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जलवायु सम्मेलनों से कुछ नहीं बदलने वाला

दुबई में चल रहे 28 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन कॉप-28 में लम्बे-चौड़े भाषण हो रहे हैं। जलवायु लक्ष्यों और ग्लोबल वार्मिंग कम करने के लक्ष्य प्राप्त करने का आंकलन करने पर विचार-विमर्श चल रहा है। सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष अपनी-अपनी बात रख रहे हैं। 2015 के पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देश आपस में विचार-विमर्श भी कर रहे हैं आैर समीक्षा भी कर रहे हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या इन सम्मेलनों से कोई फायदा होगा। क्या ग्लोबल वार्मिंग से मानवता पर मंडराते संकट को कम किया जाएगा। दुनिया टकटकी लगाए बैठी है कि इस सम्मेलन से धरती को बचाने के ​लिए ठोस निर्णय लिए जाएंगे। 2023 में मौसम के चरम के ​चलते तापमान वृद्धि, अल​नीनो के प्रभाव से बढ़ता समुद्री तापमान, अंटार्टिका में तेजी से बर्फ के ​​पिघलने, अतिवृष्टि, बाढ़, अनावृष्टि और बार-बार आए चक्रवातों के जो भयंकर परिणाम सामने आए हैं वह कह रहे हैं कि जलवायु के लिए कुछ ठोस निर्णय करने होंगे। यदि अभी भी फैसले नहीं लिए गए तो धरती को बचाना मुश्किल हो जाएगा। दुख की बात तो यह है पेरिस समझौते में औद्योगिक क्रांति से पूर्व की स्थिति के अनुरूप​ जिस तापमान को 2.5 सेल्सियस तक सीमित करने की बात हुई थी उस लक्ष्य को अब तक पूरा नहीं किया जा सका है।
उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट में इस महत्वपूर्ण बिंदू पर ध्यान आकृष्ट किया गया है कि दुनिया में ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) का उत्सर्जन अब भी वैश्विक तापमान में वृद्धि 2 डिग्री से नीचे रखने के लिए जरूरी मात्रा से कहीं अधिक हो रहा है।
रिपोर्ट में विशेष रूप से इस बात की चर्चा की गई है कि ‘वैश्विक तापमान में वृद्धि 2 डिग्री और 1.5 डिग्री से कम रखने के लक्ष्य तक कम से कम खर्च में पहुंचने के लिए वैश्विक स्तर पर जीएचजी के उत्सर्जन में क्रमशः 28 प्रतिशत और 42 प्रतिशत की कमी आवश्यक है।’
पेरिस समझौते में यह सहमति बनी थी कि दुनिया का प्रत्येक देश- राष्ट्र निर्धारित योगदान (एनडीसी) को उत्सर्जन में कमी के वैश्विक प्रयासों के अनुरूप आगे बढ़ाएगा परंतु इन बातों का निर्णय देशों पर छोड़ दिया गया है और इस दृष्टिकोण से पेरिस समझौता मात्र एक समझौता ही है, न कि संधि। अधिकांश मामलों में एनडीसी इस बात को उचित महत्व नहीं दे पाता है कि कौन से लक्ष्य हासिल हो सकते हैं और कौन से आवश्यक हैं।
जहां तक भारत का सवाल है कार्बन उत्सर्जन के मामले में इसमें अपेक्षा से ज्यादा तेज रफ्तार से सुधार किया और समय से पहले ही इसमें काफी कमी लाने में कामयाब रहा। दूसरी ओर यह भी सच्चाई है कि भारत जैसे कई देशों में अब भी स्वास्थ्य और कुछ अन्य क्षेत्रों में शीतलन की प्रक्रिया एक अनिवार्यता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जलवायु सम्मेलन को संबोधित करते हुए विकसित देशों की आलोचना की थी और कहा था कि विकसित देशों द्वारा किए गए कामों का खामियाजा गरीब देशों को भुगतना पड़ रहा है। विकसित देशों को चाहिए कि वह गरीब व विकासशील देशों को पर्यावरण संतुलन बनाने के लिए प्रौद्योगिकी और पर्याप्त फंड दे। प्रधानमंत्री ने चौंकाया था कि जलवायु संकट का समाधान निकालने के लिए सभी को एक साथ आना होगा और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए युद्ध स्तर पर काम करना होगा। जलवायु सम्मेलन तो अब तक बहुत हो चुके। जिसमें भाषण ज्यादा और एक्शन कम होता है। भारत की चिंता यह भी होती है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जो कायदे और कानून तय किए जाते हैं उस पर अन्य देश भले ही सहमत हों लेकिन कोई खास नियम या बिन्दू भारत के संदर्भ में कितने सही हैं और कितने गलत। कहीं इन नियमों से भारत में कोई नई समस्या तो खड़ी नहीं हो जाएगी। ​यही कारण है कि भारत ने जलवायु और स्वास्थ्य को लेकर तैयार किए गए सीओपी-28 के घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने से परहेज किया। वास्तव में कम समय में देश के स्वास्थ्य सेवा ​बुनियादी ढांचे के मद्देनजर ग्रीन हाऊस जैसों के उपयोग को सीमित करने का लक्ष्य हासिल करना भारत के लिए मुश्किल था। अगर भारत में हैल्थ सैक्टर की बुनियादी सेवाओं को देखा जाए और अगर शीतलन के लिए ग्रीन हाऊस जैसों का प्रयोग सीमित किया जाए तो इस क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए बाधा आ सकती है। यहां तक धरती को बचाने का सवाल है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी पंचामृृत रणनीति का खुलासा किया था, जिसमें उन्होंने 2070 तक शून्य सर्जन के अलावा वर्ष 2030 तक ऊर्जा क्षमता में गैर जिवाशम ईंधन की ​िहस्सेदारी को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का वायदा ​किया। जलवायु संरक्षण को लेकर भारत की प्रतिबद्धता दुनिया ने देखी है। अब धनी देशों की जिम्मेदारी है कि वह वैश्विक पर्यावरण को बचाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए। दुनिया में जो पर्यावरणीय संकट मंडरा रहा है उसके लिए विकसित देश ज्यादा जिम्मेदार हैं। उम्मीद की जाती है कि उपदेशों के अलावा कोई ठोस कार्य योजना इस सम्मेलन में बने। अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर जलवायु सम्मेलन महज सैर-सपाटा ही साबित होंगे। इसमें कुछ बदलने वाला नहीं।

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