पोते सरदार तरणजीत सिंह संधू ने विरासत को आगे बढ़ाया

Summary :

हम अक्सर कहते हैं कि मूल से ब्याज प्यारा होता है लेकिन आज हमारे सामने दिल्ली के लैफ्टिनेंट गवर्नर सरदार तरणजीत सिंह संधू ने एक सुन्दर उदाहरण दिया। जब एक पोता अपने दादा के आदर्शों, त्याग और बलिदान को पूरे समाज के सामने सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करता है तब वह केवल पोता नहीं रहता, बल्कि अपनी विरासत का सच्चा संरक्षक बन जाता है। सरदार तरणजीत सिंह संधू द्वारा अपने दादा सरदार तेजा सिंह समुंदरी की शताब्दी मनाना इसी भावना का प्रतीक है। यह मुख्य समागम रकाबगंज गुरुद्वारा स्थित लक्खी शाह बंजारा हाल में आयोजित किया गया था। यह केवल पारिवारिक श्रद्धांजलि…

हम अक्सर कहते हैं कि मूल से ब्याज प्यारा होता है लेकिन आज हमारे सामने दिल्ली के लैफ्टिनेंट गवर्नर सरदार तरणजीत सिंह संधू ने एक सुन्दर उदाहरण दिया। जब एक पोता अपने दादा के आदर्शों, त्याग और बलिदान को पूरे समाज के सामने सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करता है तब वह केवल पोता नहीं रहता, बल्कि अपनी विरासत का सच्चा संरक्षक बन जाता है। सरदार तरणजीत सिंह संधू द्वारा अपने दादा सरदार तेजा सिंह समुंदरी की शताब्दी मनाना इसी भावना का प्रतीक है। यह मुख्य समागम रकाबगंज गुरुद्वारा स्थित लक्खी शाह बंजारा हाल में आयोजित किया गया था। यह केवल पारिवारिक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि इतिहास, सेवा और मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास है। आज एक पौत्र ने यह संदेश दिया है कि विरासत केवल सम्पत्ति की नहीं होती, बल्कि संस्कारों, आदर्शों और सेवा की भी होती है। मूल से ब्याज तो प्यारा होता है लेकिन जब ब्याज मूल का सम्मान बढ़ाए तभी उस रिश्ते की सच्ची सार्थकता होती है।
सरदार तेजा सिंह समुंदरी (1882-1926) सिख समाज के महान धार्मिक एवं सामाजिक सुधारक थे। वे एसजीपीसी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता, शिक्षा, सामाजिक सुधार और जनसेवा के लिए संघर्ष किया। ब्रिटिश शासन के दौरान जेल में रहते हुए 17 जुलाई, 1926 को सरदार तेजा सिंह समुंदरी जी की ऐतिहासिक शहादत हुई। सरदार तरणजीत सिंह संधू जी ने उनका श्रद्धांजलि दिवस मनाकर एक संदेश दिया है कि उनके दादा पूरे देश और सिख समाज के लिए एक प्रेरणा थे। इसलिए आज सभी को और विशेषकर युवाओं को तेजा सिंह समुंदरी के जीवन से निस्वार्थ सेवा, साहस, ईमानदारी और समाज के प्रति समर्पण की प्रेरणा लेनी चाहिए। दादा का सबसे बड़ा सम्मान फूल चढ़ाने से नहीं, ​बल्कि उनके बताए हुए मार्ग पर चलने और उनके आदर्शों को जीवित रखने से होता है। यही सच्ची श्रद्धांजलि है। सरदार तरणजीत सिंह संधू के पिता प्रो. बिशन सिंह समुंदरी प्रसिद्ध शिक्षाविद और गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति रहे। तरणजीत ​संधू आैर उनकी पत्नी रीवत संधू जिन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त है। दोनों भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ राजनयिक रहे और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया।
मैं भी इस गौरवपूर्ण समारोह में शामिल हुई। हां सभी समाज के प्रमुख व्यक्तियों, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, मुख्य न्यायाधीश न्यायामूर्ति सूर्यकांत और दिल्ली के सभी मंत्री, एमएलए, प्रदेश अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा मौजूद थे। ​दिल्ली के सभी पूर्व अभी के गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सभी लोग, पूर्व अध्यक्ष, वर्तमान अध्यक्ष, यहां तक कि हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान भी मौजूद थे। युवा नेता थे, सबको वहां देख कर गुरु के चरणों में सिर झुकाया, प्रार्थना की, सरबत दा भला होवे और साथ ही हृदय में शांति मिली कि सरदार तरणजीत सिंह संधू जी ने सबको इकट्ठा कर ​िदया। यही सबकी तरफ से सच्ची श्रद्धांजलि थी। यही नहीं इससे संधू जी ने नई पीढ़ी को गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के इतिहास से परिचित कराया। सिख संस्थाओं की लोकतांत्रिक परम्परा और सेवा की भावना को याद करवाया।
समागम में भाई सरबजीत सिंह जी (पटना साहिब वाले) तथा भाई हरजिन्दर सिंह जी (श्रीनगर वाले) ने गुरुवाणी, कीर्तन आैर शबद गायन कर संगत को अध्यात्मिक रस से सराबोर किया। मुझे शबद-कीर्तन सुनने में बहुत ही अच्छा लगता है। मैंने इन दोनों काे बड़े चाव से सुना, बड़ा आनंद आया। आयोजकों का बहुत अच्छा इंतजाम था। सिर्ख धर्म से जुड़ी संस्थाओं शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी हो या दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी हो या अन्य गुरुद्वारों की संस्थाएं या कमेटियां हों, सब ने मिलकर समुंदरी जी की विरासत को याद किया। हमारा इतिहास गवाह है कि श्री समुंदरी जैसे नेताओं के दम पर ही, उनके बलिदानों के दम पर ही न केवल सिख धर्म बल्कि पूरी मानवता और देश सुरक्षित है।

Kiran Chopra