जून 1984 की घटनाएं सिख इतिहास का एक अत्यंत पीड़ादायक अध्याय है। उस दौर में हुई त्रासदी ने हजारों परिवारों को प्रभावित किया और आज भी उससे जुड़ी भावनाएं सिख समाज के मन में जीवित हैं, लेकिन दुखद यह है कि कुछ खालिस्तान समर्थक संगठन आज भी उन घटनाओं का उपयोग युवाओं को भड़काने, समाज में नफरत फैलाने और अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। हाल ही में बब्बर खालसा इंटरनेशनल द्वारा जारी बयान ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि खालिस्तान समर्थक संगठनों का वास्तविक उद्देश्य सिखों के अधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि अलगाववाद और हिंसा की राजनीति को जीवित रखना है।
इस बयान में न केवल भारत विरोधी प्रचार किया गया, बल्कि खुले तौर पर यह दावा भी किया गया कि खालिस्तान केवल हथियारबंद संघर्ष के माध्यम से ही हासिल किया जा सकता है। यह विचार न केवल लोकतंत्र और कानून के खिलाफ है, बल्कि सिख धर्म की मूल शिक्षाओं के भी विपरीत है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बयान ने स्वयं खालिस्तान समर्थक खेमे के भीतर गहरे मतभेदों को उजागर कर दिया है। एक ओर कुछ संगठन चुनावी राजनीति, जनमत-संग्रह और राजनीतिक अभियान की बात करते हैं, जबकि दूसरी ओर ऐसे संगठन उन्हें भी अस्वीकार करते हुए हिंसक संघर्ष को ही एकमात्र रास्ता बताते हैं। यह दर्शाता है कि खालिस्तान आंदोलन कोई एकजुट विचारधारा नहीं, बल्कि परस्पर विरोधी गुटों का समूह है, जिनमें नेतृत्व और प्रभाव की होड़ लगी हुई है।
विडंबना यह है कि जो संगठन स्वयं यह तय नहीं कर पा रहे कि उनका लक्ष्य कैसे हासिल होगा, वे सिख युवाओं को भविष्य का सपना दिखा रहे हैं। कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं, कोई आर्थिक योजना नहीं, कोई प्रशासनिक ढांचा नहीं और न ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई वास्तविक समर्थन। आज दुनियाभर में बसे सिख अपनी मेहनत, ईमानदारी और सेवा-भाव के कारण सम्मान प्राप्त कर रहे हैं। कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और भारत सहित अनेक देशों में सिख समाज ने शिक्षा, व्यापार, सेना, राजनीति और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है, लेकिन जब कुछ चरमपंथी संगठन हिंसा और अलगाववाद को बढ़ावा देते हैं तो उसकी कीमत पूरी सिख कौम को अपनी छवि के रूप में चुकानी पड़ती है।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि विदेशों में बैठे कुछ तत्व पंजाब के युवाओं को भावनात्मक नारों के माध्यम से प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि स्वयं वे सुरक्षित वातावरण में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इतिहास गवाह है कि हिंसा का रास्ता केवल विनाश, खून-खराबे और सामाजिक अस्थिरता की ओर ले जाता है। इसका सबसे बड़ा नुक्सान आम सिख परिवारों को उठाना पड़ता है। सैकड़ों करोड़ का बजट, फिर भी फीस के अभाव में मर गई सिख बेटी : अमृतसर की 17 वर्षीय छात्रा अमजोत कौर की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह उन संस्थाओं के लिए भी एक कठोर प्रश्न है जो वर्षों से सिख समाज की सेवा के बड़े-बड़े दावे करती रही हैं। शिरोमणि कमेटी स्वयं को दुनिया की सबसे बड़ी सिख धार्मिक संस्था बताती है।
हर वर्ष उसके पास करोड़ों रुपये की आय आती है। सेवा, शिक्षा और समाज कल्याण के नाम पर अनेक योजनाओं का प्रचार भी किया जाता है, लेकिन यदि वास्तविकता यह है कि किसी गरीब सिख परिवार की बेटी फीस के अभाव में मानसिक तनाव का शिकार होकर अपनी जान गंवा देती है तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह विशाल बजट आखिर किसके लिए है? यह उस व्यवस्था पर सवाल है जिसके पास सैकड़ों करोड़ रुपये का बजट है, हजारों एकड़ संपत्ति है, करोड़ों श्रद्धालुओं का समर्थन है, लेकिन फिर भी जरूरतमंद सिख परिवारों तक समय पर सहायता नहीं पहुंच पाती।
गुरुद्वारों में रोज लाखों लोगों को लंगर खिलाना निस्संदेह महान सेवा है, लेकिन सेवा केवल लंगर तक सीमित नहीं हो सकती। गुरु साहिबानों ने भूखे को भोजन देने के साथ-साथ जरूरतमंद की हर प्रकार से सहायता करने की शिक्षा दी है। यदि किसी बच्चे की पढ़ाई पैसे के अभाव में रुक रही हो, यदि कोई विधवा अपने बच्चों की फीस भरने में असमर्थ हो, यदि कोई गरीब परिवार शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहा हो तो सबसे पहले धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं को उनके साथ खड़ा होना चाहिए। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि आज संस्था का ध्यान वास्तविक समाज सेवा से अधिक राजनीति, चुनावों, गुटबाजी और सत्ता संघर्ष पर दिखाई देता है।
मंचों से बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं, करोड़ों रुपये के प्रोजैक्ट घोषित किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कितने जरूरतमंद परिवारों तक सहायता पहुंचती है, यह सवाल अक्सर अनुत्तरित रह जाता है। यदि अमजोत कौर जैसी बेटियां आर्थिक मजबूरी के कारण जीवन हार रही हैं तो यह केवल एक परिवार की नहीं बल्कि पूरे संस्थागत ढांचे की विफलता है।


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