एसआईआर पर गतिरोध

एसआईआर पर गतिरोध

पंजाब केसरी के डायरेक्टर आदित्य नारायण चोपड़ा

गहन मतदाता पुनरीक्षण ( एसआईआर) के मुद्दे पर संसद से लेकर सड़क तक जो कोहराम मचा हुआ है उसे देखते हुए चुनाव आयोग ने इसकी समय सीमा एक सप्ताह बढ़ा दी है। अब मतदाता अपना फार्म 4 दिसम्बर के स्थान पर 11 दिसम्बर तक बीएलओ को दे सकेंगे। समझा जा रहा है कि इससे बीएलओ का भार भी कुछ हल्का होगा। मगर संसद के पहले दिन ही लोकसभा में इस मुद्दे पर जो हंगामा हुआ वह अपेक्षित था क्योंकि विपक्षी दल मांग कर रहे थे कि एसआईआर के मसले पर सभी काम छोड़ कर सदन में विशद चर्चा कराई जाये जिसके लिए सरकार राजी नहीं हुई और दिन भर लोकसभा की कार्यवाही बाधित होती रही। लोकतन्त्र में यह कोई अनूठी घटना नहीं है क्योंकि विपक्ष प्रायः उन्हीं मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश करता है जिन पर जनता आन्दोलित होती है। जाहिर है कि मतदाता सूची संशोधन का मामला राष्ट्रीय स्तर पर केन्द्रीय बहस का विषय बना हुआ है और विपक्ष लगातार इस सिलसिले में चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर रहा है।
दूसरी तरफ चुनाव आयोग जिद पर अड़ा हुआ है कि देश के 12 राज्यों में मतदाता सूची संशोधन का कार्य निश्चित समयावधि में पूरा होना चाहिए। इसके चलते देश के विभिन्न राज्यों में दर्जनों बीएलओ की मृत्यु भी हो चुकी है और कई ने आत्महत्या तक की है। पहले विपक्ष यह भी मांग कर रहा था कि आत्महत्या के लिए चुनाव आयोग के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई तक होनी चाहिए क्योंकि राज्य सरकार के विभिन्न कर्मचारियों ने ड्यूटी पर आत्महत्या की है। ज्ञातव्य है कि चुनाव आयोग चुनाव सम्बन्धी काम कराने के लिए राज्य सरकारों के कर्मचारी ही प्रतिनियुक्ति पर लेता है। ये कर्मचारी प्रायः तीसरी श्रेणी के होते हैं जो बीएलओ का काम करते हैं। बीएलओ की आत्महत्याओं से एेसी अवधारणा बनी है कि इन पर काम का भारी बोझ है जिसे चुनाव आयोग दो महीने के भीतर ही पूरा करना चाहता है। जिन 12 राज्यों में चुनाव आयोग मतदाता सूची संशोधन का काम करा रहा है उनमें से हाल-फिलहाल में किसी भी राज्य में चुनाव नहीं होने हैं। अतः यह दलील दी जा रही है कि चुनाव आयोग यह काम न्यूनतम छह महीने के भीतर करा सकता था जिससे कर्मचारियों पर काम का बोझ न होता। इसके पक्ष में तर्क दिया जा रहा है कि पिछली बार जब 2003 में मतदाता सूची संशोधन का काम किया गया था तो उसके लिए दो वर्ष का समय रखा गया था। इसे देखते हुए दो महीने का समय वास्तव में बहुत कम लगता है । इससे आभास होता है कि चुनाव आयोग हड़बड़ी में है और वह अपना काम जल्द से जल्द करना चाहता है।
दूसरी तरफ देश के सर्वोच्च न्यायालय में भी एसआईआर को लेकर दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। समझा जा रहा है कि चुनाव आयोग ने संशोधन में एक सप्ताह की सीमा इस सुनवाई के दौरान विद्वान न्यायाधीशों की टिप्पणियों के चलते ही की है। न्यायालय में जो पीठ सुनवाई कर रही है उसके मुखिया मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकान्त हैं । श्री सूर्यकान्त ने कहा था कि यदि याचिकाकर्ता उनके समक्ष यह सिद्ध कर दें कि समय सीमा बढ़ाने के ठोस तर्क हैं तो वह चुनाव आयोग को यह सीमा बढ़ाने के आदेश दे सकते हैं। विगत 26 नवम्बर को तमिलनाडु व प. बंगाल सरकारों द्वारा एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई करते हुए श्री सूर्यकान्त ने यह टिप्पणी की थी। मूल प्रश्न यही है कि मतदाता सूची संशोधन क्यों आवश्यक है और इसके लिए इतनी जल्दबाजी क्यों है? बेशक मतदाता को जो भारत का लोकतन्त्र एक वोट का अधिकार देता है वह उसका सबसे बड़ा संवैधानिक अधिकार है और इसकी पवित्रता हर हाल में अक्षुण्ण रहनी चाहिए। मतदाता सूचियों में दोहरे नामों की समस्या कोई नई नहीं है। इसके साथ ही एक मतदाता का नाम अलग-अलग राज्यों की सूचियों में भी पाया जाता है। इन खामियों को दूर करने के लिए चुनाव आयोग को निश्चित रूप से निर्णायक प्रयास करने चाहिए परन्तु इसका मतलब यह भी नहीं है कि इस क्रम में बीएलओ ही आत्महत्या करने लगें। संसद का सत्र चल रहा है जो 19 दिसम्बर तक जारी रहेगा।
एसआईआर के मुद्दे पर संसद में गतिरोध किसी कीमत पर पैदा नहीं होना चाहिए और खुलकर बहस होनी चाहिए जिससे भविष्य में एेसी समस्याओं से निपटा जा सके।
बेशक इस तर्क में वजन है कि सीधे इस मुद्दे पर सदन में चर्चा नहीं छेड़ी जा सकती क्योंकि चुनाव आयोग एक स्वतन्त्र व स्वायत्त संवैधानिक संस्था है जिसके कृत्यों के लिए सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। मगर चुनाव प्रणाली में सुधार के छाते तले इस विषय पर चर्चा जरूर हो सकती है। अतः सरकार व विपक्ष दोनों को ही किसी समान विचार पर आना चाहिए। सरकार के सामने सत्र शुरू होने से पहले ही विपक्ष ने साफ कर दिया था कि वह एसआईआर पर बहस चाहता है क्योंकि वर्तमान में यह मुद्दा ज्वलन्त बना हुआ है और 12 राज्यों के लोग इससे प्रभावित हैं। लोकतन्त्र में विपक्ष को संसद में जनता की बात उठाने का पूरा अधिकार होता है। मगर इस प्रणाली में सरकार भी चूंकि जनता की ही होती है अतः उसे पूरी संवेदनशीलता के साथ सभी मुद्दे पर गौर करना होता है।

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