विपक्षी एकता का अन्तर्विरोध

Summary :

देश के विपक्षी दलों में एकता के मुद्दे पर विचार-विमर्श उस समय चल रहा है जब प. बंगाल की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा सुश्री ममता बनर्जी अपनी पार्टी में सुलगे विद्रोह से निपटने की असफल कोशिश कर रही हैं और इसके समानान्तर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी व झारखंड मुक्ति मोर्चा ने प्रमुख राष्ट्रीय विपक्षी पार्टी कांग्रेस के विरुद्ध अपने तीव्र मतभेदों को हवा देकर कांग्रेस के नेताओं के रवैये के विरुद्ध अपना मत जगजाहिर करने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई है। इसके साथ ही दक्षिण की द्रमुक पार्टी व उत्तर की आम आदमी पार्टी ने गठबन्धन में…

देश के विपक्षी दलों में एकता के मुद्दे पर विचार-विमर्श उस समय चल रहा है जब प. बंगाल की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा सुश्री ममता बनर्जी अपनी पार्टी में सुलगे विद्रोह से निपटने की असफल कोशिश कर रही हैं और इसके समानान्तर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी व झारखंड मुक्ति मोर्चा ने प्रमुख राष्ट्रीय विपक्षी पार्टी कांग्रेस के विरुद्ध अपने तीव्र मतभेदों को हवा देकर कांग्रेस के नेताओं के रवैये के विरुद्ध अपना मत जगजाहिर करने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई है। इसके साथ ही दक्षिण की द्रमुक पार्टी व उत्तर की आम आदमी पार्टी ने गठबन्धन में शामिल न रहने की घोषणा कर दी है।

दरअसल विपक्षी दलों के 2023 में बने ‘इंडिया गठबन्धन’ की हकीकत यह है कि यह ऐसी बेमेल विचारधाराओं और मत भिन्नताओं का जमावड़ा बन कर रह गया है जिसमें हर पार्टी के अपने निजी हित सर्वोच्च रहते हैं। इसकी असली वजह विभिन्न क्षेत्रीय दलों का वह संकीर्ण नजरिया है जो उन्हें अपने राज्यों की सीमित राजनीति से बाहर निकलने ही नहीं देता है। ये सभी दल मिलकर अभी तक सत्ताधारी भाजपा के हिन्दुत्व परक राष्ट्रवाद के विमर्श के विकल्प के रूप में कोई ऐसा विमर्श प्रस्तुत करने में असफल रहे हैं जिसमें अखिल भारतीय स्तर पर एकजुट होकर एक इकाई के रूप में भाजपा का मुकाबला करने की सर्वग्राह्य क्षमता हो।

अभी हाल में जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उनमें भाजपा को मिली शानदार सफलता बताती है कि इंडिया गठबन्धन में इतनी भी कूवत नहीं है कि उसके सहयोगी दलों के नेता एक सांझा मंच पर इकट्ठा तक होकर भाजपा को ललकार सकें। इन राज्यों में प. बंगाल में जब ममता दीदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस बुरी तरह पराजित हो गई और चुनाव परिणाम आने के तुरन्त बाद जब इसके विजयी 80 विधायकों में से 60 ने खुला विद्रोह करके खुद को विधानसभा में असली विरोधी दल का दर्जा पा लिया तो ममता दी को सूझा कि अब उन्हें इंडिया गठबन्धन की शरण में जाना चाहिए जबकि विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने कांग्रेस पार्टी व मार्क्सवादी पार्टी के प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव लड़ा था।

चुनाव प्रचार में कांग्रेस के नेता श्री राहुल गांधी ने भी ममता दी पर भाजपा के साथ भीतरखाने सांठगांठ तक होने के आरोप लगाने तक में कोताही नहीं बरती थी। यही स्थिति दूसरे चुनावी राज्य केरल में भी थी जहां इंडिया गठबन्धन की सदस्य मार्क्सवादी पार्टी व कांग्रेस में जमकर युद्ध हुआ। चुनाव प्रचार के दौरान श्री राहुल गांधी ने राज्य में सत्तारूढ़ मार्क्सवादी पार्टी के मुख्यमन्त्री श्री पिनयारी विजयन को बुरी तरह घेरते हुए आरोप लगाये थे कि उनके और प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के बीच समझौता है तभी तो उनके खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों में प्रवर्तन निदेशालय ने कोई कार्रवाई नहीं की। श्री गांधी ने यहां तक आरोप लगाया कि मार्क्सवादी पार्टी व भाजपा के बीच अन्दरखाने समझौता हो चुका है।

जाहिर है कि चुनावों के दौरान इंडिया गठबन्धन के घटक दलों के नेता जब आपस में इस प्रकार के व्यक्तिगत आरोप लगा सकते हैं तो भाजपा को उनपर हमला करने की क्या जरूरत? यह अन्तर्विरोध इतना गहरा है कि इसे चुनावी राजनीति की मजबूरी कह कर दरकिनार नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें एक- दूसरे पर अविश्वास का भाव बहुत गहरा है। मार्क्सवादी पार्टी के महासचिव श्री एम. ए. बेबी ने तो कांग्रेस अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खड़गे को बैठक से पहले ही एक पत्र लिख कर साफ कर दिया कि कांग्रेस के इस प्रकार के रवैये को उनकी पार्टी स्वीकार नहीं कर सकती। उन्होंने अपने पत्र की प्रतिलि​पि गठबन्धन के हर घटक दल के नेता को भी भेजी और साफ कर दिया कि गठबन्धन का मतलब आपसी विश्वास से होता है।

इसके साथ ही झारखंड के घटक दल झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता मुख्यमन्त्री श्री हेमन्त सोरेन की शिकायत है कि कांग्रेस पार्टी ने उनके राज्य से अपना राज्यसभा प्रत्याशी घोषित करने से पहले कोई मन्त्रणा ही नहीं की और इकतरफा तरीके से श्री प्रणव झा का नाम घोषित कर दिया। राज्य से दो सदस्यों का चुनाव होना है और सत्ता में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ कांग्रेस भी शामिल है। श्री सोरेन चाहते थे कि दोनों सीटें उनकी पार्टी ही लड़े मगर कांग्रेस ने उनसे सलाह किये बिना ही प्रणव झा को प्रत्याशी बना दिया। ये ऐसे मसले हैं जिनका स्थायी हल निकले बिना इंडिया गठबन्धन की एकता व मजबूती की गारंटी नहीं दी जा सकती। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय राजनैतिक धरातल पर विचारों के क्षेत्र में शून्यता लिये रहते हैं।

इनकी कोई राष्ट्रीय विचारधारा नहीं होती और लोकसभा चुनावों में उन्हें देश की समस्याओं से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत के हितों को साधने की वैकल्पिक नीति जैसे मुद्दों से जूझना पड़ता है अतः वे कांग्रेस के साथ आकर अपना बचाव करते हैं और बदले में कांग्रेस से अपने-अपने राज्यों में अधिक से अधिक सीटें चाहते हैं। दिक्कत यह है कि कांग्रेस को मजबूरी में उनसे समझौता करना पड़ता है और राष्ट्रीय राजनीतिक फलक पर उन्हें अपनी नीतियों व विचारधारा का आवरण देना पड़ता है। इसका कारण यह है कि जमीन पर इन्हीं क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस के विरुद्ध संघर्ष करते हुए ही अपना जनाधार बनाया है। इस अर्थ में इंडिया गठबन्धन को मजबूरी का सौदा भी कहा जा सकता है परन्तु व्यावहारिक राजनीति में ऐसे सौदे नहीं चलते हैं।

हमने देखा है कि किस तरह पूर्व में भी ऐसे गठबन्धन असफल रहे हैं। क्योंकि भारत की जनता जानती है कि इतने विशाल देश में केन्द्र के स्तर पर राजनैतिक स्थायित्व का रहना भी बहुत जरूरी होता है। हालांकि 1998 से लेकर 2014 तक केन्द्र में गठबन्धन सरकारों का दौर क्रमशः स्व. अटल बिहारी वाजपेयी व डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में रहा मगर इसकी वजह सत्ता का आकर्षण ही रहा जिसके चलते लोकसभा के भीतर विभिन्न दलों ने केवल सत्ता के लिए विचारधारा को ताक पर रख कर गठबन्धन बनाये वरना क्या कभी सोचा जा सकता था कि जम्मू-कश्मीर की नेशनल कान्फ्रेंस व भाजपा एक ही सरकार में शामिल होंगी? मगर वाजपेयी शासन के दौरान यह हुआ और दक्षिण की द्रमुक पार्टी व ममता दी की तृणणूल कांग्रेस भी उनकी सरकार में शामिल रही।

इसी प्रकार डा. मनमोहन सिंह की सरकार में भी कई वैचारिक रूप से धुर विरोधी पार्टियां शामिल रहीं। अतः चुनावों से पहले गठबन्धनों व चुनावों के बाद गठबन्धनों में आधारभूत अन्तर आ जाता है। इंडिया गठबन्धन में जिस प्रकार की धुर विरोधी पार्टियां शामिल हैं उनमें आपसी हितों का टकराव चुनावों में जाते समय तो रहेगा ही अतः ये दल अगर सीट समझौता करके चुनाव लड़े तो वह अधिक व्यावहारिक होगा। यह बेशक कहा जा सकता है कि लोकतन्त्र की मजबूती के लिए मजबूत विपक्ष का होना एक शर्त होती है मगर यह शर्त तो विपक्ष को ही पूरी करनी होगी। आज की बैठक में 25 दलों में केवल 5 मुद्दों पर सहमति होने से एकीकृत विपक्ष नहीं बनता।

Aditya Chopra

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