वर्ष 2015 की बात है। अपने तत्कालीन सरकारी आवास, 10 अशोक रोड, नई दिल्ली पर मैंने एक बड़ा होर्डिंग लगवाया था। उस पर महात्मा गांधी और नरेंद्र मोदी की तस्वीरें थीं तथा शीर्षक था-“साबरमती के दो संत”। कुछ लोगों ने इसकी प्रशंसा की तो कुछ ने इसकी आलोचना। मीडिया के एक वर्ग ने यह कह कर प्रश्न उठाए कि क्या नरेंद्र मोदी की तुलना महात्मा गांधी से की जा सकती है। उस समय मैंने केवल इतना कहा था कि मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति की तुलना करना नहीं, बल्कि उन विचारों और मूल्यों की ओर ध्यान आकर्षित करना है जिन्हें महात्मा गांधी ने देश के सामने रखा था और जिन्हें नरेंद्र मोदी अपने सार्वजनिक जीवन तथा शासन की नीतियों में आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
आज, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद पर लगातार 12 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं, तब पीछे मुड़कर देखने पर मुझे लगता है कि उस होर्डिंग के पीछे जो भावना थी, वह समय के साथ और अधिक स्पष्ट हुई है। स्वभाव, परिस्थितियों और युग की भिन्नताओं के बावजूद एक तथ्य निर्विवाद रूप से सामने आता है कि प्रधानमंत्री मोदी का कार्य, उनका कृतित्व और उनकी अनेक जनकल्याणकारी योजनाएं महात्मा गांधी के सपनों और आदर्शों को व्यवहार में उतारने का प्रयास करती हैं। कुछ लोग गांधीवादी इसलिए कहलाए, क्योंकि उन्होंने गांधी के सिद्धांतों को अपने निजी जीवन में अपनाया, जबकि नरेंद्र मोदी की विशेषता यह है कि उन्होंने गांधी के अनेक विचारों को शासन और जनजीवन का हिस्सा बनाने का प्रयास किया।
दूसरे शब्दों में कहें तो महात्मा गांधी को मन, वचन और कर्म से अपनाने तथा उनके विचारों को जन-आंदोलन का स्वरूप देने का जो प्रयास प्रधानमंत्री मोदी ने किया है, वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक उल्लेखनीय अध्याय है। गांधी कहा करते थे कि “स्वच्छता स्वतंत्रता से भी अधिक महत्वपूर्ण है।” दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के दशकों बाद भी स्वच्छता राष्ट्रीय प्राथमिकता नहीं बन सकी थी। वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान प्रारंभ कर इसे जन-आंदोलन का रूप दिया। देशभर में करोड़ों शौचालयों का निर्माण हुआ, खुले में शौच की समस्या में व्यापक कमी आई और स्वच्छता को लेकर सामाजिक चेतना विकसित हुई। यह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि लोगों की सहभागिता वाला राष्ट्रीय अभियान बन गया।
स्वच्छ भारत अभियान को महात्मा गांधी के स्वच्छ और स्वस्थ भारत के स्वप्न की दिशा में सबसे बड़ा कदम माना जा सकता है। गांधी जी का स्वदेशी आंदोलन केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक सीमित नहीं था। उसका मूल उद्देश्य भारत को आत्मनिर्भर बनाना और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देना था। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिया गया आत्मनिर्भर भारत का मंत्र उसी विचार का आधुनिक विस्तार है। ‘मेक इन इंडिया’, ‘वोकल फॉर लोकल’, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं, स्टार्टअप और नवाचार को बढ़ावा—ये सभी प्रयास भारत को आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में हैं। आज भारत मोबाइल निर्माण, डिजिटल भुगतान, रक्षा उत्पादन और अनेक औद्योगिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में प्रधानमंत्री आवास योजना, जल जीवन मिशन, ग्रामीण सड़क निर्माण, बिजली कनेक्शन, डिजिटल कनेक्टिविटी और ग्रामीण बैंकिंग सुविधाओं के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया। आज लाखों ग्रामीण परिवारों तक नल से जल पहुंच रहा है, गांव डिजिटल सेवाओं से जुड़ रहे हैं और आधारभूत सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यद्यपि गांधीजी के आदर्श ग्राम स्वराज की यात्रा अभी अधूरी है, लेकिन ग्रामीण विकास को राष्ट्रीय विकास के केंद्र में लाने का प्रयास निश्चित रूप से उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। गांधी जी का प्रसिद्ध “ताबीज” हमें याद दिलाता है कि किसी भी निर्णय का मूल्यांकन उस अंतिम व्यक्ति के हित को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए जो सबसे अधिक कमजोर और वंचित है।
प्रधानमंत्री मोदी की अनेक योजनाएं इसी विचार को आगे बढ़ाती दिखाई देती हैं। प्रधानमंत्री जन-धन योजना ने करोड़ों गरीबों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा। आयुष्मान भारत योजना ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के माध्यम से करोड़ों लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध कराया गया। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में चलाई गई योजनाओं का प्रभाव केवल नीतिगत घोषणाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसके ठोस परिणाम भी दिखाई दिए हैं। प्रधानमंत्री जन-धन योजना के अंतर्गत आज 58 करोड़ से अधिक नागरिक बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ चुके हैं और खातों में 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा है। उज्ज्वला योजना के माध्यम से 10 करोड़ से अधिक महिलाओं को धुएँ से मुक्ति दिलाकर स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराया गया है।
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि गांधी जी के स्वच्छता, आत्मनिर्भरता, ग्रामोदय और अंत्योदय के विचार केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्हें व्यावहारिक रूप देने का प्रयास भी हुआ है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी के 12 वर्ष केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि उन विचारों को नए युग में आगे बढ़ाने का प्रयास भी हैं जिन्हें महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत के लिए अपने सपनों में देखा था। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ते हुए यह यात्रा गांधी के आदर्शों और आधुनिक भारत की आकांक्षाओं के संगम का प्रतीक बन चुकी है।


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