अमेरिका-इजराइल और ईरान की जंग शुरू होने के बाद जैसे ही एलपीजी गैस की कमी की आशंका पैदा हुई थी, तब मैंने लिखा था कि ढाबों को गैस सिलेंडर मिलता रहे, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए। खासकर ट्रक ड्राइवरों के लिए तो भोजन का एकमात्र माध्यम ये ढाबे ही होते हैं। आशंका सच साबित हुई है। बहुत से ढाबे तो बंद हो चुके हैं। जो खुले हैं, वे लकड़ियां जला रहे हैं और एक बार जो खाना बना लिया, वही दिन भर परोस रहे हैं। कई जगह तो खाना मिल भी नहीं रहा है। शहरी क्षेत्रों में भी कई होटल और रेस्तरां इस तरह की समस्या से जूझ रहे हैं। कामकाजी महिलाएं परेशान हैं कि काम पर जाएं या सिलेंडर के लिए घंटों लाइन में खड़ी रहें।
सरकार कहती है कि सिलेंडर की कोई कमी बिल्कुल नहीं है, मगर सप्लाई चेन में जरूर दिक्कतें आ रही हैं। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का लगभग 60 प्रतिशत आयात होर्मुज जलडमरूमध्य से करता है। एलपीजी लदे जहाज पहले 11 दिनों में होर्मुज से भारत पहुंच जाया करते थे। इस रास्ते से ईरान की सदाशयता के कारण जहाज अभी भी आ रहे हैं लेकिन उनकी फ्रीक्वेंसी कम है और समय ज्यादा लग रहा है। दूसरे देशों से भी एलपीजी लदे जहाज आ रहे हैं, लेकिन वो रास्ते बहुत लंबे हैं। देरी से एलपीजी मिलने की समस्या के कारण सरकार ने यह तय किया कि पहले घरेलू गैस उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी जाए। व्यावसायिक एलपीजी की आपूर्ति प्राथमिकता में नहीं है। नतीजतन शहरी क्षेत्र के कई होटलों और रेस्तरां में घरेलू गैस का उपयोग होने लगा है।
इसका परिणाम यह हुआ है कि व्यावसायिक एलपीजी के साथ घरेलू एलपीजी की भी धड़ल्ले से कालाबाजारी हो रही है, लेकिन इस कालाबाजारी की चर्चा से पहले जरा इस आंकड़े पर गौर कर लीजिए। भारत में घरेलू गैस उपभोक्ताओं की संख्या करीब 33 करोड़ है। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिदिन 55 लाख घरेलू गैस सिलेंडर की मांग रहती है। अब यह बढ़कर 75 लाख सिलेंडर प्रतिदिन हो गई है, सवाल लाजमी है कि 20 लाख सिलेंडर प्रतिदिन कहां जा रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल है कि जब इतने सिलेंडर की आपूर्ति हो रही है तो फिर कालाबाजारी क्यों? क्या ये केवल पैनिक बुकिंग का नतीजा है? या फिर मरघट के चौकीदार सक्रिय हो गए हैं जो संकट के वक्त भी केवल अपने मुनाफे की बात ही सोचते हैं! आज आप बुकिंग कराएं तो सिलेंडर भले ही न मिले लेकिन कालाबाजार में दोगुनी कीमत पर आपको बड़ी सहजता से सिलेंडर मिल जाएगा।
जाहिर सी बात है कि कालाबाजारी का ये पैसा आम आदमी की जेब से लूटा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुत स्पष्ट रूप से कह चुके हैं कि भारत में पेट्रोलियम कंपनियां सौ फीसदी क्षमता के साथ काम कर रही हैं और एलपीजी की कमी को लेकर लोग आशंकित न हों लेकिन हालात ये हैं कि लोगों ने वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर रेगुलर इंडक्शन और इन्फ्रारेड इंडक्शन चूल्हे खरीदने शुरू किए तो उनकी कीमतें आसमान छूने लगीं, वहां भी मरघट के चौकीदारों ने अपना खेल दिखा दिया, जो इंडक्शन दो हजार रुपए का मिल रहा था, वह अभी चार से साढ़े चार हजार रुपए का मिल रहा है।
क्या किसी ने भी इस बात पर गौर करने की कोशिश की कि इंडक्शन की कीमतें किसने बढ़ा दीं? इस कालाबाजारी के खिलाफ क्या कोई कार्रवाई हुई? क्या कंपनियों से या फिर डीलर्स से पूछा गया कि कीमतें क्यों बढ़ाईं? बिल्कुल नहीं पूछा, क्योंकि ऐसा कोई सिस्टम हमारे यहां है ही नहीं जो ऐसी स्थिति में तत्काल कार्रवाई करें। हमारे यहां पैट्रोल और डीजल को लेकर भी हाहाकार मच चुका होता लेकिन सरकारी दक्षता के कारण हालात नहीं बिगड़े, पिछले महीने के अंतिम सप्ताह में देश के कई हिस्सों में डीजल न मिल पाने की अफवाह उड़ी। किसान के लिए डीजल अत्यावश्यक है क्योंकि बिजली हमेशा नहीं रहती तो सिंचाई पंप डीजल से ही होगी। अन्य कृषि यंत्रों के लिए भी डीजल की जरूरत पड़ती है।
स्वाभाविक रूप से ग्रामीण इलाकों में लोगों ने ड्रम भरने शुरू कर दिए, मगर जिलों के कलेक्टर सक्रिय हुए और सख्ती बरती तो हालात ठीक हुए, अब सरकार को उर्वरक की कालाबाजारी रोकने पर भी ध्यान देना होगा क्योंकि उसका भी आयात होता है। किसान को मौसम तो दगा देता ही है, मरघट के सौदागर भी नहीं छोड़ते। पेट्रोलियम कंपनियों ने कीमतें इसलिए नहीं बढ़ाईं क्योंकि सरकार ने दस रुपए का रिबेट कंपनियों को दे दिया, मगर एयरलाइंस ने इतनी सदाशयता नहीं बरती। विमानों के फ्यूल पर ड्यूटी घटाकर सरकार ने शून्य प्रतिशत कर दी इसके बावजूद विमानन कंपनियों ने हवाई किराये में अंधाधुंध इजाफा कर दिया है।
क्या सरकार ने विमानन कंपनियों से पूछा कि कीमतें क्यों बढ़ाईं? हम सब जानते हैं कि आज के दौर में विमान यात्रा कोई लग्जरी नहीं बल्कि वक्त की जरूरत है। मध्यमवर्गीय व्यक्ति भी विमान में यात्रा करता है। किराये में बेतहाशा वृद्धि का मतलब है आम आदमी की जेब पर हमला। कुल मिलाकर इस वक्त आम आदमी परेशानी की हालत में है। उसकी आर्थिक स्थिति पर लगातार हमला हो रहा है। सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती है कि वह लोगों की जिंदगी को सुगम कैसे बनाए, मगर वही सरकार सराही जाती है जो संकट के समय अपनी नाव को पूरी सुरक्षा और सतर्कता के साथ पार लगाए।
ये वाकई संकट का समय है और इससे निपटने के लिए पूरी पारदर्शिता के साथ सबको एक होना पड़ेगा, जो सच है, वो सरकार आम आदमी को बताए और आम आदमी एकजुटता के साथ सरकार के साथ खड़ा हो, तभी हम इस संकट से उबर पाएंगे और हां, मैं उन लोगों और राजनीतिक दलों की भी निंदा करता हूं जो मौके का फायदा उठा कर सिलेंडर की आंच पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने की कोशिश कर रहे हैं।


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