छात्र और अदालतें

Summary :

देश की अदालतों ने छात्रों के हितों और उनकी सुरक्षा करने में हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भी छात्रों के अधिकारों का हनन होता है तो अदालतें न्याय के लिए आगे आती रही हैं। समय-समय पर अदालतों ने ऐतिहासिक फैसले दिए हैं। कई बार जब सरकार की किसी नीति के चलते या पुलिस की कार्रवाई के चलते छात्रों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए जाते हैं तो न्यायपालिका ने बड़े फैसले दिए। देश की सर्वोच्च अदालत ने नोएडा के गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के द्वितीय वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी करने पर कार्यकारी मैजिस्ट्रेट को कड़ी फटकार लगाते…

देश की अदालतों ने छात्रों के हितों और उनकी सुरक्षा करने में हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भी छात्रों के अधिकारों का हनन होता है तो अदालतें न्याय के लिए आगे आती रही हैं। समय-समय पर अदालतों ने ऐतिहासिक फैसले दिए हैं। कई बार जब सरकार की किसी नीति के चलते या पुलिस की कार्रवाई के चलते छात्रों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए जाते हैं तो न्यायपालिका ने बड़े फैसले दिए। देश की सर्वोच्च अदालत ने नोएडा के गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के द्वितीय वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी करने पर कार्यकारी मैजिस्ट्रेट को कड़ी फटकार लगाते हुए सवाल उठाया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा छात्र प्रदर्शनकारियों को संरक्षण देने के फैसले के बाद ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मैजिस्ट्रेट उस छात्र को नो​िटस जारी करने की हिम्मत कैसे कर सकता है। अक्षत त्रिपाठी ने कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में भाग लिया था आैर उसकी कोई आपराधिक पृष्ठभूमि भी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही किसी भी छात्र के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का स्पष्ट आदेश दे चुका है।
सुप्रीम कोेर्ट ने यह भी ​िनर्देश दिया था कि जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों के साथ यौन उत्पीड़न, साइबर बुलिंग और सोशल मीडिया के जरिये संवेदनशील और कमजोर वर्ग के लोगों को निशाना बनाए जाने के आरोपों की जांच एक समिति करेगी। दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा आकृति चौधरी को बीते अप्रैल में नोएडा में श्रमिकों के प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार कर रासुका लगाकर महीनों जेल में रखने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला यह बताने के लिए काफी है कि पुलिस विभाग अपने दायित्वों को लेकर किस हद तक जिम्मेदार है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी को तुरन्त रिहा करने के आदेश दिए और साथ ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर जुर्माना भी लगाया। हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी को पांच लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया। मुआवजे की राशि जिला अधिकारी और हिरासत का आदेश जारी करने के लिए जिम्मेदार अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूल करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने फैसले को अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड का हिस्सा बनाने का आदेश दिया। कोर्ट ने टिप्पणी की ‘‘जब अधिकारी गैर कानूनी तरीके से या नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की परवाह किए बिना काम करते हैं तो मुआवजा देना और अधिकारियों के आचरण को रिकॉर्ड में दर्ज करना उचित है।’’ जिला अधिकारी ने आकृति चौधरी को मिसाल बनाकर मजदूरों के समर्थन में आने वाले लोगों को रोकने की कोशिश की है। अदालत ने पुलिस की कहानी को मनघढ़ंत बताते हुए कहा कि पुलिस ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर सकी जिससे यह पता चले कि आकृति ने लोगों को ​िहंसा के ​िलए उकसाया।
जम्मू-कश्मीर का मामला तो काफी चौंकाने वाला रहा। जम्मू-कश्मीर सरकार ने हाल ही में 25 पुस्तकों के प्रकाशन और प्रसार पर प्रतिबंध लगाया। प्रतिबंध का कारण यह था कि इन पुस्तकों में आतंकवादियों को शहीद और अलगाववादियों को स्वतंत्रता सेनानी बताया गया था। पुलिस ने एक स्कोलर पर सार्वजनिक सुरक्षा कानून (पीएसए) लगाकर उसे जेल में भेज दिया। उसका कसूर इतना था कि उसके पास से विवादास्पद और प्रतिबंधित किताबें बरामद हुई थीं। मामला जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट पहुंचा तो उसने फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल प्रतिबंधित पुस्तकें अपने पास रखने मात्र से किसी व्यक्ति पर पीएसए लगाने जैसी कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती। जेन-जी नई पीढ़ी का इंकलाब है। यदि यह युवा और छात्र संसद भवन के करीब जा सकते हैं या रांची में विधानसभा की दहलीज पर जाकर बैठ सकते हैं और यह पीढ़ी किसी भी सत्ता की चूलें हिला सकती है तो पुलिस प्रशासन आैर सत्ताधारियों को सतर्क हो जाना चाहिए। यह वो पीढ़ी है कि इन पर पानी की तेज बौछार करो तो यह नहाने लगती है, नाचने लगती है। पुलिस का खौफ और अश्रुगैस के गोले सब कुछ हवा हो जाते हैं। ऐसे में दमनकारी नीतियां काम नहीं कर सकतीं।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां किसी मुद्दे पर धरना-प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है। मगर इस दौरान छात्रों के खिलाफ पुलिस का जिस तरह से रवैया देखने को मिल रहा है वह विरोध के स्वरों को दबाने का ही प्रयास है। न्यायपालिका के अलग-अलग फैसलों से पुलिस की कार्यशैली और जांच करने के उसके तौर-तरीके पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो गए हैं। रासुका देश की सुरक्षा से संबंधित एक बहुत ही संवेदनशील कानून है और इसे छात्रों के भीतर डर पैदा करने का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। हैरानी की बात तो यह है कि सामान्य स्थितियों में भी पुलिस अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करती और कठोर कानून लागू कर देती है। बिना किसी सबूत के छात्रों को अपराधी बनाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी ही चाहिए।

Aditya Chopra

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