कांग्रेस के नेता और अय्यर

विद्रोही स्वभाव के बावजूद, पूर्व कांग्रेस मंत्री और अब पार्टी के आलोचक बने मणिशंकर अय्यर इस मुद्दे पर अपनी मूल पार्टी कांग्रेस के साथ ही खड़े दिखाई देते हैं, वही कांग्रेस जिसने न केवल उन्हें राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाया बल्कि उन्हें महत्वपूर्ण स्थान भी दिया।
अय्यर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सबसे करीबी सहयोगियों में रहे हैं और उन्हें अक्सर उनका “दाहिना हाथ” कहा जाता था। आज वे राजनीतिक परिदृश्य में कुछ हद तक हाशिये पर हैं लेकिन दिवंगत नेता के प्रति निष्ठा और उनकी पत्नी सोनिया गांधी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते रहते हैं, भले ही उनके मन में उनके इकलौते पुत्र और कांग्रेस के संभावित उत्तराधिकारी राहुल गांधी को लेकर कई शिकायतें क्यों न हों।
पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव के बढ़ने, हालात के बिगड़ने और व्यापक संघर्ष की आशंका के बीच, कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस इज़राइल यात्रा की कड़ी आलोचना की जो अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर संयुक्त हमले से महज़ दो दिन पहले हुई थी। कांग्रेस ने इस यात्रा को “अनुचित समय पर” और “शर्मनाक” करार देते हुए कहा कि इससे “पक्षपातपूर्ण झुकाव और बिना उकसावे के आक्रामक कार्रवाई के मौन समर्थन” की छवि बनती है। अय्यर ने दोनों से आगे बढ़कर टिप्पणी की। दोनों दलों के बीच शब्दों का युद्ध शुरू होने से पहले ही अय्यर ने मोदी के इज़राइल रवाना होने से ठीक पहले उन्हें निशाने पर लिया था। उन्होंने उम्मीद जताई थी कि शायद प्रधानमंत्री अपना प्रस्तावित दौरा रद्द कर दें। अय्यर ने कहा था, “मैं एक भारतीय प्रधानमंत्री के उस व्यक्ति से मिलने जाने का विरोध करता हूं जिसे मैं नरसंहार का जिम्मेदार और दोषी ठहराया गया युद्ध अपराधी (बेंजामिन नेतन्याहू) मानता हूं।”
उस समय अय्यर की तरह दुनिया के बाकी लोग भी इस बात से अनजान थे कि प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल यात्रा के कुछ ही दिनों के भीतर वह देश ईरान पर बमबारी करेगा।
यदि भारत में इज़राइल के राजदूत रयूवेन अज़ार की बात पर विश्वास किया जाए तो सैन्य कार्रवाई का समय प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान तय नहीं हुआ था। उन्होंने मीडिया से कहा, “यह एक परिचालन अवसर था जो प्रधानमंत्री मोदी के इज़राइल से रवाना होने के बाद ही सामने आया।” उन्होंने आगे बताया, “हमले की मंजूरी सुरक्षा कैबिनेट ने प्रधानमंत्री मोदी के इज़राइल छोड़ने के दो दिन बाद दी।”
हाल ही में अय्यर उस समय सुर्खियों में आए जब उन्होंने राहुल गांधी से दूरी बनाते हुए कहा कि वे “राहुलियन नहीं, बल्कि राजीवियन” हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को “बहुत अच्छी तरह से जानने” की बात कहते हुए अय्यर ने खेद जताया कि उन्हें उनके मित्र राजीव गांधी के बेटे ने ही पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
उल्लेखनीय है कि अय्यर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेहद करीबी रहे हैं। ऐसे में राहुल गांधी से दूरी बनाते हुए दिए गए उनके बयान कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं माने जा रहे, जबकि पार्टी ने भी राहुल गांधी से जुड़े उनके बयान से खुद को अलग करने में देर नहीं लगाई।
यह सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए अच्छी खबर मानी जा रही है, जो अय्यर की टिप्पणियों को प्रधानमंत्री मोदी के कट्टर आलोचक राहुल गांधी के खिलाफ नया राजनीतिक हथियार मान रही है। राहुल गांधी अक्सर प्रधानमंत्री पर हमला करने के अवसर तलाशते रहते हैं। अय्यर ने कहा, “मैं राहुल गांधी को बिल्कुल नहीं जानता। हालांकि 13 साल पहले उन्होंने मुझसे कहा था कि वे पंचायती राज के मुद्दे पर मुझसे सहमत हैं और मैं सौ प्रतिशत सही हूं लेकिन उसके बाद उन्होंने जो किया, वह यह था कि अपनी मां से कहकर मुझे राजीव गांधी पंचायती राज संगठन के राष्ट्रीय संयोजक पद से हटा दिया। मुझसे सहमति जताने के तुरंत बाद ही उन्होंने मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया।”
अय्यर ने यह भी कहा कि वे आज तक “उस जटिल मानसिकता के काम करने के तरीके को समझने की कोशिश कर रहे हैं।”
राजीव गांधी की मृत्यु के बाद जब अय्यर पर चारों ओर से निशाना साधा जा रहा था तब सोनिया गांधी ही उनके साथ खड़ी रहीं। अय्यर ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि सोनिया गांधी ने कभी मुझ पर पूरा भरोसा किया लेकिन उन्होंने अपने पति के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए उनके मित्रों का ख्याल रखने का दायित्व अपने ऊपर लिया, मानो कंधे पर हाथ रखकर साथ देना। अगर वह न होतीं तो शायद मुझे कोई भी कैबिनेट मंत्री नहीं बनाता और न ही चार मंत्रालयों की जिम्मेदारी मिलती। यह सब उन्होंने ही किया।”
लेकिन कुछ भी हमेशा के लिए नहीं रहता और वह हाथ जिसने कभी अय्यर की रक्षा की थी, अंततः जानबूझकर हटा लिया गया। अय्यर ने कहा, “2010 में पी. चिदंबरम ने मेरे खिलाफ शिकायत की और सोनिया गांधी ने मुझसे उसी कठोरता से बात की, जैसे कोई स्कूल का प्रधानाचार्य करता है। उसके बाद से वह आशीर्वाद भरा हाथ हट गया। इसलिए मैंने ‘स्वर्ग खोने’ का अनुभव किया है, हालांकि अब भी उम्मीद करता हूं कि वह स्वर्ग फिर मिल जाएगा।”
हालांकि यह उम्मीद शायद सिर्फ एक ख्वाहिश ही हो, क्योंकि अय्यर को कई लोग, यहां तक कि सोनिया गांधी भी“अनियंत्रित बयान देने वाला” मानते हैं। बाद के वर्षों में उन्होंने अपने दिवंगत पति के इस सहयोगी को जगह देने से भी परहेज़ किया।
खुद को “समय चुनकर बोलने वाला” बताते हुए अय्यर कहते हैं कि अब उन्होंने खुलकर बोलने और सच को सच कहने का फैसला किया है।
वे यह स्वीकार करने में भी संकोच नहीं करते कि शुरुआत में उनकी राय राजीव गांधी के बारे में बहुत अच्छी नहीं थी। उदाहरण के तौर पर, 1984 के सिख-विरोधी दंगों के बाद उन्होंने तय कर लिया था कि वे राजीव गांधी के खिलाफ वोट देंगे।
हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में शामिल होने के बाद उनकी राय बदल गई। अय्यर ने कहा, “मैं यह देखकर हैरान था कि इस व्यक्ति ने एक के बाद एक उन समस्याओं को उठाया जिन्हें उनकी मां इंदिरा गांधी 18 वर्षों में भी हल नहीं कर सकीं। पहले पंजाब, फिर असम और फिर मिज़ोरम, हर मामले में उन्होंने समाधान का रास्ता निकाला। फिर भी उनमें वही कमजोरी थी जिससे नेहरू-गांधी परिवार ने नेहरू के समय से जूझा है, गलत निर्णय लेना।”
राहुल गांधी के सलाहकारों की आलोचना करते हुए भी अय्यर कई अन्य लोगों की तरह राहुल की बहन और सांसद प्रियंका गांधी के नेतृत्व में उम्मीद की किरण देखते हैं। राजनीतिक दृष्टि से वे कई मायनों में राहुल गांधी से आगे मानी जाती हैं,चाहे सार्वजनिक मंचों पर उनकी मौजूदगी हो या संसद में मोदी सरकार का सामना करने का तरीका। इसलिए जहां आलोचक राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य को कुछ धुंधला मानते हैं, वहीं उन्हें प्रियंका गांधी के नेतृत्व में पार्टी को आगे बढ़ाने और मौजूदा राजनीतिक संकट से निकालने की संभावना दिखाई देती है।
कई वर्ष पहले एक वरिष्ठ नेता ने टिप्पणी की थी कि कांग्रेस का सबसे बड़ा दुश्मन खुद कांग्रेस ही है। यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है। इसकी मुख्य वजह यह है कि पार्टी एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है, या यूं कहें कि “पुत्र प्रधानता” की प्रवृत्ति से प्रभावित है। सरल शब्दों में कहें तो सोनिया गांधी अपने बेटे को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव कदम उठाएंगी, भले ही इसके लिए प्रियंका गांधी को पीछे क्यों न करना पड़े। पिछली घटनाओं से भी यह संकेत मिलता है, क्योंकि प्रियंका गांधी ने अपने भाई के राजनीतिक पदार्पण के कई वर्षों बाद सक्रिय राजनीति और फिर संसद में प्रवेश किया। क्या इसके पीछे यह डर था कि वे उनसे आगे निकल सकती थीं? या उनसे बेहतर प्रदर्शन कर सकती थीं? क्या इससे पार्टी के भीतर निष्ठाएं बंटने का खतरा था? या यह महज एक रणनीति थी? इन सवालों के जवाब एक स्तर पर जटिल लगते हैं लेकिन दूसरे स्तर पर वे सीधे और सरल भी प्रतीत होते हैं।

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