असम में कांग्रेस-भाजपा क्या है गम?

Summary :

‘क्या अजीब सफर है ये, सिर पर कड़ी धूप है और मुट्ठियों में जकड़ रखी कुछ छांव है सरमाया लुट चुका है, मन बोझिल, तन शिथिल, फिर भी क्यों थकते नहीं पांव हैं’ असम में चुनाव सिर पर है, सो सियासी बाजीगरियों का दौर रोज-ब-रोज नई अंगड़ाइयां मार रहा है, अभी पिछले दिनों असम कांग्रेस के पूर्व सिरमौर भूपेन बोरा ने भगवा दामन थाम लिया। विश्वस्त सूत्रों के हवाले से खबर मिली है कि बोरा को भाजपा के करीब लाने में असम के एक सीनियर पत्रकार की महत्ती भूमिका रही। यह भी कहा जाता है कि भाजपा संग बोरा की…

‘क्या अजीब सफर है ये, सिर पर कड़ी धूप है और मुट्ठियों में जकड़ रखी कुछ छांव है
सरमाया लुट चुका है, मन बोझिल, तन शिथिल, फिर भी क्यों थकते नहीं पांव हैं’
असम में चुनाव सिर पर है, सो सियासी बाजीगरियों का दौर रोज-ब-रोज नई अंगड़ाइयां मार रहा है, अभी पिछले दिनों असम कांग्रेस के पूर्व सिरमौर भूपेन बोरा ने भगवा दामन थाम लिया। विश्वस्त सूत्रों के हवाले से खबर मिली है कि बोरा को भाजपा के करीब लाने में असम के एक सीनियर पत्रकार की महत्ती भूमिका रही। यह भी कहा जाता है कि भाजपा संग बोरा की ‘डील लॉक’ कराने में इस पत्रकार महोदय ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, उन्होंने अपने फोन से पहली दफे बोरा की असम के चीफ से बात कराई। कहते हैं किसी भांति बोरा व उस भाजपा सिरमौर की पूरी बातचीत पत्रकार महोदय के फोन में रिकार्ड हो गई। जिसमें भाजपा के यह बड़बोले क्षत्रप बोरा से यह पूछते हुए सुनाई देते हैं कि ‘आप अपनी पार्टी से और कितने प्रमुख लोगों को भाजपा ज्वॉइन करा सकते हैं?’ उनसे जवाब में असम के एक निवर्तमान कांग्रेसी सांसद का नाम लिया जाता है, साथ ही यह भी बताया जाता है कि प्रदेश के कम से कम 4 कांग्रेसी विधायक भाजपा में आने को तैयार हैं, फिर इन विधायकों के नाम बताए जाते हैं, दूसरी ओर से कहा जाता है- ‘अरे इनमें तो दो मुसलमान एमएलए हैं, ये हमारे किस काम के, आप जरा सांसद वाली डील फाइनल कराइए।’ अपना काम खत्म करने के बाद इस पत्रकार महोदय ने भाजपा के उसी बड़बोले क्षत्रप को फोन लगाया और कहा-’माय जॉब इज़ डन।’ दूसरी ओर एक दंभ भरी आवाज़ में जवाब आया-’ चिंता मत करो, तुम्हारा रेट तुम्हें मिल जाएगा।’ हक्का-बक्का रह गए उस सीनियर पत्रकार ने इसे अपनी तौहीन समझी और माना जाता है कि उन्होंने तैश में आकर अपने फोन की सारी रिकॉर्डिंग असम कांग्रेस के बड़े नेता गौरव गोगोई को सौंप दी और कहा- ‘कांग्रेस के बड़े नेताओं की प्रैस कांफ्रेंस में यह पूरी रिकार्डिंग आप वहां मौजूद मीडिया को सुना देना, असम में सियासी बवाल मच जाएगा।’ कहते हैं बड़े नेताओं को गोगोई ने वह रिकॉर्डिंग उन्हें सौंप दी, जब यह पूरी बातचीत सुनी तो दंग रह गए कि यहां कांग्रेस के नेता भी अपने रेट लगवा रहे हैं। सो, उन्होंने गौरव को सलाह दी कि ‘फिलहाल इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल देने में ही भलाई है अन्यथा इस रिकॉर्डिंग के बाहर आने से कांग्रेस की भी उतनी ही फजीहत होगी।’
जम्मू-कश्मीर में ‘कारा हटाओ’ अभियान उफान पर
जम्मू-कश्मीर कांग्रेस प्रमुख तारिक हामिद कारा के खिलाफ अब राज्य में बगावत ने आकार लेना शुरू कर दिया है, पिछले कोई डेढ़ वर्षों से कारा पर यही आरोप बार-बार लग रहे हैं कि वे राज्य में पार्टी को एकजुट रखने में अब तक नाकाम साबित हुए हैं। पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर के कांग्रेसी नेताओं के दिल्ली पहुंचने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा, पहले तो ये राहुल गांधी से मिलना चाहते थे, पर राहुल इन दिनों काफी व्यस्त हैं, सो जब इन नेताओं का राहुल से मिलना संभव नहीं हो पाया तो ये कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे के पास धमक पड़े, अपने ’कारा हटाओ, पार्टी बचाओ’ का उद्घोष लेकर। अब खड़गे साहब की दुविधा यह है कि वे इस मामले में ज्यादा अपनी नाक नहीं घुसाना चाहते क्योंकि वे जानते हैं कि हामिद कारा राहुल गांधी की पसंद रहे हैं और राहुल ने ही उनका चयन जम्मू-कश्मीर प्रदेश अध्यक्ष के लिए किया था, अब पार्टी की जम्मू इकाई ने भी ‘कारा हटाओ’ अभियान में कंधा से कंधा मिला लिया है, इनकी मांग तो थोड़ी और अलहदा है, ये चाहते हैं कि जम्मू के किसी हिंदू लीडर को पार्टी अध्यक्ष बनाया जाए जिससे यहां भाजपा के मजबूत हिंदू आधार में सेंध लगाई जा सके। सनद रहे कि कभी जम्मू संभाग कांग्रेस का एक मजबूत आधार हुआ करता था, आखिरी बार कांग्रेस ने कोई हिंदू प्रदेश अध्यक्ष बनाया था वह भी महज़ कुछ समय के लिए, पर यह बात भी चार दशक पुरानी हो गई है। वहीं कारा से असंतुष्ट नेताओं का एक बड़ा वर्ग जम्मू-कश्मीर के एआईसीसी प्रभारी सैयद नासिर हुसैन से भी उतने ही नाराज़ हैं क्योंकि वे पिछले काफी समय से कारा विरोध की अनदेखी करते आ रहे हैं, वे बार-बार असंतुष्ट नेताओं के समक्ष बस यही जुमला दुहराते रहते हैं कि ‘इन्हें थोड़ा वक्त और दे दो।’ कारा पर आरोप है कि वे अध्यक्ष रहते कश्मीर में एक भी उल्लेखनीय पार्टी कार्यक्रम आयोजित नहीं कर पाए हैं। यह तो कारा के विरोधी भी जानते हैं कि बगैर राहुल गांधी की सहमति के कारा को यहां से रूखसत कर पाना नामुमकिन है। पर बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन, क्योंकि नासिर हुसैन जैसे नेताओं की राहुल के आगे मुंह खोलने की हिम्मत नहीं, असंतुष्ट नेताओं को राहुल मिलने का वक्त ही नहीं देते। सो, अब ले देकर सबकी निगाहें एआईसीसी महासचिव और कश्मीरी नेता जी.ए. मीर पर टिक आई हैं, जिनकी इन दिनों हाईकमान से ज्यादा बनती नहीं, पर वे चाहे तो डंके की चोट पर राहुल के आगे अपनी बात रख सकते हैं।
भाई की फिक्र में हरसिमरत
पंजाब के आने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर शिरोमणि अकाली दल और भाजपा में चुनावी तालमेल पर सहमति बन चुकी है। अब तक यह बात भाजपा और अकाली दल दोनों समझ चुके हैं कि जब तक हिंदू वोटरों का रूझान आम आदमी पार्टी से कम नहीं होगा प्रदेश में आप की संभावनाओं को धूमिल कर पाना मुश्किल कार्य है, अगर हिंदू वोट एकजुट होकर भाजपा गठबंधन की झोली में आते हैं तो आगे की लड़ाई वहां त्रिकोणात्मक हो जाएगी। खास कर सिख व पंजाबी वोटर अकाली दल, कांग्रेस व आप में बंट सकते हैं। दलित वोटरों का स्वाभाविक रूझान इस दफे कांग्रेस की ओर पहले से दिख रहा है। अकाली-भाजपा गठबंधन की नई आधारशिला रखने का सबसे पहला क्रेडिट सुखबीर सिंह बादल को जाता है। सबसे पहले बादल भाजपा के बड़े नेता से मिलने दिल्ली पहुंचे और भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने में अपनी सहमति दिखाई।
बड़े नेताजी को इस बात के लिए तैयार करने में भी कामयाब रहे कि ’अकाली दल इस गठबंधन का सीनियर पाटर्नर रहेगा और वे यानी सुखबीर गठबंधन के सीएम फेस रहेंगे और इस चुनाव में भाजपा अपना पूरा धन, बल व तंत्र झोंक देगी।’ कहते हैं इस मुलाकात के बाद समझौते के प्रारंभिक स्वरूप पर सहमति बन गई।
सुखबीर जब लौट कर घर आए तो माना जाता है कि उनकी पत्नी हरसिमरत कौर बादल उनसे बेतरह नाराज़ थीं, क्योंकि सुखबीर ने अपने साले विक्रम मजीठिया की जमानत व रिहाई को लेकर बड़े नेता जी से कोई बात नहीं की थी। कहते हैं इसके बाद हरसिमरत कौर की तरफ से बड़े नेता से मिलने का समय मांगा गया, समय मुकर्रर हुआ और इस मुलाकात में हरसिमरत ने भाजपा नेता से अपने लिए बस एक ही फेवर मांगा कि ’गुड विल जेस्चर’ के तहत उनके भाई विक्रम मजीठिया को बेल मिल जाए ताकि भाजपा-अकाली दल में फिर से एक नए रिश्ते की शुरूआत हो सके।’ क्या यह महज़ इत्तफाक था कि इसके कुछ दिनों बाद ही मजीठिया बेल पर छूट कर जेल से बाहर आ गए।
क्या 1 मार्च को अमेरिका ईरान पर हमला बोल सकता है?
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के प्रतिकूल आया हो पर ट्रंप अपने पुराने तेवरों से टस से मस नहीं हो रहे। सूत्र बताते हैं कि ‘अगर बातचीत अब भी फेल रही तो ट्रंप एक मार्च या उसी सप्ताह में ईरान पर स्ट्राईक का ऑर्डर दे सकते हैं।’ इस बात की संभावना और भी बलवती होती जा रही है क्योंकि अमेरिका ने ईरान को पांच प्रमुख प्वाइंट्स से घेर लिया है और मिडिल ईस्ट में अमेरिकी फौजों की तैनाती अपने पूरे उफान पर है। ट्रंप ने अभी संकेत दिया है कि ’ईरान पर फिलहाल सीमित हमला होगा। जिसके केंद्र में उसके मिलिट्री बेस होंगे, अमेरिका ने अभी ईरान को समझौते पर दस्तखत करने के लिए 10 दिनों की मोहलत दी है। ईरान ने इस पर सोचने के लिए अभी चार दिनों का वक्त मांगा है। विषेशज्ञों का मानना है कि अमेरिका अपनी नेवी और एयर स्ट्राईक से ‘टारगेट’ हमला कर सकता है। अमेरिका चाहता है कि ईरान की मौजूदा लीडरशिप बेहद कमजोर हो, उसकी विदाई हो और उसकी जगह वहां लोकतंत्र की बहाली हो। वहीं एक संभावना यह भी जताई जा रही है कि वहां की मौजूदा लीडरशिप अमेरिका के आगे घुटनों पर आ जाए, अपनी पॉलिसी बदल ले और फिर सत्ता पर काबिज रहे। यह एक तरह का ‘वेनिजुएला मॉडल’ भी हो सकता है। पर विषेशज्ञ इस बात को लेकर आषंकित हैं कि इतने वर्षों बाद मध्य-पूर्व में इतने बड़े अमेरिकी जखीरे की तैनाती युद्ध की आशंका को ही बल देता है। अगर यह जंग छिड़ी तो दुनिया में 20 फीसदी गैस व तेल की सप्लाई ठप्प पड़ सकती है।
…और अंत में
हाल में ही चैन्नई में एक हाई प्रोफाइल शादी संपन्न हुई। इस शादी में बड़ी राजनीतिक हस्तियों और चमकते फिल्मी सितारों का भरपूर मंजर देखने को मिला। यह शादी थी आंध्र के पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के भतीजे साहिल रेड्डी की, जो जगन के चचेरे भाई वाईएस सुनील रेड्डी के बेटे हैं। दुल्हन भी कोई मामूली हस्ती नहीं थी, वह मुरूगप्पा समूह के मालिक की बेटी हैं। चैन्नई के लीला पैलेस में संपन्न हुए इस विवाह समारोह में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन अपने बेटे और राज्य के डिप्टी सीएम उदयानिधि स्टालिन के साथ मौजूद थे। फिर वहां फिल्म स्टार विजय की भी उपस्थिति दर्ज हुई जो शीघ्र ही अपनी नई राजनीतिक पारी की शुरूआत करने वाले हैं। विजय वहां काफी समय तक मौजूद रहे, खास कर स्टालिन की मौजूदगी में उनके वहां होने के कई सियासी निहितार्थ आंके जा सकते हैं। फिल्म स्टार सूरीया भी वहां पूरे वक्त मौजूद रहे। कुल मिला कर यह समारोह एक नए सियासी गठजोड़ की इबारत लिखने में जुटा रहा।

त्रिदीब रमण