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राजनीति में बदलते चुनावी मुद्दे

पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनाव निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण चुनाव हैं मगर जो लोग इन्हें लोकसभा चुनावों का ‘समीफाइनल’ मान कर चल रहे हैं वे भारत के चतुर-सुजान मतदाताओं की बुद्धि को कम करके आंकने का काम कर रहे हैं। विधानसभा और लोकसभा चुनावों के मुद्दे अलग- अलग होते हैं और इन्हें देख कर ही मतदाता वोट डालते आये हैं। यदि हम भारत की राजनीति का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि 1967 तक विधानसभा व लोकसभा के चुनाव एक साथ होने के बावजूद मतदाता विधानसभा और लोकसभा में अपनी वरीयता बदल देते थे।
1967 के चुनावों में जब देश के नौ राज्यों मे पहली बार गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ था तो केन्द्र में स्व. इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में ही कांग्रेस को उस समय 520 सदस्यीय लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिला था हालांकि बहुमत में थोड़ी कमी जरूर आयी थी। हां इतना जरूर कहा जा सकता है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में यदि केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा हार जाती है तो उसे लोकसभा चुनावों में अपने चुनावी तौर-तरीकों में आमूल-चूल परिवर्तन करने पड़ेंगे। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भाजपा की तरफ से प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी व गृहमन्त्री श्री अमित शाह जिन मुद्दों को केन्द्र में रख कर चुनाव प्रचार कर रहे हैं उनका सम्बन्ध राष्ट्रीय राजनीति से ही ज्यादा है जबकि कांग्रेस की और श्री राहुल गांधी व श्रीमती प्रियंका गांधी जिन मुद्दों के इर्द-गिर्द चुनाव प्रचार कर रहे हैं उनका सीधा सम्बन्ध राज्यों के मुद्दों से ज्यादा है।
कुछ राजनैतिक विश्लेषक भाजपा की इस रणनीति को राष्ट्रीय चुनावों के लिए जनता का ‘मूड’ मापने का नमूना भी बता रहे हैं। उनका कहना तभी सही हो सकता है जबकि लोकसभा चुनावों में भाजपा नेता अपने मुद्दों में किसी प्रकार का परिवर्तन न करें। जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो उसने विभिन्न 28 दलों के साथ मिल कर जो ‘इंडिया’ गठबन्धन बनाया है उसे उनके मुद्दे भी साथ लेकर चलने पड़ेंगे मगर असली मुकाबला श्री नरेन्द्र मोदी व राहुल गांधी की लोकप्रियता के बीच ही होगी। इसके साथ यह भी माना जा रहा है कि श्री राहुल गांधी व श्रीमती प्रियंका गांधी की लोकप्रियता में वृद्धि हुई है मगर यह आंकड़ा कहीं से नहीं आ रहा है कि श्री नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता में क्या गिरावट दर्ज हुई है। इसका मतलब है कि उनकी लोकप्रियता बरकरार है। राजनैतिक पंडित इस तथ्य को घुमा-फिरा कर पेश करना पसन्द करते हैं।
श्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में भारतीय राजनीति के मूल मानकों व अवयवों में ऊपर से लेकर नीचे तक बदलाव कर डाला था। यह बदलाव राष्ट्रवाद की राजनीति को सर्वोच्च रख कर किया गया था। राष्ट्रवाद की इस राजनीति में उन्होंने मुस्लिम तुष्टीकरण को प्रमुख विषय बना कर पेश किया था। यह विषय भाजपा की राजनीति में अभी तक प्रासंगिक बना हुआ है जबकि कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे पर विचारपूर्ण चुप्पी (स्टडीड साइलेंस) बनाये रखना चाहती है। उसका मानना है कि इस विषय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने पर भाजपा की हिन्दुत्व के सहारे सम्प्रदाय गत राजनीति को बल मिलेगा। इस मुद्दे पर भाजपा कांग्रेस को जितना ही घेरने का प्रयास करती है उतना ही अधिक अल्पसंख्यक मुसलमानों का रूझान उसकी तरफ बढ़ रहा है और हिन्दू मतदाताओं में भी उसकी पैठ कम नहीं हो रही है।
मध्य प्रदेश में हाल में ही सम्पन्न चुनावो में जिस प्रकार इस पार्टी के नेता श्री कमलनाथ ने रणनीति अपनाई वह विशुद्ध प्रादेशिक जरूरत थी क्योंकि मध्य प्रदेश की जनता अपने सांस्कृतिक व धार्मिक संस्कारों की वजह से हिन्दू संस्कृति के प्रतीकों के प्रति आजादी के बाद से ही आकर्षित रही है औऱ पूर्व में जनसंघ तक के प्रति विनम्र रही है। अतः इस राज्य में ‘श्री कमलनाथ’ ने हिन्दू संस्कृति के उन प्रतीकों को अंगीकार करने में कोई हिचक नहीं दिखाई जिन्हें समावेशी माना जाता है और हिन्दू आस्थाओं का प्रतीक माना जाता है।
वास्तव में किताबी संस्कृति व लोक संस्कृति में जमीन-आसमान का अन्तर होता है। इसका बहुत साधारण सा उदाहरण यह है कि जब कोई हिन्दू अथवा मुसलमान वन उपज लेने जाता है तो वह सबसे पहले ‘वन देवी’ की आराधना करता है इसमेें उस व्यक्ति का निजी धर्म आड़े नहीं आता। वन देवी लोक कल्पना है जिसका सम्बन्ध जंगल के भीतर लोक रक्षा से जुड़ा हुआ है। परन्तु व्यावहारिक राजनीति में इन मान्यताओं का अपना स्थान होता है। भाजपा के राष्ट्रवाद व हिन्दुत्व के मुद्दों के समकक्ष कांग्रेस की तरफ से जिस तरह से लोक कल्याण अर्थात नागरिकों के आर्थिक व सामाजिक सशक्तीकरण को चुनावी मुद्दा बनाये जाने की कोशिश हो रही है उसमें राजनीति का कलेवर बदलने की क्षमता श्री मोदी के जस वर्ष का शासन पूरा होने के साथ कुछ राजनीतिक पंडित देख रहे हैं। क्या इसका मतलब यह निकाला जा सकता है कि लोग राष्ट्रावाद की उस परिभाषा में संशोधन देखना चाहते हैं जो भाजपा ने गढ़ी है?
क्या वजह है कि भाजपा की तरफ से उठाया गया ‘एक देश एक चुनाव’ आम जनता में किसी प्रकार की हल-चल पैदा नहीं कर रहा है? इसके साथ ही एक समान आचार संहिता पर भी सामान्य लोग किसी प्रकार का हुंकारा नहीं भर रहे हैं जबकि राहुल गांधी व प्रियंका गांधी जिस नागरिक सशक्तीकरण की बात करते हुए परिमार्जित समाजवादी परिकल्पना को पेश कर रहे हैं उस पर आम जनता खुलकर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही है। यह बदलाव राजनीति के नियामक व अवयव बदलने का संकेत माना जा रहा है। एेसा नहीं है कि भाजपा इस क्षेत्र मे महारथ के साथ खेल नहीं सकती है। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब 1967 में उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी संयुक्त विधायक दल सरकार बनी थी तो उसमें जनसंघ के नेता स्व. राम प्रकाश गुप्ता उपमुख्यमन्त्री व शिक्षा मन्त्री थे (बाद में कल्याण सिंह के बाद वह वाजपेयी शासनकाल के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री भी बने) चरण सिंह सरकार डेढ़ साल भी नहीं चली और 1969 में उत्तर प्रदेश में मध्यावधि चुनाव हो गये। तब चौधरी साहब ने अपनी अलग पार्टी भारतीय क्रान्ति दल बना ली थी। इस पार्टी का गांवों में जबर्दस्त समर्थन आधार था। तब जनसंघ ने नारा दिया ‘हर हाथ को काम-हर खेत को पानी, घर-घर में दीपक जनसंघ की निशानी’।
उस समय जनसंघ का चुनाव निशान दीपक था और राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। कहने का मतलब यह है कि वक्त की नब्ज को नापते हुए जनसंघ ने अपने चुनावी मुद्दे ही बदल डाले और गांवों के अपने सीमित ही सही, वोट बैंक को सुरक्षित रखना चाहा। राहुल गांधी जिस जातिगत गणना की बात कर रहे हैं वह वर्तमान सन्दर्भ में संशोधित रूप में वही राजनीति है जो चौधरी चरण सिंह की थी। मैंने पहले भी इसी कालम में लिखा था कि भारत में जातियों की रचना के पीछे उस वर्ग के लोगों का पेशा या व्यवसाय रहा है। चाहे लुहार, सुनार, धोबी, नाई, तेली, खटीक, मल्लाह व खटीक से लेकर कोरी-कुम्हार इत्यादि तक सभी पिछड़े या दलित हैं और आर्थिक रूप से कमजोर हैं। जातिगत जन गणना में ये लोग ही गिने जायेंगे औऱ इनके साथ अहीर, जाट, गूजर व अन्य कृषि कर्मी जातियां गिनी जायेंगी।
भाजपा इन वर्गों में अपनी पैठ बनाये बिना राजनीति को अपने पक्ष करने में सफल मुश्किल से ही हो सकती है क्योंकि जिन 81 करोड़ों लोगों को मुफ्त भोजन मिलता है उनमें भी 90 प्रतिशत ये ही लोग हैं अतः भाजपा को राजनीतिक विमर्श में लोकसभा चुनाव आते-आते परिवर्तन करना पड़ेगा। यह परिवर्तन क्या वह अति पिछड़ों के बारे में गठित ‘रोहिणी आयोग’ की मार्फत करेगी, यह देखने वाली बात होगी। अतः विधानसभा चुनावों को सेमीफाइनल हम कैसे मान लें क्योंकि अंततः मुद्दों को तो बदलना ही है।

-राकेश कपूर 

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