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खाद्यान संकट की चुनौती

फाल्गुन की होली तो हो ली।

फाल्गुन की होली तो हो ली। कोई दौर था जब होली उत्सव पर भी सर्दी का अहसास होता था। लेकिन इस वर्ष फरवरी के अंतिम सप्ताह से ही गर्मी का अहसास होने लगा। मार्च के पहले सप्ताह ही दिल्ली का तापमान 35 डिग्री को छू गया। राजस्थान का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस पहुंचने लगा है। महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, आंध्र, ओडिशा गर्म होने लगे हैं। मौसम विज्ञानियों ने पहले ही भविष्यवाणी कर रखी है कि इस बार तपिश पिछले सालों से कुछ ज्यादा ही होगी। ज्यादा लू भी चलेगी और गर्मी को झेलना मुश्किल हो जाएगा। लोग भी महसूस कर रहे हैं कि अभी यह हाल है तो मार्च के तीसरे हफ्ते में क्या होगा? यह सोच कर ही लोग परेशान हैं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इस वर्ष गर्मी ज्यादा बढ़ने को लेकर एक बैठक की थी और गर्मी से बचाव के लिए उपाय करने को कहा था। यह सभी जानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग अब हम पर ही प्रहार करने लगी है। दूसरी ओर राजस्थान और गुजरात में बेमौसमी बारिश और ओलावृष्टि में खड़ी फसलों को नुक्सान हुआ है। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां हमारे सामने हैं। यह संकट इतना बड़ा है कि इससे भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व प्रभावित हो रहा है। 
जलवायु परिवर्तन से शहरी क्षेत्र ही नहीं अब ग्रामीण क्षेत्र भी प्रभ​वित​ होने लगे हैं। तापमान बढ़ने से फसलें और पर्यावरण तो प्रभावित होता ही है बल्कि इससे जल स्रोत भी सूख जाते हैं। अमेरिका और चीन के बाद भारत के लगभग कई राज्य जल संकट वाली सूची में शामिल हैं। इस सूची में पंजाब, उत्तर प्रदेश, ​बिहार, राजस्थान, असम, तमिलनाडु,  महाराष्ट्र, गुजरात और केरल शामिल हैं, जहां अभूतपूर्व जलसंकट पैदा होने का खतरा पैदा हो गया है। सबसे बड़ी चुनौती तो देश के खाद्यान्न सुरक्षा की है। पिछले वर्ष भी जबरदस्त गर्मी पड़ने से किसानों को भारी नुक्सान उठाना पड़ा था। हुआ यह था कि कटाई से पहले भीषण गर्मी पड़ने से बालियों में गेहूं का दाना सिकुड़ गया था। वर्ष 2021 में अगस्त के सूखे  ने किसानों की फसल बर्बाद कर दी थी। वहीं 2022 की शुरूआत में ही भारी बारिश और शीत लहर ने खड़ी फसलों को बहुत नुक्सान पहुंचाया था। अप्रैल में भीषण गर्मी पड़ी, जिससे गेहूं की फसल का नुक्सान हुआ। 2022 का मानसून भी 2021 की तरह रहा। कहीं भारी तो कहीं कम वर्षा से फसलों को नुक्सान हुआ। 
इस वर्ष भी अगर रबी की फसल को नुक्सान हुआ तो किसानों की मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी। वहीं मौसम विभाग ने खरीफ की फसल को लेकर भी चेतावनी जारी कर दी है। अलनीनो जुलाई तक प्रवेश करेगा जिससे आमतौर पर भारत में कमजोर मानसून और अत्य​ाधिक गर्मी होती है। ऐसे में ​िकसान खरीफ की फसल से भी ज्यादा उम्मीद नहीं लगा रहे। यद्यपि अनेक मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि गेहूं की फसल को 35 डिग्री सेल्सियस तक कोई नुक्सान नहीं होने वाला, लेकिन यदि तापमान इससे ऊपर रहा तो फसल प्रभावित होगी। गेहूं का दाना सिकुड़ गया तो गुणवत्ता में कमी के चलते किसानों के औने-पौने दामों में फसल आढ़तियों को बेचनी पड़ सकती है। पंजाब का राष्ट्रीय खाद्यान्न पूल में बड़ा योगदान है। हरियाणा भी खाद्यान्न उत्पादन में अग्रणीय है। पिछले कुछ महीनों से आटे के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। दुनिया में कोरोना संकट और रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते गेहूं उत्पादन पर असर पड़ा है। अगर खाद्यान्न संकट पैदा होता है तो निश्चित रूप से महंगाई बढ़ेगी। जलवायु चक्र बदलने से हमें ऐसे उपाय करने होंगे, जिससे मौसम के तीखे तेवरों से बचा जा सके। हमें फसलों के विविधीकरण पर जोर देना होगा, जिससे अधिक तापमान में भी कम पानी के साथ फसलें उगाई जा सकें। दरअसल जलवायु परिवर्तन की बड़ी मार समाज के कमजोर वर्गों, किसानों और मजदूरों पर पड़ती है। अगर इस वर्ग की जेब में पैसा होगा तो ही वह बाजर में जाएगा। जब बाजार में चीजें नहीं बिकेंगी तो इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
यह तो तय है कि अगर प्रकृति को बचाना है और पर्यावरण की रक्षा करनी हो, तो सबसे पहला और बड़ा कदम अपनी जीवनशैली दुरुस्त करने का ही होना चाहिए। आज जिस तरह तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है और फरवरी अप्रैल जैसा दिखने लगा हो और कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन के उत्सर्जन दर में कमी न दिखती हो, वायु प्रदूषण, जल संकट व वनों के हालात अगर गम्भीर हो रहे हों,  तो कारणों को ढूंढना सबसे  महत्वपूर्ण विषय होना चाहिए। स्पष्ट है कि इन सब पर मनुष्य की जीवनशैली का दुष्प्रभाव पड़ा है। यह मात्र भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस यही दोहरा रहे हैं कि शायद हमें अब अपने विकास के बारे में दोबारा सोचना पड़ेगा, जिसका एकमात्र लक्ष्य विलासी जीवन शैली है। शुरू में हम आवश्यकताओं के लिए प्रकृति का दोहन करते थे, अगर इस  मंत्र को फिर जपें, तो शायद हमारी वापसी की सम्भावनाएं बन सकती हैं। अन्यथा 2100 के अंत तक हम सब कुछ खो देंगे। जलवायु ​​परिवर्तन एक गम्भीर चुनौती है और इससे निपटने के लिए सभी को प्रकृति की रक्षा के उपाय करने होंगे और हमें सभी विकल्प तलाशने होंगे।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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