नागरिकता और चुनाव आयोग

Summary :

देश का नागरिक कौन है और इसको साबित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए। इस बात को लेकर आम नागरिकों में चर्चा गरम है।​​ विभिन्न राज्यों में​ निर्वाचन आयोग द्वारा करवाए जा रहे मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया के चलते पूरा भ्रम फैला हुआ है और लोग यह समझ बैठे हैं कि अगर मतदाता सूचियों से उनका नाम हटा तो उनकी नागरिकता खतरे में पड़ जाएगी। इस भ्रम ने तब और व्यापक रूप धारण कर लिया जब माननीय अदालत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि आधार कार्ड, पैन कार्ड या वोटर आईडी होने से कोई…

देश का नागरिक कौन है और इसको साबित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए। इस बात को लेकर आम नागरिकों में चर्चा गरम है।​​ विभिन्न राज्यों में​ निर्वाचन आयोग द्वारा करवाए जा रहे मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया के चलते पूरा भ्रम फैला हुआ है और लोग यह समझ बैठे हैं कि अगर मतदाता सूचियों से उनका नाम हटा तो उनकी नागरिकता खतरे में पड़ जाएगी। इस भ्रम ने तब और व्यापक रूप धारण कर लिया जब माननीय अदालत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि आधार कार्ड, पैन कार्ड या वोटर आईडी होने से कोई भारतीय नागरिक नहीं बन जाता, यह दस्तावेज सिर्फ पहचान बनाने के लिए हैं। फिर पासपोर्ट को विदेश मंत्रालय ने भी केवल यात्रा दस्तावेज माना। एक लोकतांत्रिक देश की जिम्मेदारी केवल कानून बनाने से कहीं ज्यादा उसे अपने नागरिकों के भरोसे की भी रक्षा करना होता है। अगर लोगों को यही डर सताने लगे ​िक सरकार द्वारा जारी किए गए दस्तावेज जो उनके पास दशकों से हैं वह बेकार हैं तो फिर सरकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं दोनों पर भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है। पश्चिम बंगाल, बिहार में एसआईआर के अनुभव ने यह दिखाया कि छोटी से छोटी दस्तावेजी कमियों ने लाखों लोगों को प्रभावित किया। पुराने रिकार्ड में स्पैलिंग की गलतियों, तिथियों में अंतर या सरकारी दस्तावेजों के गायब होने की वजह से लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
देश में आज भी गरीब समुदाय और गांव की जनसंख्या में दशकों पुराने दस्तावेज नहीं हैं। देश की सर्वोच्च अदालत ने अब पश्चिम बंगाल एसआईआर विवाद पर सुनवाई के दौरान स्पष्ट कह दिया कि चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का कोई अधिकार नहीं है। चुनाव आयोग का अधिकार केवल वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण तक ही सीमित है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून की​ स्थति में कोई भ्रम नहीं है। मतदाता सूची में ​िकसी का नाम हटने से उसकी नागरिकता खत्म नहीं होती। नागरिकता का फैसला संबंधित मंत्रालय यानि गृह मंत्रालय का काम है। चुनाव आयोग की यह जिम्मेदारी है कि नागरिकता निर्धारण के लिए मामले संबंधित मंत्रालय को भेजें। चुनाव आयोग को यह देखना है कि मतदाता भारतीय नागरिक है या नहीं। क्योंकि चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का हक भारतीय नागरिकों को ही मिलना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति का नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर मतदाता सूची से हटाया जाता है तो उसे नागरिकता निर्धारित करने के लिए आवेदन करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने काफी हद तक नागरिकता को लेकर भ्रम दूर कर दिया है।
एक तरफ जहां सत्ता पक्ष के लोग एसआईआर को जनता के पक्ष में बता रहे हैं, वहीं विपक्ष का आरोप है कि सत्ता हथियाने के लिए सत्ता पक्ष एसआईआर करवा रही है आैर लाखों लोगों को मताधिकार से वंचित किया जा रहा है। यह भी वास्तविकता है कि देश में अवैध घुसपैठियों ने अपने पैन, राशन कार्ड आैर वोटर आईडी बनाए हुए हैं, जिनको मतदाता सूचियों से बाहर करना भी जरूरी है। हर नागरिक और उससे देश के बीच एक कानूनी रिश्ता होना आैर नागरिकता इस रिश्ते को बांधने वाली डोर का काम करती है। यही नागरिकता देश के नागरिकों को कई किस्म के अधिकार और सुविधाएं देती है। मूलभूत अधिकारों से लेकर वोट देने का अधिकार, कानूनी अ​धिकार, काम करने का अधिकार इत्या​िद। समस्या यह है कि अगर आधार, ड्राइविंग लाइसैंस, राशन कार्ड, पासपोर्ट और मतदाता पहचान पत्र भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो फिर कोई अपनी नागरिकता कैसे साबित करेगा।
भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ था। आर्टिकल 5 से 11 आज़ाद भारत के शुरूआती नागरिकों के लिए नागरिकता के बारे में बताते हैं। आर्टिकल 5 उन लोगों को नागरिक मानता है जो संविधान के शुरू होने पर भारत में रहते थे। आर्टिकल 6 और 7 उन लोगों की नागरिकता के नियम बताते हैं जो पाकिस्तान से भारत आए थे और जो बंटवारे के बाद भारत से पाकिस्तान चले गए थे। आर्टिकल 11 संसद को नागरिकता से जुड़े मामलों पर कानून बनाने का पूरा अधिकार देता है। इस संवैधानिक अधिकार के तहत, संसद ने सिटिज़नशिप एक्ट, 1955 बनाया, जो भारतीय नागरिकता को कंट्रोल करने वाला मुख्य कानून बना हुआ है। इस एक्ट के तहत, भारतीय नागरिकता पांच मुख्य तरीकों से मिल सकती है :- जन्म से, वंश से, रजिस्ट्रेशन से, देश में रहने से और इलाके में शामिल होने से। इसलिए, कानूनी तौर पर किसी व्यक्ति की नागरिकता सिर्फ इन्हीं आधारों पर तय होती है- सिर्फ़ किसी एक पहचान के दस्तावेज़ के होने या न होने से नहीं।
पिछले कई सालों में नागरिकता कानून में कई बार बदलाव किए गए हैं जिससे जन्म से नागरिकता देने वाले नियमों में बड़े बदलाव हुए हैं। 26 जनवरी, 1950 और 1 जुलाई, 1987 के बीच, भारत में पैदा हुए हर व्यक्ति को भारतीय नागरिक माना जाता था, चाहे उनके माता-पिता किसी भी देश के हों। 1 जुलाई, 1987 और 3 दिसंबर, 2004 के बीच पैदा हुए लोगों के लिए, माता-पिता में से कम से कम एक का भारतीय नागरिक होना ज़रूरी था। 3 दिसंबर, 2004 के बाद कानून और सख्त हो गया। या तो माता-पिता दोनों भारतीय नागरिक होने चाहिए, या माता-पिता में से एक भारतीय नागरिक होना चाहिए, जबकि दूसरा गैर-कानूनी प्रवासी नहीं होना चाहिए। ये बदलाव साफ तौर पर दिखाते हैं कि नागरिकता उस समय लागू कानून के हिसाब से तय होती है न कि सरकार के किसी खास डॉक्यूमेंट के होने से।
अब सवाल यह है कि अपने ही देश में नागरिकता सिद्ध करने वाला कोई एक प्रमाण पत्र नहीं है। केन्द्र सरकार को नागरिकता और पहचान से कानूनों को ज्यादा पारदर्शी बनाना चाहिए और देशभर को नेशनल सिटिजन ​रजिस्टर तैयार करना चाहिए और प्रत्येक नागरिक को विशिष्ट पहचान पत्र देना चाहिए ताकि उसके पास नागरिकता का पुख्ता प्रमाण हो।

Aditya Chopra

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