त्रिभाषा सूत्र पर संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत

Summary :

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने नया पाठ्यक्रम जारी कर दिया है। इसमें कई बदलाव किए गए हैं। इसमें 2026-27 के शैक्षणिक सत्र से कक्षा 6 में ‘त्रि-भाषा सूत्र’ को चरणबद्ध तरीके से लागू करने, शुरू करने की घोषणा की गई है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) और उसके त्रिभाषा फार्मूले पर तमिलनाडु और केंद्र के बीच खींचतान वैसे तो कोई नई नहीं है लेकिन तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बीच राज्य के मुख्यमंत्री स्टालिन ने इस मुद्दे को गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर हिंदी थोपने का एक ‘गुप्त’ तरीका बताकर सियासी रंग देने की कोशिश की है। वहीं केंद्रीय शिक्षा मंत्री…

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने नया पाठ्यक्रम जारी कर दिया है। इसमें कई बदलाव किए गए हैं। इसमें 2026-27 के शैक्षणिक सत्र से कक्षा 6 में ‘त्रि-भाषा सूत्र’ को चरणबद्ध तरीके से लागू करने, शुरू करने की घोषणा की गई है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) और उसके त्रिभाषा फार्मूले पर तमिलनाडु और केंद्र के बीच खींचतान वैसे तो कोई नई नहीं है लेकिन तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बीच राज्य के मुख्यमंत्री स्टालिन ने इस मुद्दे को गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर हिंदी थोपने का एक ‘गुप्त’ तरीका बताकर सियासी रंग देने की कोशिश की है। वहीं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने उनके आरोपों पर तुरंत ही पलटवार किया है और कहा कि स्टालिन की थोपने वाली यह कहानी अपनी राजनीतिक नाकामियों को छिपाने की एक थकी हुई कोशिश है।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के बीच तीखी राजनीतिक बहस ने भाषा नीति और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के कार्यान्वयन पर चल रही बहस को सुर्खियों में ला दिया। यह विवाद तीन-भाषा सूत्र के इर्द-गिर्द घूमता है, जिससे चुनाव के मौसम में भाषाई विविधता, संघवाद और शैक्षिक समानता के प्रश्न उठते हैं। दक्षिण भारत में हिंदी विरोध की शुरूआत स्वतंत्रता से पूर्व हो गई थी। वर्ष 1937 में हुए प्रांतीय चुनावों में मद्रास प्रेसिडेंसी में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला और शासन की बागडोर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के हाथ आई, जिन्होंने राज्य में हिंदी की शिक्षा को बढ़ावा देने को लेकर अपने विचार व्यक्त किये। अप्रैल 1938 में मद्रास प्रेसीडेंसी के लगभग 125 माध्यमिक स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य भाषा के तौर पर लागू कर दिया गया।

तमिलों में इस निर्णय के प्रति कड़ी प्रतिक्रिया दिखी और जल्द ही इस विरोध ने एक जन आंदोलन का रूप ले लिया। अन्नादुरई ने इस आंदोलन को अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित करने का उपकरण बना लिया। यह आंदोलन लगभग दो वर्ष तक चला। वर्ष 1939 में राजगोपालाचारी की सरकार ने त्यागपत्र दे दिया और फिर ब्रिटिश शासन ने सरकार के फैसले को वापस लेते हुए हिंदी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया। तब यह आंदोलन थम अवश्य गया, मगर यहां से राज्य में हिंदी विरोधी राजनीति का जो बीजारोपण हुआ, जो आगे फलता-फूलता ही गया। हिंदी भाषा की बाध्यता के विरुद्ध कई दशक पूर्व हुए शक्तिशाली आन्दोलन के बाद तमिलनाडु में द्विभाषा नीति को अपनाया गया था।

वर्ष 2019 में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा पेश किया गया था तब भी दक्षिण भारतीय राज्यों ने स्कूलों में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाने के प्रस्ताव को वापस लेने के लिये केंद्र सरकार पर दबाव बनाया था। वर्ष 1967 में इस हिंदी विरोधी आंदोलन पर चढ़कर एक राजनीतिक दल द्रविड़ मुनेत्र कड़गम तमिलनाडु की सत्ता हासिल करने में कामयाब हो गई। इसी के साथ हिंदी विरोध दक्षिण, खासकर तमिलनाडु की राजनीति का एक आवश्यक उपकरण बन गया जो आज भी यथावत कायम है। तमिलनाडु ही नहीं, अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों जैसे केरल और आंध्र प्रदेश ने भी हिंदी को अनिवार्य किए जाने का विरोध किया है। कर्नाटक में भी भाषा को लेकर संवेदनशीलता है, लेकिन वहां हिंदी विरोध उतना तीव्र नहीं है जितना तमिलनाडु में देखा जाता है।

दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी भाषा के विरोध का अवसर देने के लिये काफी हद तक हिंदी भाषी राज्यों के लोगों का दक्षिण भारतीय भाषाओं के प्रति उदासीन रवैया भी जिम्मेदार है। हिंदी भाषी राज्यों में तमिल-तेलुगू जैसी भाषाओं को सीखने-सिखाने के प्रति कोई उत्साह नहीं दिखाई देता है, इसलिये दक्षिण भारतीय राज्यों में भी हिंदी भाषा के प्रति कोई विशेष लगाव नहीं है। हिंदी भाषी राज्यों में 10 प्रतिशत से कम लोग ऐसे हैं, जो दो भाषाएं बोल सकते हैं। इन दो भाषाओं में ज्यादातर हिंदी और अंग्रेजी या हिंदी और उर्दू बोलने वाले हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि त्रिभाषा सूत्र का संबंध माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा से है उच्च शिक्षा से नहीं है। त्रिभाषा सूत्र राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से दूरगामी परिणाम देने वाला है।

यह सूत्र सांस्कृतिक और क्षेत्रीय अलगाववाद को दूर करने में सहायक है। इसी प्रकार बहुत सीमा तक त्रिभाषा सूत्र देश की कई अन्य भाषाओं के साहित्य, परम्परा, जीवन शैली, सांस्कृतिक मूल्य आदि को समझने में सहायक है और यह समझ पराएपन को दूर कर निकटता निर्मित करेगी। त्रिभाषा सूत्र इस धारणा को भी दूर करेगा कि हिन्दी अन्य भाषाओं पर छा रही है तथा अन्य भाषाओं पर वह अपने प्रभुत्व को स्थापित कर रही है। स्पष्टतः त्रिभाषा सूत्र राष्ट्रीय एकता और भावात्मक निकटता लाने में सहायक है।

यह आश्चर्य की बात है कि स्वतंत्रता के बाद गठित समितियों तथा शिक्षा से जुड़े विभिन्न आयोगों ने द्विभाषा तथा बाद में त्रिभाषा सूत्र का व्यापक रूप से समर्थन ही नहीं किया अपितु उसे व्यावहारिक रूप प्रदान करने की अनुशंसाएं तथा योजनाएं भी प्रस्तुत की, पर राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (2005) जिसकी स्थापना प्रधानमंत्री ने की, ने अपनी अनुशंसाओं में त्रिभाषा सूत्र की पूर्णतः उपेक्षा की। इतना ही नहीं, ज्ञान आयोग ने अपनी अनुशंसाओं में अंग्रेजी को नये सिरे से प्रतिष्ठित करने का प्रयास भी किया है। आयोग की अनुशंसा है कि अंग्रेजी को पहली कक्षा से ही पढ़ाया जाये।

अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 ने भी त्रिभाषा सूत्र के संबंध में स्पष्ट राय नहीं दी है। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के पूर्व प्रायः द्विभाषी थे। उनमें रहने वाले नागरिक स्वाभाविक रूप से दो भाषाओं के जानकार रहते थे, पर जब से भाषा आधारित राज्य रचना हुई है तब से भाषाई कट्टरता और एक भाषा को जानने की प्रवृत्ति बढ़ी है। असल में त्रिभाषा सूत्र राज्यों के बीच भाषाई अंतर को समाप्त कर राष्ट्रीय एकता में वृद्धि का विचार रखता है। हालांकि यह भारत की जातीय विविधता को एकीकृत करने के लिये एकमात्र उपलब्ध विकल्प नहीं है। संवाद, लचीलापन और पारस्परिक सम्मान पर आधारित एक संतुलित दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि शिक्षा नीति भारत की विविधता में एकता को तनाव देने के बजाय मजबूत करे।

Team Desk