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चम्पई सरकार की ‘चमक’

झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में गठित इंडिया गठबन्धन की चम्पई सरकार ने विधानसभा में अपना स्पष्ट व पूर्ण बहुमत 29 के मुकाबले 47 मतों से प्राप्त करके राजनैतिक अस्थिरता के माहौल का पटाक्षेप करके जो सन्देश दिया है वह वर्तमान दौर की राजनीति का ही ऐसा ‘एकांकी नाटक’ है जिसे हम पहले भी विभिन्न राज्यों में होता देखते रहे हैं। हाल ही में पड़ोसी राज्य बिहार में मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने जो पलटमार नौटंकी खेल कर राज्य की राजनीति में सत्ता व विपक्ष के पालों को जिस तरह बदला था वह स्वयं में एक अजूबा नहीं तो हैरत में डालने वाली घटना जरूर थी। मगर एेसे नाटकों से राजनीतिज्ञों की सत्ता लिप्सा ही टपकती है। झारखंड में तो जब 31 जनवरी को पूर्व मुख्यमन्त्री श्री हेमन्त सोरेन को कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगा कर गिरफ्तार किया था तो स्पष्ट था कि विधानसभा में उन्हीं की पार्टी झामुमो का कांग्रेस व अन्य सहयोगी दलों के साथ मिलकर स्पष्ट बहुमत था और नये मुख्यमन्त्री श्री चम्पई सोरेन ने अपने समर्थकों की सूची राज्यपाल सी.पी. राधाकृष्णन को सौंप दी थी परन्तु उन्हें सरकार गठित करने का न्यौता दो दिन बाद मिला। सदन में शक्ति परीक्षण की तारीख 5 फरवरी तय हुई। इस दिन श्री सोरेन ने अपना बहुमत साबित कर दिया।
प्रवर्तन निदेशालय की अदालत ने श्री हेमन्त सोरेन को इस दिन सदन में उपस्थित होकर मतदान में भाग लेने की इजाजत दी थी। चम्पई सोरेन द्वारा रखे गये विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में श्री हेमन्त सोरेन ने जो अपनी व्यथा रखी वह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने सदन के भीतर चुनौती दी कि यदि उन पर लगा जमीन हड़पने का आरोप सही सिद्ध हुआ तो वह न केवल राजनीति से संन्यास ले लेंगे बल्कि झारखंड छोड़ कर भी चले जायेंगे। उन्होंने अपनी गिरफ्तारी वाले दिन 31 जनवरी को लोकतन्त्र का काला दिन बताया और कहा कि स्वतन्त्र भारत में इससे पहले किसी मुख्यमन्त्री को आरोपों के आधार पर कभी इस तरह गिरफ्तार नहीं किया गया। उन्होंने इस मुद्दे को अपने आदिवासी होने से भी जोड़ा और विपक्षी पार्टी पर आरोप लगाया कि वह चाहती है कि आदिवासी फिर से जंगलों में ही जाकर रहने लगे और विकास की मुख्यधारा में शामिल न हों। हालांकि विपक्षी पार्टी में भी कारिया मुंडा जैसे आदिवासी नेता हो चुके हैं लेकिन झारखंड के इस प्रकरण का जो सबसे गंभीर पहलू है वह यह है कि श्री चम्पई सोरेन को अपने समर्थक विधायकों को खरीद-फरोख्त से बचाने के लिए विगत 2 फरवरी को एेसे दूसरे प्रदेश आन्ध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद भेजना पड़ा जहां इंडिया गठबन्धन के मुख्य दल कांग्रेस की सरकार है।
विधायकों को अपने खेमे में रखने के लिए उन्हें सैर-सपाटे पर ले जाने की रणनीति सबसे पहले गुजरात के नेता शंकर सिंह बघेला ने शुरू की थी जब वहां भाजपा नेता श्री केशूभाई पटेल की सरकार थी। 90 के दशक के इस ‘विधायक पर्यटन कार्यक्रम’ से तब सभी देशवासी चौंके थे। बघेला उस समय भाजपा में ही थे। केशूभाई पटेल की सरकार को एक बार गिराने में वह सफल भी हो गये थे मगर लम्बे नहीं चल सके औऱ बाद में कांग्रेस में शामिल हो गये। मगर इसके बाद यह विधायक पर्यटन संस्कृति चल निकली और हमने देखा कि किस तरह कर्नाटक से लेकर मध्य प्रदेश व राजस्थान आदि राज्यों में इसका मुजाहिरा हुआ। झारखंड के ताजा मामले में यह और भी अधिक अचम्भा पैदा करने वाली घटना थी क्योंकि 2 फरवरी को ही श्री चम्पई सोरेन ने मुख्मन्त्री पद की शपथ ले ली थी औऱ उनके साथ श्री आलमगीर आलम व सत्यानन्द भोक्ता भी मन्त्री बना दिये गये थे। राज्य में अपनी सरकार होने के बावजूद समर्थक विधायकों को उन्होंने हैदराबाद भेजकर क्या सन्देश दिया? इसका मतलब एक ही निकलता है कि वर्तमान राजनीति में विधायक किसी सामग्री या सामान की तरह हो गये हैं जिनका सौदा करना मुश्किल काम नहीं है। हैदराबाद से ये विधायक कल ही लौट आये थे और इन्हें रांची में सरकारी रेस्ट हाऊस में रखा गया था।
राजनीति पर निश्चित रूप से यह बाजारवाद का प्रभाव है और बताता है कि सियासत में धन का प्रभाव इतना बढ़ चुका है कि लोकतन्त्र ‘धनतन्त्र’ का वह स्वरूप बनता जा रहा है जिसकी चेतावनी भाजपा के ही नेता स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने 2004 के चुनावों से पहले दी थी। मगर देखिये किस तरह पनपी है पर्यटन संस्कृति कि अब बिहार के कांग्रेसी विधायक भी हैदराबाद इसलिए प्रवास पर जा रहे हैं कि 12 फरवरी को इस राज्य में भी नीतीश कुमार को अपना बहुमत साबित करना है। कांग्रेस औऱ इंडिया गठबन्धन के सदस्य यहां विपक्ष में आ चुके हैं। कांग्रेस को अपने विधायक बचाने के लिए उन्हें सुरक्षित स्थान पर भेजा जा रहा है। इसके कुल 19 विधायक हैं जबकि इसकी साथी राष्ट्रीय जनता दल के 79 विधायक हैं। राजद के विधायक कहीं नहीं जा रहे हैं तो कांग्रेस को ही अपने विधायक किसी सुरक्षित स्थान पर क्यों भेजने पड़ रहे हैं? यह प्रश्न भी आज के लोकतन्त्र की बखियां उधेड़ता सा दिखाई पड़ रहा है और कह रहा है कि राजनीति से सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता गायब होती जा रही है। जब उस पार्टी को ही यकीन नहीं है जिसके टिकट पर विधायक जीत कर विधानसभा में पहुंचे हैं तो उनके ईमान की क्या गारंटी। हालत जब यह हो गई हो तो राजनीति का क्या ईमान रहेगा?

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