बच्चे रहें सुरक्षित

यह तथ्य हर कोई जानता है कि आज के बच्चे आने वाले कल का एक सुंदर भविष्य हैं और इन्हीं के मजबूत वर्तमान के दम पर हम एक शानदार भारत की तस्वीर देखते हैं लेकिन अहम बात यह है कि इन्हीं बच्चों की सुरक्षा हम सबकी बहुत बड़ी जिम्मेवारी बन जाती है। घर-परिवार-समाज में बच्चों को ज्यादा से ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। उनका लालन-पालन बेहतर तरीके से किया जा रहा है और माता-पिता चाहे वह गरीब, मध्यम वर्गीय या अमीर क्यों न हो, ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं देने की कोशिश में रहता है। बच्चों को शिक्षा और सुविधाओं के मामले में न केवल दिल्ली सरकार बल्कि राज्य सरकारें भी बहुत कुछ कर रही हैं। लेकिन मुश्किल उस समय आती है जब बड़ी संख्या में बच्चों के लापता होने की खबरें सोशल मीडिया पर वायरल होने लगती हैं। हकीकत यह है कि इससे आतंक फैल जाता है और माता-पिता चिंता करने लगते हैं। पिछले दिनों दिल्ली पुलिस ने बकायदा एक प्रैस कांफ्रेंस आयोजित करके लोगों को वायरल हो रही खबरों से सावधान रहने की अपील करते हुए तथ्य भी प्रस्तुत किया। पुलिस ने यह भी बताया कि घबराने की आवश्यकता नहीं है, फैक्ट चैक यही है कि चुनौतियां गंभीर हैं और अपने बच्चों पर हमें खुद नजर रखनी होगी और उनकी सुरक्षा खुद करनी होगी। सुबह, दोपहर, शाम बच्चों के स्कूली समय और उनके खेलने-कूदने के समय को लेकर एक नियम बनाकर उस पर चैक करना होगा।
हालांकि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि बच्चों के लापता केस में कहीं कोई नैटवर्क तो नहीं? यह सच है ​िक दिल्ली में लापता बच्चों की समस्या एक गंभीर और संवेदनशील सामाजिक मुद्दा है। देश की राजधानी होने के कारण दिल्ली में हर वर्ष बड़ी संख्या में बच्चों के गुम होने की घटनाएं दर्ज की जाती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली में जहां बच्चों के लापता होने के सबसे अधिक मामले सामने आते हैं। पुलिस की जिम्मेदारी बढ़ रही है और वह बहुत कुछ कर भी रही है। देखा जाए तो लापता बच्चों के मामलों के पीछे कई कारण होते हैं। इनमें मानव तस्करी, बाल श्रम, भीख मंगवाने वाले गिरोह, घरेलू हिंसा, पारिवारिक कलह, गरीबी, और सोशल मीडिया के माध्यम से फुसलाकर ले जाना शामिल है। कई मामलों में बच्चों को नौकरी, मॉडलिंग या बेहतर जीवन का झांसा देकर दिल्ली जैसे महानगरों में लाया जाता है और फिर उनका शोषण किया जाता है। कुछ बच्चे घर में डांट-फटकार या अत्यधिक दबाव के कारण स्वयं भी घर छोड़ देते हैं। इसलिए पारिवारिक वातावरण प्रेम से भरपूर होना चाहिए। बहरहाल दिल्ली पुलिस ने लापता बच्चों को खोजने के लिए कई विशेष अभियान चलाए हैं। “ऑपरेशन मुस्कान” और “ऑपरेशन मिलाप” जैसे अभियानों के माध्यम से हजारों बच्चों को खोजकर उनके परिवारों से मिलाया गया है। पुलिस द्वारा विशेष किशोर इकाइयां बनाई गई हैं जो केवल बच्चों से संबंधित मामलों पर काम करती हैं। इसके अलावा, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई गई है क्योंकि ये स्थान बच्चों के गायब होने के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं। लेकिन परिवारों को विशेषकर झुग्गी-बस्तियों में रहने वालों को बच्चों पर नजर जरूर रखनी चाहिए। सब कुछ सरकार पर तो छोड़ा नहीं जाना चाहिए। हमारी खुद की भी तो जिम्मेदारी बनती है। यद्यपि सरकार ने तकनीकी उपाय भी अपनाए हैं। “ट्रैकचाइल्ड” पोर्टल और “खोया-पाया” वेबसाइट के माध्यम से लापता और मिले हुए बच्चों की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराई जाती है। नागरिक भी इन प्लेटफॉर्म्स के जरिए सूचना दे सकते हैं। साथ ही चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098 बच्चों की सहायता के लिए 24 घंटे उपलब्ध है। दिल्ली की बात करें तो यह सच है कि आज भी चुनौतियां बनी हुई हैं। कई मामलों में बच्चों की पहचान स्थापित करना कठिन होता है, विशेषकर जब वे बहुत छोटे होते हैं या किसी अन्य राज्य से लाए गए होते हैं। परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति भी खोज प्रक्रिया को प्रभावित करती है। कुछ मामलों में शिकायत दर्ज कराने में देरी भी समस्या को गंभीर बना देती है। मेरा यह मानना है ​िक इस समस्या के समाधान के लिए समाज की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। अभिभावकों को अपने बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में जागरूक करना चाहिए। स्कूलों में भी बच्चों को सुरक्षा, आत्मरक्षा और आपातकालीन संपर्क नंबरों की जानकारी दी जानी चाहिए। सामुदायिक सतर्कता, जागरूकता अभियान और तेज कानूनी कार्रवाई से ही इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। हमें यह मानना होगा कि लापता बच्चों की समस्या केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक सरकार, पुलिस, परिवार और समाज मिलकर प्रयास नहीं करेंगे, तब तक इस गंभीर समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है। मिल-जुलकर काम करने से बच्चों की सुरक्षा रहेगी और भविष्य की इस ​िवरासत की सुरक्षा हमारा पारिवारिक, नैतिक और सामाजिक कर्त्तव्य भी है।

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