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जारी है दलितों से भेदभाव

भारत में दलितों से जाति व्यवस्था के कारण क्रूर हिंसा और उत्पीड़न होता रहा है। तमाम कानूनों के बावजूद देश में आज भी दलितों से भेदभाव की घटनाएं सामने आ जाती हैं। इतिहास को देखें तो महाभारत लिखने वाले वेदव्यास भी मछुवारे थे परंतु वह महर्षि बन गए और गुरुकुल चलाते थे। विदुर जिन्हें महापंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे। वह हस्तिनापुर के महामंत्री बने और उनकी लिखी हुई विदुर नीति राजनीति का महाग्रंथ है। भगवान श्रीराम के साथ बनवासी निषादराज भी राज गुरुकुल में पढ़ते थे। उनके पुत्र लव-कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े। वैदिक काल की बात करें तो कोई किसी का शोषण नहीं करता था। सबको शिक्षा का अधिकार था। कोई भी अपनी योग्यता के अनुसार पद पर पहंुच सकता था। आखिर जन्म आधारित जातीय व्यवस्था कैसे शुरू हुई इस पर तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन यह वास्तविकता है कि स्वार्थी नेताओं ने जातिवाद का पूरी तरह से राजनीतिकरण कर दिया और यह आज तक जारी है। राजस्थान के अलवर जिले में 8 साल के एक दलित बच्चे की बेरहमी से पिटाई की गई क्योंकि उसने ऊंची जाति के शख्स की पानी की बाल्टी को छू लिया था। इतना ही नहीं मारपीट करने वाले ने बच्चे के पिता और परिवार के खिलाफ जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल भी किया। चौथी क्लास का बच्चा गांव के सरकारी स्कूल में लगे हैंडपम्प पर पानी पीने गया था तब उसने पानी की बाल्टी को छू लिया था। बच्चा इतना भयभीत हो गया कि अब वह स्कूल जाने से भी डर रहा है। पुलिस ने एससी-एसटी कानून के तहत मामला दर्ज कर लिया है।
य​द्यपि आज के आधुनिक दौर में जा​तिवाद कम हुआ है लेकिन विभिन्न शोध आज भी इस भ्रम को तोड़ते नजर आते हैं। माना जा रहा है कि शहरीकरण और आधुनिकीकरण के साथ जाति और गौत्र जैसी प्राचीन और परम्परागत पहचान धूमिल हो रही है लेकिन वास्तविकता यह है कि शहरों में बस्तियां जातियों के आधार पर बसी हुई हैं और सवर्णों के मोहल्लों में दलितों को अक्सर ठिकाना नहीं मिलता। गुजरात, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और महाराष्ट्र के कई शहरों में ऐसा देखा गया है। बेंगलुरू शहर में आईटी क्रांति के बाद बसी आधुनिक बस्तियों में भी दलितों के न होने का चलन दिखाई देता है। आधुनिक अपार्टमैंटों में दलित बेहद कम हैं।
कोलकाता के बारे में ये माना जाता है कि ये आधुनिकता की भूमि है और यहां के लोग काफी आधुनिक हैं, ये सामाजिक नवजागरण का भी केन्द्र रहा है। लंबे समय तक वहां वामपंथियों का भी शासन रहा फिर ऐसी क्या वजह है कि कोलकाता के भद्रलोक मोहल्लों में दलित अनुपस्थित हैं। शोध का विषय ये भी है कि कोलकाता में सिर्फ 5 फीसदी दलित क्यों हैं जबकि पश्चिम बंगाल में 23 फीसदी से ज्यादा दलित हैं। वहीं गुजरात में ये देखा जाना चाहिए कि जिस राज्य के बारे में ये मिथक है कि यहां हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग रहते हैं उस राज्य में दलितों को शहरी मोहल्ले से दूर रखने का चलन सबसे ज्यादा क्यों है? गुजरात का जातिवाद इतने लम्बे समय से छिपा हुआ क्यों रहा?
राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश के कई शहरों में सवर्णों के मोहल्लों में आज भी दलित दूल्हे घोड़ी पर सवार होकर बारात नहीं ले जा सकते। अनेक घटनाएं सामने आती हैं जो शर्मसार कर देने वाली हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में दलित लड़कियों से बलात्कार, उन्हें जिंदा जलाने की घटनाएं सामने आती रही हैं, कभी दलितों की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती है, कभी मंदिरों में आयोजित प्रतिभोज के दौरान उनके अलग बैठने की व्यवस्था की जाती है। दलित महिलाओं के साथ दूसरे या तीसरे नागरिक की तरह व्यवहार किया जाता है। केवल यह कहना कि देश में जातिवाद केवल ग्रामीण क्षेत्रों में ही है उचित नहीं है। शहरों में भी दलितों के साथ कहीं न कहीं भेदभाव हो रहा है। दलितों के पास जमीनें बहुत कम हैं या नहीं के बराबर हैं। अगड़ी जाति के लोगों ने उनकी जमीनें हड़प ली हैं। सरकारों के पास उनकी जमीन देने की क्षमता नहीं है और न ही उन्हें नौकरियां मिल रही हैं। 2018 में हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद अन्याय, उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ दलितों का मुुखर आंदोलन शुरू हुआ था और हैदराबाद से सुलगी चिंगारी गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में देखते ही देखते फैल गई थी। संविधान में सभी नागरिकों को बराबर माना जाता है लेकिन आज भी उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिला है। दलितों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति अभी भी खराब है। दलित परिवार अपने बच्चों को दिहाड़ी, मजदूरी करके सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहा है। जाहिर है दलित बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों की बराबरी नहीं कर पाएंगे। दलितों को समाज में सम्मानजनक स्थान पर पहुंचाना आसान काम नहीं है। अगड़ी जातियों के लोग आज भी अपना दबदबा और अपनी मूंछ ऊंची रखने के लिए दलितों का मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न कर रहे हैं।
इनके उत्थान के लिए जरूरी है कि पर्याप्त संसाधन और सामाजिक सुरक्षा दी जाए अन्यथा वे समाज के प्रभावशाली वर्ग की दया पर ही निर्भर रहेंगे। किसी समाज के विकास और उन्नति के लिए शिक्षा सबसे जरूरी है। दूसरे तबके से मुकाबला करने के लिए जरूरी है कि दलित बच्चों को शिक्षा के तमाम अवसर मुहैया कराए जाएं हालांकि आजादी के बाद छुआछूत से राहत मिली है। आरक्षण के लिए किए गए संवैधानिक प्रावधान से भी कुछ हद से मदद मिली लेकिन पूरे दलित समाज को लाभ नहीं मिला, संसाधानों के स्वामित्व पर असर नहीं पड़ा। यानी संसाधनों का वितरण अपरिवर्तित ही रहा। अब भी उनका संघर्ष मूलभूत जरूरतों और अस्मिता की लड़ाई के लिए ही चल रहा है।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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