शाह के दांव से ममता चारों खाने चित्त !

Summary :

पिछले तीन-चार महीनों में मैं जितने भी गैरभाजपाई नेताओं से मिला, सब यह कह रहे थे कि दीदी यानी ममता बनर्जी को हराना मुश्किल है। वो साम, दाम, दंड, भेद में माहिर हैं, बंगाल की नब्ज उनके कब्जे में है। यहां तक कि कुछ भाजपा नेता भी दबे स्वर में कह रहे थे कि शायद दीदी जीत जाएंगी। मगर मेरा आंकलन था कि अमित शाह के चक्रव्यूह को तोड़ना ममता के लिए आसान नहीं होगा। पश्चिम बंगाल में रोड शो करके लौटे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी मुझसे कहा था कि भाजपा यदि 200 से ज्यादा सीटों पर…

पिछले तीन-चार महीनों में मैं जितने भी गैरभाजपाई नेताओं से मिला, सब यह कह रहे थे कि दीदी यानी ममता बनर्जी को हराना मुश्किल है। वो साम, दाम, दंड, भेद में माहिर हैं, बंगाल की नब्ज उनके कब्जे में है। यहां तक कि कुछ भाजपा नेता भी दबे स्वर में कह रहे थे कि शायद दीदी जीत जाएंगी। मगर मेरा आंकलन था कि अमित शाह के चक्रव्यूह को तोड़ना ममता के लिए आसान नहीं होगा। पश्चिम बंगाल में रोड शो करके लौटे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी मुझसे कहा था कि भाजपा यदि 200 से ज्यादा सीटों पर जीते तो आश्चर्य मत कीजिएगा।

कोलकाता और पश्चिम बंगाल के कुछ परिचितों से मेरी लगातार बातचीत हो रही थी और सबका यही कहना था कि यदि तृणमूल कांग्रेस की दबंगई पर लगाम लग गई तो फिर भाजपा को सत्ता में आने से कोई नहीं रोक सकता और अंततः वही हुआ। अमित भाई शाह ने ऐसी नकेल कसी कि तृणमूल के दबंग दड़बे से बाहर ही नहीं निकल पाए। केंद्रीय पुलिस बलों के जवान चप्पे-चप्पे पर तैनात थे ताकि कोई किसी को वोट देने से नहीं रोक सके। इस बार चुनाव आयोग ने देशभर से जांबाज अधिकारियों को चुनाव पर्यवेक्षक बना कर वहां भेजा।

चुनाव पर्यवेक्षक बन कर पश्चिम बंगाल पहुंचे यूपी के जांबाज डीआईजी अजय पाल शर्मा का वो वीडियो आपने जरूर देखा होगा कि किस तरह से वे जहांगीर नाम के एक प्रत्याशी के मोहल्ले में पहुंच कर चेतावनी दे रहे हैं कि फिर किसी को धमकाने की सूचना मिली तो खैर नहीं। जहांगीर वो शख्स है जिसके लोग मतदाताओं को धमका रहे थे कि भाजपा को वोट दिया तो टुकड़े कर देंगे। फालता विधानसभा क्षेत्र में जहांगीर का सिक्का चलता है, वह ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक का बहुत करीबी है। मगर अजय पाल शर्मा वो शख्स हैं जिनके नाम से ही अपराधी कांपते हैं। उन्हें एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहा जाता है।

भयमुक्त चुनाव को लेकर चुनाव आयोग तो सजग था ही, अमित शाह ने कार्यकर्ताओं में इतनी हिम्मत और निडरता भर दी थी कि वे दबंगों का मुकाबला करने को तैयार थे। शाह पूरे 15 दिन पश्चिम बंगाल में रहे और हर जोन में उन्होंने रात्रि प्रवास किया। रात 12 बजे के बाद तक वे बैठकें ले रहे थे। उनका लक्ष्य बहुत साफ था कि मतदान के दिन सुबह 11 बजे तक भाजपा के सारे वोट सौ फीसदी पड़ जाएं। एसआईआर में लगभग 91 लाख अवैध मतदाताओं के नाम कट जाने से ममता की कमर पहले ही टूट चुकी थी। शाह की व्यूह रचना ने उन्हें धराशायी कर दिया। ममता फाइटर हैं लेकिन इस बार शेर को सवा शेर मिल गया।

अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद अमित शाह ने 50 से ज्यादा सभाएं और रोड शो किए। उनकी कुछ घोषणाओं ने तो जनता का दिल ही जीत लिया। उन्होंने कहा कि गुंडे घर से बाहर न आएं वरना गुंडों को उल्टा लटका कर सीधा कर देंगे। उन्होंने हुंकार भरी कि बंगाल की धरती पर बाबरी मस्जिद नहीं बनने देंगे। उन्होंने घोषणा कर दी थी कि भाजपा सरकार बनते ही भारत-बांग्लादेश सीमा पर फेंसिंग के लिए 45 दिनों के भीतर जमीन दे देंगे। सीमा पर फेंसिंग के लिए ममता सरकार जमीन नहीं दे रही थी। खुली सीमा से बांग्लादेशी घुसपैठिए पश्चिम बंगाल में घुसते हैं। ममता पर आरोप है कि घुसपैठिए, उनके तंत्र की मदद से भारतीय नागरिक में परिवर्तित हो रहे हैं। बदले में वो टीएमसी को वोट देते रहे हैं।

इधर अमित शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाओं का ऐसा संयोजन किया कि सभी प्रमुख क्षेत्रों में लोग उन्हें सुन पाएं। प्रधानमंत्री ने 19 जिलों में 24 स्थानों पर सभाएं कीं, रोड शो किए, उन्होंने ढाई सौ से ज्यादा सीटों को कवर किया। चुनाव परिणाम आने के बाद प्रधानमंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि इस विजय के असली हकदार अमित भाई शाह हैं। अमित शाह ने 2014 में घोषणा की थी कि ममता बनर्जी की सरकार को पश्चिम बंगाल से उखाड़ फेंकेंगे। बारह साल जरूर लगे लेकिन उन्होंने जो ठाना था, उसे कर दिखाया। 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को केवल तीन सीटें मिली थीं। 2021 में यह संख्या बढ़कर 77 तक पहुंच गई थी. और 2026 में आंकड़ा 207 पर आ पहुंचा है, वास्तव में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपने को अमित शाह ने पूरा कर दिखाया।

हार के बाद ममता ने कहा है कि उनकी 100 सीटें भाजपा ने लूट ली हैं। राहुल गांधी कह रहे हैं कि ये वोट चोरी है, मैं कम से कम पचास सालों से तो राजनीति को बहुत करीब से देख ही रहा हूं। हारने वाले पहले भी कोई न कोई बहाना ढूंढते थे ताकि खुद की लाज बचाई जा सके मगर इस बात का विश्लेषण करते थे कि वे क्यों हारे? अब विश्लेषण नहीं होता बल्कि केवल आरोप लगाए जाते हैं। कोई समझने को तैयार नहीं है कि केवल कोसने से पहलवान कमजोर नहीं होता। पहलवान को हराना है तो खुद को बुलंद करना होगा और जरूरी दांव-पेंच भी सीखने होंगे और ध्यान रखना होगा कि राष्ट्रहित से समझौता न हो। अन्यथा वही परिणाम आएगा जो पश्चिम बंगाल में आया है। लोगों को मैंने कहते सुना है कि पश्चिम बंगाल को अमित शाह ने बचा लिया।

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी वाकई कमाल की है। एक जगह जीतती है तो ठहरती नहीं, अगली जीत क लक्ष्य लेकर आगे बढ़ जाती है। कहीं हारती है तो अगले चुनाव में विजय का नया लक्ष्य लेकर काम में लग जाती है। यह जोड़ी 24 बाय 7 काम करती है। विपक्ष के पास क्या ऐसी कोई जोड़ी है? विपक्ष को कौन समझाए कि जुबानी जमा खर्च और आरोपों की फेहरिस्त से चुनाव नहीं जीते जाते। इसके लिए रातों की नींद खराब करनी होती है। फिर फैलता है उजाला। तमिलनाडु में विजय की जीत का उजाला क्यों फैला? क्योंकि द्रविड़ राजनीति से अलग हटकर विजय ने धर्मनिरपेक्ष राजनीति का नया स्वरूप पेश किया।

जन आकांक्षाओं को पूरा करने का संकल्प लिया। भाजपा असम में तीसरी बार क्यों जीती? क्योंकि जो कहा, उसे पूरा किया। और वामपंथ का आखिरी गढ़ केरल में क्यों ढह गया? क्योंकि भारतीय वामपंथियों की तासीर रही है कि बीजिंग या मास्को में बारिश हो जाए तो हिंदुस्तान में छाता खोल लें। आशय यह है कि जनता के दिल में जगह बनानी है तो जनता की नब्ज को पहचानना होगा। मोदी और शाह जनता की नब्ज जानते हैं और दिलों की धड़कन को समझते हैं।

विजय दर्डा