लाहौर के प्रख्यात ‘छज्जू के चौबारे’ के बारे में नई-नई चर्चाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं। अब छज्जू भगत उर्फ छज्जू राम भाटिया के उत्तराधिकारियों के बारे में चर्चा होने लगी है। प्राप्त विवरण के अनुसार छज्जू भगत के रहस्यमय ढंग से समाधिस्थ होने के बाद इस चौबारे एवं मंदिर की देखभाल और आध्यात्मिक उत्तराधिकार उदासीन पंथ के बाबा प्रीतम दास (पाकपट्टन वाले) ने संभाला। यह वही बाबा प्रीतम दास थे जिन्हें कम्बोज-बिरादरी के महान संत बाबा भुम्मन शाह को भी दीक्षा देने का श्रेय दिया जाता है। बाबा भुम्मन शाह के श्रद्धालुओं की संख्या आज भी सिरसा, फतेहाबाद, फाजिल्का, अबोहर आदि क्षेत्रों में लाखों में है। बीच में कुछ समय के लिए मंटो की बेटियों ने इस चौबारे की देखभाल व रखरखाव का दायित्व संभाला था।
वैसे भी कहावतें बेबुनियाद नहीं होती। उनका एक अपना इतिहास होता है। यह अलग बात है कि कहावतें जब चल निकलती हैं तो इतिहास कहीं हाशिए पर सरक जाता है। ऐसी ही एक प्रचलित कहावत है, ‘जो सुख छज्जू दे चौबारे, ओह बलख़ न बुखारे।’ छज्जू, बल्ख, बुखारा, इन तीनों का अपना परिचय है। बल्ख और बुखारा दो समृद्ध शहर। दोनों अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मार्ग ‘सिल्क रूट’ के महत्वपूर्ण व समृद्ध व्यापारिक केंद्र थे। समृद्धि के साथ-साथ वहां के लोग कला, संस्कृति, साहित्य, संगीत से भी गहराइयों तक जुड़े हुए थे। आम चर्चा यही होती थी कि इन दोनों शहरों में सभी सुख हैं।
अब रहा ‘छज्जू’। मेरे एक प्रिय दोस्त हैं आत्मजीत। चर्चित नाटककार हैं। हमें एक बार एक साथ पाकिस्तान जाने का मौका मिला। बहुत सी ऐतिहासिक इमारतों व चर्चित बाज़ारों में घूमे। तब भी मन में एक जिज्ञासा थी, ‘छज्जू’ को तलाशा जाए। तब वक्त कम था। पता नहीं चल पाया। कुछ समय बाद मौका मिला तो बेहद दिलचस्प बातें खुलीं। पता चला कि ‘छज्जू’ सिर्फ कल्पित पात्र नहीं था। लाहौर के अनारकली रोड पर इसी ‘छज्जू का चौबारा’ था। छज्जू उन दिनों लाहौर का एक प्रमुख जौहरी था। पूरा नाम था लाला छज्जू राम भाटिया। दो मंजि़ले-आवास की पहली मंजि़ल पर उसका कारोबार था। दूसरी मंजि़ल पर परिवार। उसी की छत पर उसने बनाया था ‘छज्जू का चौबारा’। इस चौबारे को फकीरों के डेरे के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस चौबारे पर फकीरों की धूनी भी रमती थी और भजन-कीर्तन व सूिफयों का सेमा-नृत्य भी चलता था। छज्जू को अध्यात्म से ऐसी ‘लौ’ लगी कि धीरे-धीरे ज़्यादा वक्त जप-तप में बिताने लगा। उसने अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा फकीरों, भक्तों व ज़रूरतमंद लोगों पर खर्च करना शुरू किया। शीघ्र ही उसे ‘छज्जू-भगत’ कहा जाने लगा। लोग अक्सर कहते, इस चौबारे पर आकर रूहानी सुकून मिलता था। सभी सुख मिल जाते। भूखे को रोटी, नंगे को कपड़ा और अगले सफर पर रवाना होने से पहले खाने-पीने की रसद और कुछ सिक्के ताकि ‘बवक्ते ज़रूरत’ काम आएं।
मन में जिज्ञासा थी। उस चौबारे को ढूंढा जाए। पुराने रिकार्ड, किताबें व पुराने लोगों को खंगाला तो दिलचस्प ऐतिहासिक गवाहियां खुल गईं। लाहौर में बहुत कुछ है जो हमें विरासत से जोड़ता है। शहर के मेयो अस्पताल के साथ ही मौजूद हैं इस चौबारे के खण्डहर। छज्जू राम भाटिया उर्फ छज्जू भगत, दरअसल शाहजहां के समय में हुआ था। उसकी उम्र व जन्म वर्ष का तो पता नहीं चलता लेकिन उसने आखिरी सांस 1696 में ली थी। उसकी मृत्यु भी रहस्यमय रही थी। किंवदंती यही है कि मृत्यु के कुछ क्षण पूर्व वह चौबारे के कोने में स्थित अपनी तप-गुफा में चला गया था और बाद में उसका कोई अता पता नहीं चला। उसका ‘चौबारा’ फकीरों का डेरा बन गया। फकीर दिन में वहां ‘धमाल’ नृत्य करते और तालियों के बीच गाते, ‘जो सुख छज्जू दे चौबारे, ओह बलख न बुखारे।’
प्राप्त ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार महाराजा रणजीत सिंह अपने शासनकाल में यहां अक्सर फकीरों से मिलने आ जाया करते थे। वहां उन्होंने ‘छज्जू भगत’ की स्मृति में एक मंदिर भी बनवा दिया था और मंदिर के लिए व फकीरों के लिए हर माह एक निश्चित राशि भी ‘दरबार’ से भिजवाते रहे। अब भी उन बचे खुचे खंडहरों के सामने शीश नवाने लोग हर मंगलवार और वीरवार आ जाते हैं। लाहौर के मेयो अस्पताल के साथ ही बना है ‘शम्स शहाबुद्दीन तीमारदारी घर’। खण्डहर कायम हैं। मेयो अस्पताल वालों ने फैसला किया कि इस खंडहर को तोड़ दिया जाए ताकि अस्पताल का विस्तार हो सके। मगर लोगों के विरोध और इतिहास व मीडिया से जुड़े लोगों की कड़ी आपत्तियों के बाद तोड़ने का फैसला स्थगित कर दिया गया।
इस संबंध में एक इतिहासकार सुरेंद्र कोछड़ ने भारत सरकार से भी दखल देने की अपील की है। उसकी दलील है कि यह ‘विरासत की सम्पदा’ है और इसे कानूनी रूप में भी तोड़ा नहीं जा सकता। पुराने लाहौर में इस जगह के खंडहर भी अब बोलने लगे हैं। अब पुराने चौबारे के काल्पनिक चित्र भी बनाए जाने लगे हैं और एक मुस्लिम इतिहासकार लतीफ ने इन चित्रों को पुरानी जानकारी के आधार पर छपाया भी है।
कहा तो यह भी जाता है कि औरंगजेब के शासन में दो स्थानों को विशेष महत्व दिया जाता था। एक स्थान था ‘पीर ऐन-उल-कमाल’ का मकबरा और दूसरा ‘छज्जू भगत का मंदिर’। अब इस विलक्षण स्थान के आसपास अस्पताल के कर्मचारियों के आवास भी बन गए हैं। वहां तक पहुंचने के लिए इन क्वार्टरों के बीच संकरे रास्तों से गुज़रना होता है। मगर निस्बत रोड व रेलवे रोड के मध्य में स्थित इन खंडहरों पर अब इबादत होती रहती है। हालांकि वे दिन गए जब बात-बात पर कह दिया जाता था-
‘जो सुख छज्जू दे चौबारे
ओह, बलख न बुखारे’
एक सुखद बात है कि ‘छज्जू’ का नाम व ‘कल्चर’ बचाने के लिए पाकिस्तान का सोशल मीडिया व वहां के कुछ बुद्धिजीवी पूरी तरह सतर्क हैं और मोर्चे पर डटे हैं यह कहते हुए कि ‘यह हमारा विरसा है।’
छज्जू का चौबारा और उसके उत्तराधिकारी
Summary :
लाहौर के प्रख्यात ‘छज्जू के चौबारे’ के बारे में नई-नई चर्चाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं। अब छज्जू भगत उर्फ छज्जू राम भाटिया के उत्तराधिकारियों के बारे में चर्चा होने लगी है। प्राप्त विवरण के अनुसार छज्जू भगत के रहस्यमय ढंग से समाधिस्थ होने के बाद इस चौबारे एवं मंदिर की देखभाल और आध्यात्मिक उत्तराधिकार उदासीन पंथ के बाबा प्रीतम दास (पाकपट्टन वाले) ने संभाला। यह वही बाबा प्रीतम दास थे जिन्हें कम्बोज-बिरादरी के महान संत बाबा भुम्मन शाह को भी दीक्षा देने का श्रेय दिया जाता है। बाबा भुम्मन शाह के श्रद्धालुओं की संख्या आज भी सिरसा, फतेहाबाद,…


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