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झारखंड में ‘चम्पई’ सरकार

झारखंड में आखिरकार झामुमो के नेतृत्व में गठबन्धन सरकार पुनः गठित हो गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा राज्य का सबसे बड़ा क्षेत्रीय दल है जिसके नेता और मुख्यमन्त्री श्री हेमन्त सोरेन को प्रवर्तन निदेशालय द्वारा विगत बुधवार की रात्रि को गिरफ्तार किये जाने के बाद राज्य में इसी पार्टी के नेता श्री चम्पई सोरेन के मुख्यमन्त्री बनने में ऐसी अड़चनें दो दिन तक आयीं जिनका उत्तर लोकतन्त्र में आसानी से ढूंढा जा सकता है क्योंकि लोकतन्त्र संविधान से चलने वाली व्यवस्था होती है। फिर भी राज्यपाल श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने आज उनके बहुमत को देखते हुए उन्हें मुख्यमन्त्री पद की शपथ दिला दी। श्री हेमन्त सोरेन ने बुधवार को गिरफ्तार होने से पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया था और अपनी जगह गठबन्धन के नेता पद पर श्री चम्पई सोरेन को सर्वसम्मति से बैठा दिया था। चम्पई सोरेन के साथ 81 सदस्यीय विधानसभा में कुल 47 विधायक और हैं। मगर झारखंड में पिछले दो दिनों में राजभवन के भीतर जो भी घटनाक्रम घटा उसकी चर्चा आज राज्यसभा में भी हुई और इस मुद्दे पर विपक्ष के नेता श्री मल्लिकार्जुन खड़गे व भाजपा नेता पीयूष गोयल के बीच वाद-विवाद भी हुआ। जिस भी राज्य में इस प्रकार की आकस्मिक घटनाएं होती हैं उसमें राज्यपाल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है और उन्हें संविधान के दायरे में रह कर अपना दायित्व निभाना पड़ता है।
राज्यपाल का पहला कर्त्तव्य यह होता है कि राज्य में निर्वाचित व लोकप्रिय और पूर्ण बहुमत की स्थायी सरकार रहे। झारखंड में श्री चम्पई के पास पूर्ण बहुमत था जिसे उन्होंने पहले दिन ही राज्यपाल को स्पष्ट रूप से बता दिया था। राज्यपाल के समक्ष किसी और दल के नेता ने नई सरकार गठित करने का दावा भी पेश नहीं किया था। ऐसे में राज्यपाल पहली ही नजर में उन्हें सरकार गठित करने की दावत दे सकते थे। क्योंकि श्री हेमन्त सोरेन के इस्तीफे के बाद राज्य में कोई सरकार नहीं थी और न ही उन्होंने श्री हेमन्त से अगली व्यवस्था होने तक अपने पद पर बने रहने का आग्रह किया था। उन्होंने राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा भी नहीं की थी। इस प्रकार झारखंड बुधवार रात्रि से शुक्रवार दोपहर तक बिना किसी संवैधानिक शासन के रहा लेकिन बहुत जल्दी राज्यपाल ने इस स्थिति में सुधार किया और श्री चम्पई की सरकार गठित करा दी हालांकि वह एेसा बुधवार की रात्रि को भी कर सकते थे जब श्री चम्पई ने उन्हें अपने समर्थक विधायकों की सूची सौंपी थी और उनसे दो दिन के भीतर ही अपना बहुमत विधानसभा में सिद्ध करने के लिए कह सकते थे। इस मामले में राज्यपालों के सामने 1994 को सर्वोच्च न्यायालय का वह बोम्मई मामला है जिसमें साफ कहा गया है कि सरकार का बहुमत विधानसभा के पटल पर ही तय होना चाहिए। राज्यपाल का बहुमत के लिए आश्वस्त होना तो जरूरी है क्योंकि सरकार का गठन पूर्ण संवैधानिक तरीके से पवित्रता के साथ होना चाहिए।
राज्यपालों के लिए केन्द्र-राज्य सम्बन्धों के बारे में गठित सरकारिया आयोग ने भी कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं। इन सिफरिशों के अनुसार राज्यपाल का दायित्व सरकार बनवाने का होता है। वह स्थायी व संविधान सम्मत सरकार बनवायेगा और राज्य को विधायकों की खरीद-फरोख्त की मंडी बनने से रोकेगा। इसमें वह अपने सद् विवेक का इस्तेमाल करेगा और परिस्थितियों का आकंलन करके वातावरण को शुद्ध व पवित्र बनाये रखने का प्रयास करेगा।
लोकतन्त्र में कोई भी सरकार पूर्णतः शुद्धता व शुचिता के सिद्धान्त पर खरी भी उतरनी चाहिए। इसी वजह से 1986 में संसद में दल-बदल विधेयक लाया गया था जो कानून बना और बाद में इसमें संशोधन करके इसे और सख्त बनाया गया। परन्तु इसका तोड़ हमने ‘विधायक इस्तीफा संस्कृति’ के रूप में देखा जिसके लिए सभी राजनीतिक दल स्वयं जिम्मेदार हैं। झारखंड एक ऐसा आदिवासी राज्य है जिसे कुदरत ने अपनी नेमतों से भरपूर अन्दाज में नवाजा है। यहां के लोगों का दिल ‘जल-जंगल और जमीन’ के लिए धड़कता है। सौभाग्य से नये मुख्यमन्त्री चम्पई सोरेन आदिवासियों के इन्हीं हकों के लिए लड़ने वाले योद्धा के रूप में जाने जाते हैं और ‘टाइगर’ के खिताब से पहचाने जाते हैं हालांकि वह बहुत सादगी पसन्द सरल इंसान हैं। चम्पई के साथ कांग्रेस के आलमगीर आलम और राष्ट्रीय जनता दल के एकमात्र विधायक सत्यानन्द भोक्ता ने भी मन्त्री पद की शपथ ली है। इससे यही दिखाने की कोशिश है कि झारखंड में इंडिया गठबन्धन की सरकार है क्योंकि राहुल गांधी की न्याय यात्रा आज ही झारखंड में प्रवेश कर गई है। राज्यपाल राधाकृष्णन ने श्री चम्पई को अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए दस दिन का लम्बा समय दिया है। इसे देखते हुए चम्पई के समर्थक विधायक हैदराबाद चले गये हैं।
लोकतन्त्र में यह परंपरा किसी भी मायने में सही नहीं ठहरायी जा सकती। पहला सवाल तो यह है कि इतना लम्बा समय दिये जाने के पीछे क्या औचित्य है ? दूसरा यह कि जब श्री चम्पई स्वयं मुख्यमन्त्री बन चुके हैं और राज्य में उनकी सरकार है तो उन्हें किस बात का डर है? इन सवालों का उत्तर हमें एक न एक दिन ढूंढ़ना ही होगा क्योंकि सवाल लोकतन्त्र का है।

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