स्वरा का स्वर…

Summary :

यह सुनने में जितना संगीतमय लगता है, मामला उतना संगीतमय है नहीं। फिल्म अभिनेत्री स्वरा भास्कर कोई सुर नहीं साध रही थी। दरअसल, वह लोगों को अपनी पितृसत्तात्मक सोच में बदलाव लाने और उसे बदलते समय के अनुरूप ढालने के लिए प्रेरित कर रही थी। उनका संदेश स्पष्ट था और उनकी आवाज़ भी उतनी ही मुखर। और यह आवाज़ सुनी भी गई, खूब सुनी गई। किसी चुनिंदा समूह ने नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में लोगों ने उसे सुना। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि यहां ‘स्वर’ से कहीं अधिक ‘गूंज’ थी। कुछ वर्ष पहले लिखे गए एक पत्र से…

यह सुनने में जितना संगीतमय लगता है, मामला उतना संगीतमय है नहीं। फिल्म अभिनेत्री स्वरा भास्कर कोई सुर नहीं साध रही थी। दरअसल, वह लोगों को अपनी पितृसत्तात्मक सोच में बदलाव लाने और उसे बदलते समय के अनुरूप ढालने के लिए प्रेरित कर रही थी। उनका संदेश स्पष्ट था और उनकी आवाज़ भी उतनी ही मुखर। और यह आवाज़ सुनी भी गई, खूब सुनी गई। किसी चुनिंदा समूह ने नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में लोगों ने उसे सुना। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि यहां ‘स्वर’ से कहीं अधिक ‘गूंज’ थी।
कुछ वर्ष पहले लिखे गए एक पत्र से शुरू हुआ यह मामला आज ऐसे विवाद का रूप ले चुका है, जिसकी न तो स्वरा भास्कर ने कल्पना की थी और न ही उन्होंने इसकी मांग की थी। इसके साथ ही उन्हें जिस तरह की अभद्र और अनावश्यक ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है, उसने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। इतना ही नहीं, आक्रोशित समूहों की ओर से उन्हें धमकियां भी मिल रही हैं। इनमें राजपूत संगठनों और करणी सेना के नाम भी शामिल हैं। इन संगठनों का आरोप है कि स्वरा की टिप्पणियों से ऐतिहासिक राजपूत बलिदानों और सनातन परंपराओं का अपमान हुआ है। लेकिन पहले पूरी कहानी समझना जरूरी है फिर उसके परिणामों पर बात होगी और उसके बाद यह तय किया जा सकता है कि इसमें सही क्या है, गलत क्या; तर्क कितना है और इसकी आवश्यकता कितनी।
करीब एक दशक पहले स्वरा भास्कर ने फिल्मकार संजय लीला भंसाली को एक खुला पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने फिल्म में जौहर, यौन हिंसा और सम्मान की अवधारणा के चित्रण पर सवाल उठाए थे। उनका तर्क था कि बलात्कार के बाद भी किसी महिला को जीने का अधिकार होना चाहिए। उस समय उन्होंने फिल्म में जौहर के महिमामंडन और सम्मान से जुड़ी पारंपरिक धारणाओं को बढ़ावा दिए जाने पर आपत्ति जताई थी। रिकॉर्ड के लिए,फिल्म पद्मावत में जौहर का दृश्य कहानी के चरम बिंदु के करीब आता है। अलाउद्दीन खिलजी की सेना द्वारा राजपूतों को पराजित कर चित्तौड़ के किले में प्रवेश करने के बाद दीपिका पादुकोण द्वारा अभिनीत रानी पद्मावती किले की महिलाओं का नेतृत्व करते हुए जौहर करती दिखाई गई हैं। फिल्म में इसे बंदी बनाए जाने से बचने के लिए सामूहिक आत्मदाह के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित पद्मावत वर्ष 2018 में प्रदर्शित हुई हिंदी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म है। इसमें दीपिका पादुकोण ने रानी पद्मावती, शाहिद कपूर ने महारावल रतन सिंह और रणवीर सिंह ने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की भूमिका निभाई है। फिल्म में अदिति राव हैदरी, जिम सर्भ, रज़ा मुराद और अनुग्रह गोयंका भी प्रमुख भूमिकाओं में हैं। फिल्म की पटकथा भंसाली और प्रकाश कपाड़िया ने लिखी है और यह मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत पर आधारित है। लेकिन अब क्यों? इसकी वजह क्या थी? या फिर कोई वजह थी भी? जवाब है, हां भी और नहीं भी।
वजह बनीं वे टिप्पणियां, जो भास्कर ने नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक परिचर्चा के दौरान की। क्या उनका मकसद किसी विवाद को जन्म देना था? शायद नहीं। यह मामला जितना पुराना है, फिल्म भी उतनी ही पुरानी है। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि इस मुद्दे को जानबूझकर फिर से हवा दी गई होगी। लेकिन विवाद भड़क उठा और इतना बढ़ गया कि भास्कर को न केवल सफाई देनी पड़ी, बल्कि अपनी कही बातों को स्पष्ट भी करना पड़ा। लेकिन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में भास्कर ने वास्तव में कहा क्या था?
फिल्म के उस दृश्य पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जब उन्होंने सैकड़ों महिलाओं को जौहर करते हुए देखा, तो उनके मन में यह सवाल उठा कि बलात्कार से बची किसी महिला के लिए इसका क्या संदेश है? क्या संदेश यह है कि उसे खुद को मार लेना चाहिए? क्या उसके पास जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है? स्वरा यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने कहा कि ऐसी फिल्म देखने वाली बलात्कार पीड़ित महिलाओं को यह महसूस हो सकता है कि उन्होंने अपने सम्मान की रक्षा के लिए आत्महत्या नहीं की, इसलिए वे “कायर” हैं।
उनका सवाल था : क्या समाज को यौन हिंसा से बचे लोगों से यह कहना चाहिए कि बलात्कार के बाद उनके लिए जीने का कोई अधिकार नहीं, उन्हें केवल मर जाना चाहिए? स्वरा के तर्क का मूल आशय यही था कि बलात्कार का अर्थ जीवन का अंत नहीं है। इन टिप्पणियों को लेकर मचे भारी विवाद के बाद स्वरा ने सफाई देते हुए स्पष्ट किया कि उन्होंने रानी पद्मावती और अन्य महिलाओं को कायर नहीं कहा था। उनका व्यापक तर्क यह था कि बलात्कार पीड़िताओं को जीवन और गरिमा दोनों का अधिकार है।
अपनी टिप्पणियों को उचित संदर्भ में रखते हुए और यह कहते हुए कि उनके वक्तव्य का मूल आशय अनुवाद के दौरान खो गया, भास्कर ने कानूनी नोटिस भेजे जाने के बाद भी माफी मांगने से इनकार कर दिया। संभवतः विवाद को भड़काने वाली बात भास्कर द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द थे। उन्होंने कहा था कि जब पद्मावती का किरदार निभा रहीं पदुकोण सैकड़ों राजपूत महिलाओं को आत्मदाह की ओर ले जाती दिखाई दीं, तब उन्हें भीतर तक असहजता हुई। उन्होंने कहा कि चरम दृश्य देखते हुए, एक महिला के रूप में, उन्हें लगा कि उन्हें “सिर्फ अपने शरीर के विशेष अंग तक सीमित कर दिया गया है।”
आईआईसी में उन्होंने कथित तौर पर कहा था, “मैं यह देख रही हूं कि 800 महिलाएं जौहर कर रही हैं और मैं सोच रही थी..यार, भगवान न करे अगर मैं बलात्कार की पीड़िता होती, तो यह फिल्म मुझे क्या संदेश दे रही है? क्या हम यह कह रहे हैं कि बलात्कार के साथ ही एक महिला का जीवन समाप्त हो जाता है?” वह इससे बेहद क्षुब्ध थीं, लेकिन उनके अपने कथन के अनुसार, उन्होंने तब पत्र लिखने से पहले पांच दिन तक इंतजार किया।
सोशल मीडिया के इस दौर में प्रतिक्रियाएं न केवल तत्काल आती हैं, बल्कि कई बार बेहद तीखी और घातक भी होती हैं। एक सोशल मीडिया उपयोगकर्ता की टिप्पणी का उदाहरण ही काफी है: “अगर स्वरा खिलजी के दौर में होती, तो अलाउद्दीन खुद जौहर कर लेते।” वहीं कुछ लोगों ने जौहर की परंपरा का बचाव करते हुए कहा कि “अकल्पनीय क्रूरता के सामने जौहर तब भी और आज भी अत्यंत साहस का कृत्य है।” भास्कर द्वारा बलात्कार से बचे लोगों की तुलना आक्रमण के सामने जौहर करने वाली महिलाओं से किए जाने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आलोचकों का कहना है कि यह तुलना उचित नहीं है।
भास्कर ने जो कुछ कहा है, उसमें तर्क है और इसके लिए उनकी सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने यह कहने का साहस दिखाया और बात को बिना लाग-लपेट के सामने रखा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वह जिस उद्योग का हिस्सा हैं, अर्थात फिल्म उद्योग वहां प्रभावशाली लोगों को खुले तौर पर चुनौती देना कोई सामान्य बात नहीं है। खासकर उन चर्चित नामों को, जिनके बारे में माना जाता है कि उनके खिलाफ बोलने वालों के करियर को नुकसान पहुंचाने की क्षमता उनके पास है।
उन्होंने इन तमाम संभावनाओं को दांव पर लगाया, पत्र लिखा और बाद में महिलाओं तथा बलात्कार से बचे लोगों को लेकर अपने विचारों को सार्वजनिक मंच पर दोहराया। भास्कर की बात को उसके मूल संदर्भ में समझा जाए तो उसमें दोष निकालने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। वह एक महत्वपूर्ण और तार्किक बात कह रही थीं और आज भी कह रही हैं -महिलाओं को वस्तु की तरह देखे जाने का सिलसिला समाप्त होना चाहिए। इसी तरह बलात्कार से बचे लोगों को समाज से बहिष्कृत व्यक्ति की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। इसके विपरीत, उन्हें सहारा दिया जाना चाहिए और उनकी गरिमा बहाल करने में समाज को अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
हर स्वतंत्र विचार रखने वाली महिला और व्यापक सोच रखने वाला पुरुष भास्कर की इस बात से सहमत होगा कि किसी महिला के अस्तित्व का केंद्र उसका शरीर नहीं, बल्कि उसका मन और उसकी बौद्धिक क्षमता है। बलात्कार एक दुर्भाग्यपूर्ण और पीड़ादायक घटना है, लेकिन इसके साथ जीवन समाप्त नहीं होता और न ही होना चाहिए। यौन हिंसा के परे भी जीवन में बहुत कुछ है और भास्कर में इतनी हिम्मत थी कि उन्होंने इस बात को सार्वजनिक रूप से कहने का साहस किया, बजाय इसके कि वह मूक दर्शक बनी रहती।
वह भी कई अन्य लोगों की तरह भंसाली जैसे लोगों द्वारा प्रस्तुत की जा रही बातों को जानबूझकर नजरअंदाज कर सकती थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने उन्हें चुनौती दी, पत्र लिखा और फिर सार्वजनिक मंच से अपने रुख को दोहराया। भास्कर की बात से असहमति केवल वही लोग जता सकते हैं जो पुरातनपंथी सोच में जकड़े हुए हैं। लेकिन उनके साथ खड़े होने और खुले तौर पर उनका समर्थन करने का साहस वही दिखा पाएंगे, जो सचमुच ऐसा करने का माद्दा रखते हैं।

Team Desk