चिंता का सबब एनसीआरबी के आंकड़े

Summary :

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम रिपोर्ट, जिसमें साल 2024 में हुए अपराधों के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रति 17 मिनट में किसी न किसी की हत्या, हर पांच मिनट में किसी न किसी का अपहरण और हर 18 मिनट में किसी न किसी से बलात्कार हो रहा है। धोखाधड़ी और आर्थिक अपराध तो हर दो मिनट में हो रहे हैं। डिजिटल क्रांति के बाद तो साइबर अपराध की बाढ़ आ गई है और इन्हें नियंत्रित करने के उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत में कुल संज्ञेय…

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम रिपोर्ट, जिसमें साल 2024 में हुए अपराधों के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रति 17 मिनट में किसी न किसी की हत्या, हर पांच मिनट में किसी न किसी का अपहरण और हर 18 मिनट में किसी न किसी से बलात्कार हो रहा है। धोखाधड़ी और आर्थिक अपराध तो हर दो मिनट में हो रहे हैं। डिजिटल क्रांति के बाद तो साइबर अपराध की बाढ़ आ गई है और इन्हें नियंत्रित करने के उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत में कुल संज्ञेय अपराधों में कमी दर्ज की गई लेकिन साइबर अपराध, आर्थिक धोखाधड़ी, ड्रग ओवरडोज मौतों और सामाजिक संकट से जुड़े मामलों में वृद्धि देखी गई। 2024 में देश में कुल 58.86 लाख संज्ञेय अपराध दर्ज किए गए। 2023 में यह संख्या 62.41 लाख थी। यानी कुल अपराधों में लगभग 6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। देश के छात्रों से जुड़ा आंकड़ा गंभीरता से सोचने को विवश करता है। देश में छात्र आत्महत्या के मामलों ने 2024 में नया चिंताजनक रिकॉर्ड बना दिया है। एनसीआरबी द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में कुल 14,488 छात्रों ने आत्महत्या की, जो 2023 के 13,892 मामलों की तुलना में 4.3 प्रतिशत अधिक है।

चिंता की बात यह है कि यह बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब देश में कुल आत्महत्या के मामलों में मामूली गिरावट दर्ज की गई। एनसीआरबी के मुताबिक, 2023 में कुल 1,71,418 आत्महत्या के मामले सामने आए थे, जबकि 2024 में यह संख्या घटकर 1,70,746 रह गई।
मनोचिकित्सकों के अनुसार परीक्षा का दबाव, कड़ी प्रतिस्पर्धा, अभिभावकों की अपेक्षाएं, करियर की चिंता और सोशल मीडिया का प्रभाव छात्रों पर भारी मानसिक दबाव बना रहे हैं। वहीं कई छात्र अवसाद, चिंता, बाइपोलर डिसऑर्डर और गहरे भावनात्मक तनाव से जूझ रहे होते हैं लेकिन समय पर उनकी पहचान नहीं हो पाती।

हमें स्कूलों और कॉलेजों में शुरुआती पहचान, बिना भेदभाव वाली काउंसलिंग और मजबूत मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणाली की तत्काल जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार, शैक्षणिक संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता को मुख्यधारा की शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। शिक्षकों और अभिभावकों को भी इस बात के लिए प्रशिक्षित और संवेदनशील बनाया जाना चाहिए कि वे छात्रों में तनाव और अवसाद के शुरुआती संकेत पहचान सकें और ऐसा माहौल बनाएं जहां छात्र बिना डर और शर्म के मदद मांग सकें।

हैरानी की बात यह भी है कि शांत समझा जाने वाला राजस्थान महिलाओं के खिलाफ अपराध में लगातार छठे साल शीर्ष पर बना हुआ है। बलात्कार के मामले में यह पहले स्थान पर, जबरन गर्भपात में दूसरे और भ्रूण हत्या में तीसरे स्थान पर है। विवाह के लिए महिलाओं के अपहरण के मामलों में भी राजस्थान चौथे नंबर पर है। इस अपराध में बिहार टॉप, यूपी दूसरे और पंजाब तीसरे स्थान पर है। बिहार ‘पकड़वा विवाह’ के लिए भी बदनाम है, जिसमें पुरुषों का अपहरण कर जबरन शादी कर दी जाती है। यदि प्रति लाख आबादी के लिहाज से हत्या की दर का विश्लेषण किया जाए तो झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य टॉप पर हैं और उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा और अपराधों के लिए अक्सर चर्चा में रहने वाला राज्य 12वें स्थान पर। इस मामले में मध्यप्रदेश छठे और राजस्थान सातवें पायदान पर खड़ा है।

2023 में साइबर अपराध के 86,420 मामले दर्ज हुए थे। 2024 में यह संख्या बढ़कर 1,01,928 हो गई। यानी लगभग 17.9 फीसदी की वृद्धि हुई। कुल साइबर अपराधों में लगभग 72.6 फीसदी मामले साइबर फ्रॉड से जुड़े थे। 2024 में मेट्रो शहरों में लगभग 35,000 साइबर अपराध मामले दर्ज हुए। 1.2 लाख से अधिक मामले जांच के लिए लंबित रहे। लगभग 75,000 मामले ट्रायल में लंबित हैं। इन आंकड़ों के आलोक में बात करें तो देश में ऑनलाइन फ्रॉड तेजी से बढ़ रहा है। डिजिटल भुगतान और फिनटेक क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियां बढ़ रही हैं। उपभोक्ता सुरक्षा तंत्र कमजोर है।

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक राजधानी दिल्ली में महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर फिर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। रिपोर्ट बताती है कि 2024 में मेट्रो शहरों में दिल्ली महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामले में शीर्ष पर रही है। 2024 में महिलाओं के खिलाफ 13,396 मामले दर्ज किए गए जो 2023 में 13,366 थे। तमिलनाडु में महिलाओं के खिलाफ अपराध घटे हैं। दिल्ली में बुजुर्गों के खिलाफ 1,267 अपराध दर्ज किए गए। दिल्ली में बुजुर्गों के खिलाफ अपराधों की दर प्रति लाख आबादी पर 110 मामले रही, जो केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे ज्यादा दरों में से एक रही। मध्य प्रदेश सबसे ऊपर रहा, जहां 2024 में 5,875 मामले दर्ज किए गए, यह संख्या 2023 के 5,738 मामलों से ज्यादा है।

दूसरी तरफ, देश में बुजुर्गों के खिलाफ अपराधों में चिंताजनक वृद्धि हुई है। 2024 में कुल 32,602 मामले दर्ज किए गए, जो 2023 के मुकाबले 16.9 फीसदी ज्यादा हैं। भारत में अपहरण और जबरन उठा ले जाने की घटनाएं पिछले एक दशक में अप्रत्याशित रूप से बढ़ी हैं। हाल ही में भोपाल में एक आईएएस एकेडमी की निदेशक के अपहरण और 1.89 करोड़ रुपए की फिरौती के मामले ने देश में सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आधिकारिक आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि वर्ष 1953 से 2024 के बीच देश में कुल 20 लाख से अधिक ऐसे मामले दर्ज किए गए।

चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इन सात दशकों के कुल मामलों का 54 फीसदी हिस्सा (11.24 लाख केस) केवल पिछले 11 वर्षों (2013-2024) में दर्ज हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, कुल अपराधों में अपहरण की हिस्सेदारी 1953-62 में 1.01 फीसदी थी, जो 2013-24 के दौरान बढ़कर 3.04 फीसदी तक पहुंच गई है। फिरौती के लिए किए जाने वाले संगठित अपहरण कुल मामलों का केवल 0.7 फीसदी ही हैं। राज्यों की तुलना करें तो उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद बिहार तीसरे स्थान पर रहा करता था, लेकिन 2024 के आंकड़ों में बिहार शीर्ष छह राज्यों में सबसे नीचे दर्ज किया गया है।

एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल अपराध घटने के बावजूद बच्चों के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। 2024 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 1,87,702 मामले दर्ज हुए। यह जो 2023 के 1,77,335 मामलों से 5.8 फीसदी ज्यादा हैं। थोड़ी सुकून वाली बात यह है कि नवीनतम आंकड़ों में 2023 की तुलना में कई तरह के संगीन अपराधों में कमी आई है। कुछ विशेषज्ञ इसकी वजह नई भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) लागू होना बता रहे हैं, जिसमें संज्ञेय अपराधों की लिस्ट से कई अपराध हटा दिए गए हैं। आत्महत्या के मामलों में मामूली कमी भी संतोषजनक है, पर विद्यार्थियों और बेरोजगारों की खुदकुशी के मामले बढ़ता रोजगार संकट, शिक्षा-करियर और भविष्य के प्रति अनिश्चितता के माहौल के विस्तार का संकेत है।

विश्लेषण से पता चलता है कि ‘स्ट्रीट क्राइम’ स्थिर हो रहे हैं, लेकिन ‘सॉफ्टवेयर क्राइम’ बेकाबू हो रहे हैं। इसका अर्थ यह भी है कि सड़क पर रिस्क लेकर छोटे-मोटे अपराध करने वाले अब इंटरनेट पर ‘कमाई’ में जुट गए हैं। जाहिर है, पुलिस व्यवस्था को अब डंडे से ज्यादा डिजिटल फॉरेंसिक और डेटा एनालिटिक्स की जरूरत है। वास्तव में, एनसीआरबी के आंकड़े समाज के उस अंधेरे पक्ष को उजागर करने वाले होते हैं, जिनकी अनदेखी के परिणाम समाज को पतन की ओर धकेलने वाले हो सकते हैं। इन आंकड़ों से इसका भी संकेत मिलता है कि शासन-प्रशासन को किन क्षेत्रों पर ध्यान देने की जरूरत है। बदलते वक्त और समाज के आचरण से अपराध का स्वरूप और प्रवृत्ति बदल रही है। इस बिंदु पर भी जिम्मेदारों का ध्यान देने की जरूरत है।

Team Desk