अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की वैश्विक शुल्क निर्धारण नीति को गैर संवैधानिक करार दिये जाने के बाद भारत से हुए इसके व्यापार समझौते की वैधता पर भी सवालिया निशान लगना स्वाभाविक है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि श्री ट्रम्प ने जिस कानून ‘इंटरनेशनल इकोनाॅमिक पावर्स एक्ट’ का इस्तेमाल करके दुनिया के विभिन्न देशों के बने माल पर अमेरिका में आयात होने पर शुल्क लागने का काम किया है वह उन्हें इसका अधिकार ही नहीं देता है, अतः उनका आदेश असंवैधानिक है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से दुनिया के विभिन्न देशों ने राहत की सांस ली है लेकिन श्री ट्रम्प ने अपने देश की सुरक्षा के तहत बने नियमों के तहत जिन आयातित उत्पादों पर शुल्क बढ़ाया है उन पर इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा। अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला 6-3 के बहुमत से देते हुए स्पष्ट किया कि शुल्क निर्धारण का अधिकार केवल अमेरिका की संसद (कांग्रेस ) के पास है जिसे राष्ट्रपति लांघ नहीं सकते हैं। मगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद राष्ट्रपति ने एक प्रेस कान्फ्रेस में कहा कि भारत के साथ हुए व्यापार समझौते पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
ज्ञातव्य है कि अमेरिका ने भारत के साथ अभी अन्तरिम समझौता ही किया है जिसका ब्यौरा अभी बन रहा है। अतः भारत के पास एेसा हथियार आ गया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रोशनी में इस ब्यौरे को तैयार करे और पुरानी शुल्क व्यवस्था की ओर लौटने का प्रयास करे। पुरानी व्यवस्था में अमेरिका को भेजे जाने वाले सामान पर अधिकतम तीन से चार प्रतिशत शुल्क की दरें प्रभावी थीं जबकि नये समझौते में इन्हें बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ ही समझौते में गैर शुल्कीय या नान टैरिफ शर्तें भी हैं जैसे भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल आयात करने पर भी अमेरिका ने 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने की धमकी दी थी। इसे लेकर भारत की विरोधी पार्टियां व्यापार समझौते की कटु आलोचना कर रही थीं और इसे भारत की संप्रभुता से जोड़ रही थीं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद भारत सरकार के हाथ में एेसा अस्त्र आ गया है कि वह समझौते की विभिन्न शर्तों को ढीला करा सके। अमेरिका के संविधान के अनुसार आपसी कारोबारी मुल्कों पर शुल्क निर्धारण करने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास होने की वजह से राष्ट्रपति ट्रम्प को अपनी वैश्विक शुल्क नीति को कांग्रेस के पास लेकर जाना चाहिए था मगर उन्होंने एेसा नहीं किया और अधिशासी आदेश जारी करके शुल्क नीति लागू कर दी। इससे अमेरिका की राजनीति में भूचाल आने की संभावना भी बढ़ गई है क्योंकि कांग्रेस में अमेरिका की विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी का भी अच्छा दबदबा है। अमेरिका के इतिहास में अभी तक किसी भी राष्ट्रपति ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनाॅमिक पावर एक्ट का इस्तेमाल शुल्क दर निर्धारण के लिए नहीं किया है। मगर विगत वर्ष 2 अप्रैल को श्री ट्रम्प ने यह घोषणा की कि विदेशी कारोबार व आर्थिक प्रक्रियाओं के चलते अमेरिका में आपातकाल जैसी स्थिति बन चुकी है जिसकी वजह से उन्हें अमेरिका के हितों को देखते हुए नई शुल्क नीति लागू करनी पड़ रही है। इसके बाद ट्रम्प ने विभिन्न कारोबारी देशों पर इकतरफा शुल्क लगाने का एेलान कर दिया था। इससे वर्ष 2025 के भीतर ही अमेरिका के राजकीय कोष में 142 अरब डालर की अतिरिक्त धनराशि जमा हुई थी। मगर ट्रम्प के इस कदम से पूरी दुनिया के स्थापित विश्व क्रम में तूफान आ गया था और अमेरिकी शुल्कों ने एक हथियार का रूप ले लिया था। इस 142 अरब डालर की धनराशि में भारत से वसूली गई लगभग 49 करोड़ डालर की रकम भी शामिल है।
अमेरिका ने सर्वाधिक धनराशि चीन से वसूली है। अतः सुप्रीम कोर्ट के आदेश से उन देशों को यह छूट मिल गई है कि वे नई शुल्क दरों के तहत अमेरिका को दी गई अतिरिक्त रकम की वापसी की मांग करें। हालांकि सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर चुप रहा है लेकिन जहां तक भारत का सवाल है तो फैसले से उसे फौरी लाभ तभी मिल सकता है जबकि समझौते की वैधता पर प्रश्न चिन्ह लग जाये और अमेरिका ने बढ़ी हुई शुल्क दर के हिसाब से भारत से अभी तक जो भी वसूला है उस रकम की वापसी हो। भारत अमेरिका को जो भी माल निर्यात करता है उसका लगभग 55 प्रतिशत एेसा है जिसका अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा के तत्वों से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर वहां के राष्ट्रपति को शुल्क बढ़ाने का अधिकार है, अतः एेसे माल पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शुल्क दरें पूर्व की भांति ही हो जानी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सामान में धातु व इंजीनियरिंग मशीनरी आदि की वस्तुएं आती हैं। जाहिर है कि घरेलू सामान जैसे कालीन से लेकर हीरे-जवाहरात व आभूषणों तथा कपड़ों आदि का अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता जबकि भारत 55 प्रतिशत के लगभग ऐसा ही सामान अमेरिका को निर्यात करता है। मगर राष्ट्रपति ट्रम्प अपने देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शर्मिन्दा करने वाला बता रहे हैं, इससे उनकी मानसिक स्थिति का ही पता चलता है। पूरी दुनिया जानती है अमेरिका का लोकतन्त्र समूचे विश्व में सबसे खुला व पारदर्शी व जवाबदेह लोकतन्त्र है जिसमें वहां के निर्वाचित राष्ट्रपति को उसकी संसद द्वारा बनाये गये संवैधानिक अनुदेशों पर ही चलना होता है। यहां का सुप्रीम कोर्ट संसद द्वारा बनाये गये कानूनों की परख फिर संविधान की कसौटी पर करता है। अतः राष्ट्रपति ट्रम्प को अपने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का सम्मान करते हुए भारत के साथ हुए व्यापार समझौते की खुद ही तसदीक करनी चाहिए।
ट्रम्प की इकतरफा शुल्क नीति
Summary :
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की वैश्विक शुल्क निर्धारण नीति को गैर संवैधानिक करार दिये जाने के बाद भारत से हुए इसके व्यापार समझौते की वैधता पर भी सवालिया निशान लगना स्वाभाविक है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि श्री ट्रम्प ने जिस कानून ‘इंटरनेशनल इकोनाॅमिक पावर्स एक्ट’ का इस्तेमाल करके दुनिया के विभिन्न देशों के बने माल पर अमेरिका में आयात होने पर शुल्क लागने का काम किया है वह उन्हें इसका अधिकार ही नहीं देता है, अतः उनका आदेश असंवैधानिक है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से दुनिया के विभिन्न देशों ने राहत…


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