कह रहा था कि
‘मन्दिर वहीं बनायेंगे, जहां राम का जन्म हुआ था’
कहने का मतलब यह है कि हमारी संवेदनाएं भी भौतिक सुखों की दास हो चुकी हैं। 12 वर्षीय छात्रा की मौत की पीड़ा को समाज अपने मोबाइल फोन में रील बनाकर कैद करने के लिए इसीलिए उतावला रहता है कि एेसा करने से उसे कुछ अर्थ लाभ हो जायेगा वहीं दूसरी ओर श्री राम मन्दिर में चढ़ावा चोरी की घटना को उच्च आयाम देने से कुछ राजनीतिक दलों को यह लालच रहता है कि इससे उन्हें व्यापक तौर पर राजनीतिक लाभ होगा जिसे वह 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में उठा सकेंगे। दोनों में अन्तर कुछ भी नहीं है क्योंकि दोनों घटनाओं का सम्बन्ध अन्ततः भौतिक लाभ से ही जाकर जुड़ता है लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है जो भारत की धर्म परायणता से जुड़ा हुआ है। मनुष्य इह-लोक में किये गये दुष्कर्मों से छुटकारा पाने के लिए और परलोक सुधारने की गरज से मन्दिरों में दान-दक्षिणा को प्रदान करता है।
हिन्दू मन्दिरों में दान देने का एक उद्देश्य यह भी होता है कि ईश्वर को दिये गये उसके धन का उपयोग दीन-दुखियों की सेवा में होगा। क्योंकि मन्दिरों के आसपास भारी संख्या में समाज द्वारा परित्याग किये हुए दुखी जन निवास करते मिलते हैं। हिन्दू धर्म में भंडारों या लंगरों का आयोजन व्यर्थ में ही नहीं होता, बल्कि इनका लक्ष्य उन लोगों की सेवा करना होता है जो अपना पेट भरने के लिए दूसरों पर आश्रित रहते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सिख गुरुद्वारे हैं जिनमें से कुछ में साल के 365 दिन लंगर लगता रहता है। इसे गुरु सेवा का उत्कृष्टतम माध्यम माना जाता है। अतः धर्म का अन्तिम लक्ष्य भी मानव सेवा ही होता है। इस दृष्टि से देखा जाये तो मन्दिरों के चढ़ावा चोरी की घटनाएं मानवता के प्रति ही सबसे बड़ा अपराध है। मगर हम जानते हैं कि अपराध करके द्रव्य कमाना मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी होती है जिससे उसके नैतिक पतन का रास्ता खुलता है। यह नैतिक पतन ही उसे भगवान के चढ़ावे में चोरी करने के लिए उकसाता है परन्तु इसके कई आयाम हैं। भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में राजनीति सर्वत्र व्यापी है क्योंकि मनुष्य के जन्म लेने से ही नगर पालिका या ग्रामसभा स्तर से यह शुरू हो जाती है जब उसका जन्म पंजीकरण कराया जाता है। इसके बाद शिक्षा से लेकर व्यवसाय या नौकरी तक लगने के लिए राजनीति ही प्रमुख भूमिका निभाती है अतः समाज की नैतिकता गिर जाने का प्रभाव राजनीति पर पड़े बिना नहीं रह सकता। यही वजह है कि हम देख रहे हैं कि कल तक के राम द्रोही कहे जाने वाले लोग आज सबसे बड़े राम भक्त बने घूम रहे हैं परन्तु इस सबसे ऊपर चढ़ावा चोरी एक गंभीर आपराधिक कृत्य भारत दंड न्याय संहिता में है जिसका संज्ञान इसी के अनुरूप लिया जाना चाहिए और जिन-जिन मन्दिरों में भी चढ़ावा चोरी हुआ है उनके प्रबन्धनों की सख्त जवाब तलबी होनी चाहिए।

Aditya Chopra

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