ओलंपिक की मेजबानी वाया राष्ट्रमंडल गेम्स

Summary :

दुनियाभर में खेलों को लेकर अलग ही रोमांच देखने को मिलता है, क्योंकि यहां खेल के मैदान में खिलाड़ियों के धैर्य, ताकत और हौसले की काबिले तारीफ जुगलबंदी देखने को मिलती है। इस संदर्भ में बात करें तो इस बार भारत को कॉमनवैल्थ गेम्स 2030 की मेजबानी का अधिकार मिल गया है। जिसमें अहमदाबाद को मेजबान शहर घोषित किया गया है। यह ऐतिहासिक घोषणा 26 नवंबर को ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल महासंघ की महासभा में की गई। भारत ने पिछली बार 2010 में दिल्ली में इन खेलों की मेजबानी की थी। कॉमनवैल्थ गेम्स का आयोजन किसी भी देश के…

दुनियाभर में खेलों को लेकर अलग ही रोमांच देखने को मिलता है, क्योंकि यहां खेल के मैदान में खिलाड़ियों के धैर्य, ताकत और हौसले की काबिले तारीफ जुगलबंदी देखने को मिलती है। इस संदर्भ में बात करें तो इस बार भारत को कॉमनवैल्थ गेम्स 2030 की मेजबानी का अधिकार मिल गया है। जिसमें अहमदाबाद को मेजबान शहर घोषित किया गया है। यह ऐतिहासिक घोषणा 26 नवंबर को ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल महासंघ की महासभा में की गई।
भारत ने पिछली बार 2010 में दिल्ली में इन खेलों की मेजबानी की थी। कॉमनवैल्थ गेम्स का आयोजन किसी भी देश के लिए सिर्फ खेल आयोजन नहीं, बल्कि उसकी अंतर्राष्ट्रीय छवि, विकास क्षमता, इन्फ्रास्ट्रक्चर और विजन का भी प्रतीक माना जाता है। अब तक ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, भारत, कनाडा और न्यूजीलैंड सहित कुल 9 देश इसकी मेजबानी कर चुके हैं। भारत को दूसरी बार मेजबानी करने के अधिकार मिले हैं।
कॉमनवैल्थ गेम्स 2030 की मेजबानी मिलने से ओलंपिक गेम्स 2036 की मेजबानी के लिए भारत की दावेदारी मजबूत होगी। भारत 2036 के ओलंपिक गेम्स की मेजबानी की तैयारी भी कर रहा है। पीएम नरेंद्र मोदी ने लालकिले से इसका ऐलान भी किया था। पिछले साल नवंबर में भारत ने ओलंपिक गेम्स-2036 की मेजबानी हासिल करने के लिए दावेदारी पेश की थी। साल 2029 विश्व पुलिस खेल की मेजबानी की भी तैयारी की जा रही है।
भारत ने वर्ष 2010 में नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल में कुल 101 पदक जीते थे, जिसमें 38 स्वर्ण शामिल थे। इनमें से 30 पदक सिर्फ शूटिंग से आए थे। वर्ष 2022 में भारत ने कुल 61 पदक जीते, जिनमें 22 स्वर्ण शामिल थे। बर्मिंघम में हुए इस राष्ट्रमंडल खेल में शूटिंग को शामिल नहीं किया गया था।
कॉमनवैल्थ गेम्स का इतिहास बेहद दिलचस्प है। यह एक मल्टी-स्पोर्ट्स अंतर्राष्ट्रीय आयोजन है, जिसमें ब्रिटिश शासन वाले देशों के खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं। फिलहाल, इसमें 54 सदस्य देश हैं। इन गेम्स की शुरुआत 1930 में कनाडा के हैमिल्टन शहर से हुई थी। पहले इसे ब्रिटिश एम्पायर गेम्स कहा जाता था। 1978 से इसका नाम ‘कॉमनवैल्थ गेम्स’ हो गया। 2030 के आयोजन में कॉमनवैल्थ गेम्स को 100 साल पूरे होंगे। राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी भारत की आर्थिक उन्नति, आधारभूत ढांचे, खेल की व्यवस्थाओं की बड़ी सफलता की शुरुआत है। अहमदाबाद में कॉमनवैल्थ गेम्स 2030 के आयोजन के लिए तैयारियां पहले से ही शुरू हो चुकी हैं। यहां खिलाड़ियों, अधिकारियों और दर्शकों के लिए विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने की तैयारी जोर-शोर पर है। मुख्य वेन्यू के तौर पर नरेंद्र मोदी स्टेडियम, नारणपुरा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, और सरदार वल्लभभाई पटेल स्पोर्ट्स एंक्लेव को प्रस्तावित किया गया है।
भारत ने 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी पर लगभग 70,000 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जबकि शुरुआती अनुमान 1600 करोड़ रुपये खर्च होने का था। चार साल में एक बार होने वाले इन खेलों में 72 देश हिस्सा लेते हैं, जिनमें से ज़्यादातर पूर्व ब्रिटिश उपनिवेश हैं। बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व संयुक्त सचिव (खेल) कुणाल, भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) की अध्यक्ष पीटी उषा और गुजरात के खेल मंत्री हर्ष संघवी सहित अन्य लोगों ने किया। कॉमनवैल्थ गेम्स में 70 से अधिक देश भाग लेंगे। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह खेल प्रतिस्पर्धा काफी बड़े पैमाने पर आयोजित की जायेगी। ऐसे में इस खेल आयोजन को सफल बनाने के लिए जो भी व्यवस्था की जाएगी, वह उच्चस्तरीय होनी चाहिए, ठीक वैसी जैसी ओलंपिक के दौरान होती है। इस तरह की खेल सुविधाएं- जिन्हें सस्टेनेबल स्पोर्ट्स इकोसिस्टम कहते हैं- विशेषकर जो हमारे युवा वर्ग हैं, उन्हें खेलों से जुड़ने के लिए प्रेरित करेगा। इस इकोसिस्टम के तहत जब हमारे युवा खिलाड़ी तैयार होकर निकलेंगे तो उन्हें बहुत लाभ मिलेगा। क्योंकि सच तो यही है कि अपने देश में बहुत कम जगह पर ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अवसंरचनाएं मौजूद हैं।
दूसरी बात, जब भी इस तरह के आयोजन होते हैं, तो देश में खेलों को लेकर एक जुनून पैदा होता है और इससे देश की खेल संस्कृति को मजबूती मिलती है जो अंततः बेहतर खिलाड़ियों के उभरने और सफल खेल आयोजन के रूप में परिणत होती है। उदाहरण के लिए, ओलंपिक खेलों में जब सायना नेहवाल और पीवी सिंधु ने पदक जीते तो देश की लड़कियों के बीच बैडमिंटन खेलने का माहौल बन गया। जबकि इससे पहले तक बैडमिंटन को लेकर लड़कियों के बीच इस तरह का जुनून नहीं था। जब देश में इतनी बड़ी अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धा आयोजित की जायेगी तो उम्मीद है कि उसके लिए तैयारियां भी उसी स्तर पर होंगी। इनसे अनगिनत लोगों को रोजगार तो मिलेगा ही, बड़ी संख्या में आगंतुकों के आने से अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी। हालांकि इसमें सरकार को बहुत पैसे खर्च करने पड़ेंगे, पर इससे देश की प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी।
इस तरह के आयोजन कोच के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान उन्हें दूसरे अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कोच के साथ संवाद करने का अवसर मिलता है, उनके अनुभव से सीखने को मिलता है। यह एक कोच को दूसरे कोच की मानसिकता को समझने का भी अवसर होता है, जिसका लाभ उन्हें खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करते समय मिलता है। कॉमनवैल्थ गेम्स में अपने देश में खेलते हुए खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों के खेल के तरीके, उनकी रणनीतियों को समझकर अपने खेल को बेहतर बना सकते हैं और ओलंपिक जैसे खेलों के महाकुंभ में अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकते हैं। हालांकि एक तथ्य यह भी है कि जो खिलाड़ी कॉमनवेल्थ 2030 में खेलेंगे, उनमें से 70-80 प्रतिशत खिलाड़ी ओलंपिक 2036 में नहीं खेल पाएंगे, क्योंकि उनकी उम्र अधिक हो चुकी होगी। लेकिन, जो युवा खिलाड़ी हैं जो उभरते हुए खिलाड़ी हैं, वे निश्चित तौर पर इससे प्रेरित होंगे, उन्हें दूसरे देश के महान खिलाड़ियों से बहुत कुछ सीखने का अवसर मिलेगा।
यहां सरकार की जवाबदेही भी काफी बढ़ जाती है। समय पर उच्च स्तरीय अवसंरचनाओं का निर्माण करना कोई हंसी-खेल नहीं है। इसके लिए युद्धस्तर पर तैयारी करनी होगी। तैयारी में किसी तरह की कोई कमी न रहे, इसकी निगरानी करनी होगी। जब हम ऐसा करेंगे तभी जाकर सच्चे अर्थों में 2036 ओलंपिक की मेजबानी की दावेदारी कर पाने में सक्षम हों पायेंगे, क्योंकि ओलंपिक में 200 से अधिक देश भाग लेते हैं। इस आयोजन के लिए सुरक्षा व्यवस्था भी चाक-चौबंद होनी चाहिए। इसमें तनिक भी चूक देश की प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला देगी।

Team Desk