धीरे-धीरे सभी साहित्यिक पत्रिकाएं लगभग बंद होने लगी हैं। कुछ नाम थे जो आज के बाजारवाद में भी जीवित रह सकते थे, मगर उनके संचालकों का संभवत: बाजार की मांग के बारे में अपना ही नजरिया था। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, दिनमान, चंदा मामा, मनोरमा, माया, ‘इलस्ट्रेटिड वीकली आफ इंडिया’, ‘ईव्स वीकली’, ‘इंप्रिंट’, ‘एनकाउंटर’ और ‘नवनीत’ आदि अनेक ऐसे नाम थे जो अधिकांश भारतीय परिवारों की जिंदगी का हिस्सा थे।
ऐसी ही थी एक पंजाबी पत्रिका ‘नागमणि’, जो वर्ष 1966 में स्वयं अमृता प्रीतम ने निकाली थी। उस पत्रिका की समूची साज-सज्जा स्वयं ‘इमरोज’ करते थे। अमृता जी ने यह पत्रिका अपने एक साहित्यिक मित्र सती कमार की प्रेरणा से आरंभ की थी। यह पत्रिका बेहद लोकप्रिय तो थी ही, लेखक लोग इसमें रचना छपने के बाद स्वयं को पंजाबी साहित्य का ‘वीआईपी’ लेखक मानते थे। इस पत्रिका की कुछ विशेष बातें काबिलेजिक्र थीं।
1. इसका कागज हल्के भूरे रंग का होता था। कुछ लोगों की शिकायत थी कि ‘इसे तो रद्दी वाला भी नहीं लेता। मगर पत्रिका में ही यह जवाब भी छपा था कि ‘नागमणि’ एकमात्र ऐसी पत्रिका है जिसे कोई रद्दी में नहीं बेचता।’
2. इसकी एक विशेषता यह भी थी कि हर लेखक को रचना भेजने के तीसरे दिन ही अमृता जी की ओर से पोस्टकार्ड आ जाता था कि ‘रचना मिल गई है’। इसके पश्चात एक सप्ताह के भीतर ही ‘हां’ या ‘न’ में एक और पोस्टकार्ड आ जाता था। पर उन चिट्ठियों ने जो इतिहास बनाया वो अब पंजाबी साहित्य का इतिहास है। जालंधर में एक दिहाड़ी मजदूर था। उसने सड़क किनारे छोड़ दिया गया एक नवजात देखा और उस बच्चे के इर्द-गिर्द एक कहानी बुनकर 1970 में नागमणि को भेज दी। छपने तक वो ‘ज्ञानी’ परीक्षा की पढ़ाई कर रहा था और उसका टीचर भी पत्रिका में उसका नाम देखकर दंग रह गया।
आगे चलकर वो सड़क-मजदूर, प्रख्यात पत्रकार एवं कहानीकार प्रेम गोरखी कहलाया और दबे-कुचले लोगों का दर्द लिखने वाला बड़ा कहानीकार माना गया। उसने खुद कहा था ‘कि वो ज्यादा पढ़ा-लिखा भी नहीं था, मगर उस औरत ने उसे लेखक बना दिया।’
सिक्किम में तैनात एक फौजी कप्तान ने 1971 में एक सिपाही की कहानी लिखी, जो अपनी गर्भवती पत्नी को घर छोड़कर चला गया और जंग की वजह से लौट नहीं सका। कप्तान का नाम था जसबीर भुल्लर। वो कहानी पंजाबी की सबसे अच्छी फौजी कहानियों में गिनी जाती है। जवाब में उसे लिखा गया कि फौज की जिदंगी पर गहराई से लिखा ही नहीं गया है इसलिए ऐसी ही कहानियां आनी चाहिए। एक राज मिस्त्री था, किरपाल कज्जाक। उसने घुमंतू कबीलों पर जो काम किया उसे दुनिया ने सराहा और उन्हीं दिनों एक बागी कवि था, पाश। जब वो जेल में था उसकी कविताएं नागमणि के मुखपृष्ठ पर छपीं थीं। एक बार उसने अपनी प्रेमिका की छोटी-सी तस्वीर भिजवाई, अपनी ‘विदा’ नामक कविता के साथ और झिझकते हुए गुजारिश की कि चेहरा ऐसे बनाया जाए कि कोई पहचान न सके। अगले अंक में कविता के साथ एक पेड़ छपा और उस पेड़ के तने में एक चेहरा छिपा था, जिसे शायद सिर्फ दो लोग पहचान सकते थे।
और वो कोलकाता वाला ट्रक ड्राइवर। उसका नाम था बलदेव सिंह। दूसरी रचना भेजने पर ‘नागमणी’ में उसे पूरा स्तम्भ मिल गया। नाम रखा गया ‘सड़कनामा’ सड़क पर बीती जिंदगी का ब्यौरा। यह स्तम्भ पत्रिका के आखिरी अंक तक चला और ड्राइवर ने वो नाम अपने नाम के साथ जोड़ लिया। बलदेव सिंह सड़कनामा। आगे चलकर उसे केंद्रीय साहित्य अकादमी सम्मान भी मिला। नब्बे के दशक के आखिरी सप्ताह में खबर आई कि सेहत और खर्च बढ़ने की वजह से पत्रिका बंद हो रही है। पाठकों ने विरोध किया। पत्रिका चलती रही। इसी दौरान एक अंक के पन्ने पर एक छोटा-सा नोट छपा- ‘यह आखिरी अंक है।’ एक पुराने लेखक ने कहा कि वो रिटायर हो रहा है, पत्रिका वो चला लेगा। कुछ पाठकों ने कहा कि वो ट्रस्ट बना देंगे। अगले महीने पाठकों के घर डाक आई।
लिफाफे में पत्रिका नहीं थी। उसमें इमरोज के दस्तखत वाला एक मनीऑर्डर था और साथ में गुजारिश कि बची हुई सदस्यता की रकम वापस ले ली जाए। कुल 33 बरस जिस डाक ने लोगों को लेखक बनाया था वो डाक आखिरी बार पैैसे लौटाने आई थी।
आखिरी बरसों में अमृता प्रीतम बिस्तर पर थीं। पत्रकार निरूपमा दत्त उनसे मिलने गई। उसने लिखा था कि उस हालत में भी अमृता शरारत भरी बातें कर रही थीं और पूछ रही थीं कि जिंदगी में कोई नया प्रेम आया या नहीं। अमृता ने अपनी आखिरी नज़्मों में से एक उन्हें सुनाई। वो नज़्म इमरोज के लिए थी और उसका मतलब इतना भर था, वो लौटकर फिर मिलेंगी। कहां, कैसे, यह उसे भी नहीं पता था।
‘मैं तैनू फिर मिलांगी,
कित्थे? किस तरह? पता नहीं…
शायद तेरे तखैयल दी चिंगारी बण के तेरे कैनवास से उतरांगी
जो तेरे कैनवास दे उत्ते
इक जादुई लकीर बण के
खामोश तैनू तकदी रवांगी।’
अब तो स्थिति यह है कि पंजाबी में ‘हुण’ और ‘प्रीतलड़ी’ के अलावा कोई महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका नहीं छपती।
हिंदी में ‘नया ज्ञानोदय’, ‘वागर्थ’ व केंद्रीय अकादमी की लड़खड़ाती पत्रिका ही चर्चा में रहती है। तो क्या यह मान कर चला जाए कि साहित्य के क्षेत्र में चर्चित लेखन व पत्र-पत्रिकाओं के लिए खिड़कियां, दरवाजे धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं।
धीरे-धीरे दम तोड़ती साहित्यिक पत्रिकाएं
Summary :
धीरे-धीरे सभी साहित्यिक पत्रिकाएं लगभग बंद होने लगी हैं। कुछ नाम थे जो आज के बाजारवाद में भी जीवित रह सकते थे, मगर उनके संचालकों का संभवत: बाजार की मांग के बारे में अपना ही नजरिया था। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, दिनमान, चंदा मामा, मनोरमा, माया, ‘इलस्ट्रेटिड वीकली आफ इंडिया’, ‘ईव्स वीकली’, ‘इंप्रिंट’, ‘एनकाउंटर’ और ‘नवनीत’ आदि अनेक ऐसे नाम थे जो अधिकांश भारतीय परिवारों की जिंदगी का हिस्सा थे। ऐसी ही थी एक पंजाबी पत्रिका ‘नागमणि’, जो वर्ष 1966 में स्वयं अमृता प्रीतम ने निकाली थी। उस पत्रिका की समूची साज-सज्जा स्वयं ‘इमरोज’ करते थे। अमृता जी ने यह…


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